सार्वजनिक जीवन में यौन आरोपों और जवाबदेही की लंबी कहानी

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मुंबई। कितनी बार एक औरत को बोलना पड़ेगा, तब जाकर व्यवस्था सुनेगी? कितनी सुर्खियाँ चीखेंगी, तब किसी ताकतवर आदमी से कथित यौन अपराध का हिसाब माँगा जाएगा?
भारत में यह दृश्य अब अनजाना नहीं रहा। किसी नेताजी पर आरोप लगता है। मीडिया में तूफान आता है। कार्यकर्ता सड़क पर उतरते हैं। हैशटैग ट्रेंड करते हैं। पीड़िता से कहा जाता है: बोलो, साबित करो, फिर बोलो और उस दर्द को बार-बार जीओ।
फिर कानून की गाड़ी चलती है। धीरे-धीरे, बेहद धीरे। इतनी धीमी कि हिम्मत चुकने लगती है, पैसा खत्म होने लगता है, गवाह थक जाते हैं और सबूत कमजोर पड़ने लगते हैं। उधर जनता का गुस्सा भी नई खबर की तलाश में निकल जाता है।
कल का आक्रोश आज की पुरानी खबर बन जाता है।
सामाजिक कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर सवाल उठाती हैं, “इंसाफ के लिए पीड़िता को ही हर बार इतना सब्र क्यों करना पड़ता है, जबकि सत्ता के पास वक्त भी है, रसूख भी और बच निकलने के रास्ते भी?”
जन टिप्पणीकार पारस नाथ चौधरी कहते हैं कि पिछले दो दशकों में भारत ने राजनीति, फिल्म, मीडिया और धार्मिक संस्थाओं में एक ही तरह का तमाशा बार-बार देखा है,: एक ताकतवर आदमी, कुछ गंभीर आरोप, मीडिया का शोर और कभी-कभी वर्षों बाद अदालत का फैसला। किसी को उम्रकैद मिली। कोई बरी हो गया। किसी ने चुपचाप इस्तीफा दिया। किसी ने खुलेआम आरोप नकार दिए। लेकिन इन तमाम मामलों ने एक बड़ा सवाल जरूर छोड़ा है: क्या ताकतवर लोगों के लिए कानून की चाल अलग होती है?

पूर्व सांसद और पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा के पोते प्रज्वल रेवन्ना का मामला हाल के सबसे सनसनीखेज मामलों में रहा।

अप्रैल 2024 में कर्नाटक के हासन में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले सैकड़ों कथित यौन वीडियो वाले पेन ड्राइव सामने आए। आरोप कई महिलाओं के यौन उत्पीड़न से जुड़े थे। रेवन्ना देश छोड़कर चले गए और मई 2024 में लौटने पर गिरफ्तार हुए।
चार मामलों में चार्जशीट दाखिल हुई। अगस्त 2025 में विशेष अदालत ने एक घरेलू कामगार से बार-बार बलात्कार के मामले में उन्हें दोषी ठहराया। वीडियो, डीएनए और फॉरेंसिक सबूतों पर भरोसा करते हुए अदालत ने प्राकृतिक जीवन के शेष समय तक जेल की सजा सुनाई। रेवन्ना ने अपील की है और मामला अभी आगे की कानूनी प्रक्रिया में है।

उत्तर प्रदेश के उन्नाव के पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को नाबालिग लड़की से बलात्कार के मामले में दोषी ठहराया गया।

मामले ने देश को झकझोर दिया। आरोप लगे कि पीड़िता के पिता की हिरासत में मौत और बाद में हुए सड़क हादसे में परिवार के सदस्यों तथा वकील की मौत के पीछे सेंगर के सहयोगियों का हाथ था।
सेंगर को उम्रकैद हुई। दिल्ली हाईकोर्ट ने 2025 के आखिर में सजा निलंबित की। लेकिन मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को पलट दिया और मुख्य अपील पर जल्द फैसला करने को कहा। एक दूसरे मामले में मिली सजा के कारण सेंगर जेल में बने हुए हैं।

भाजपा सांसद और 2023 तक भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष रहे बृज भूषण शरण सिंह पर कई महिला पहलवानों ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए। इनमें ओलंपिक पदक विजेता भी शामिल थीं।

जंतर-मंतर पर पहलवानों का आंदोलन देशभर में चर्चा का विषय बना। एफआईआर दर्ज हुई। बृज भूषण ने आरोपों से इनकार किया।
अगस्त 2026 में दिल्ली की अदालत ने उन्हें और एक सह-आरोपी को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि आरोप संदेह से परे साबित नहीं हुए। आदेश के कुछ हिस्सों में आरोपों को राजनीतिक रूप से प्रेरित दिखाई देने की बात भी कही गई। शिकायतकर्ताओं ने फैसले के खिलाफ अपील करने की बात कही है।
यहाँ कानून ने अपना फैसला सुना दिया है। लेकिन बहस अभी खत्म नहीं हुई।

राजस्थान के पूर्व मंत्री महिपाल मदेरणा का नाम 2011 में एएनएम भंवरी देवी के लापता होने और कथित हत्या के मामले में सामने आया।
उन्होंने संबंध होने की बात स्वीकार की, लेकिन हत्या में शामिल होने से इनकार किया। इस कांड ने उनका राजनीतिक करियर खत्म कर दिया। मुकदमा वर्षों तक चलता रहा। देरी के आधार पर कई आरोपियों को जमानत मिली। 2021 में मदेरणा की मौत हो गई, जबकि मामला अभी लंबित था।
कानून की किताब में तारीखें होती हैं। पीड़ित की जिंदगी में इंतजार होता है।

आसाराम बापू और गुरमीत राम रहीम सिंह जैसे स्वयंभू धर्मगुरुओं के मामले भी इसी बहस का हिस्सा हैं।
आसाराम को आश्रम में नाबालिग से बलात्कार के मामले में उम्रकैद हुई। मई 2026 में राजस्थान हाईकोर्ट ने बलात्कार की सजा बरकरार रखी, हालांकि कुछ अन्य आरोपों में राहत दी। मामला सुप्रीम कोर्ट में है।

डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को 2017 में दो बलात्कार मामलों में दोषी ठहराया गया था। उन्हें 20 साल की सजा मिली। उन्हें कई बार पैरोल भी मिली। हाल में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पत्रकार की हत्या के मामले में उन्हें बरी किया, लेकिन उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।
यहीं एक और सवाल पैदा होता है; क्या जेल की सलाखें सबके लिए बराबर होती हैं?

भारत में #MeToo आंदोलन ने 2018 में जोर पकड़ा। अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने 2009 की फिल्म शूटिंग के दौरान अभिनेता नाना पाटेकर पर उत्पीड़न का आरोप लगाया। पाटेकर ने आरोपों से इनकार किया।

टीवी निर्माता विंटा नंदा ने अभिनेता आलोक नाथ पर 1990 के दशक में यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। एफआईआर दर्ज हुई और नाथ ने आरोपों से इनकार किया।
आंदोलन धीरे-धीरे राजनीति और मीडिया तक भी पहुँचा।
तत्कालीन केंद्रीय मंत्री एम.जे. अकबर पर कई महिला पत्रकारों ने उत्पीड़न के आरोप लगाए। उन्होंने इस्तीफा दिया और पत्रकार प्रिया रमानी पर मानहानि का मुकदमा किया। 2021 में दिल्ली की अदालत ने रमानी के पक्ष में फैसला दिया।

#MeToo दौर का शायद सबसे लंबा कानूनी सफर तरुण तेजपाल का रहा।
तहलका के संस्थापक और पूर्व प्रधान संपादक पर 2013 में गोवा के एक होटल की लिफ्ट में एक युवा सहकर्मी के यौन उत्पीड़न का आरोप लगा।
2021 में ट्रायल कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया। फैसले में पीड़िता के घटना के बाद के व्यवहार पर की गई टिप्पणियों की काफी आलोचना हुई। गोवा सरकार ने फैसले को चुनौती दी।
और फिर आया 6 अगस्त 2026,

करीब तेरह साल बाद बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने निचली अदालत का फैसला पलट दिया। तेजपाल को बलात्कार और संबंधित अपराधों में दोषी ठहराया गया। उन्हें दस साल की कठोर कैद और पीड़िता को देने के लिए भारी जुर्माने की सजा सुनाई गई। तेजपाल ने सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही है।
तेरह साल।
एक मुकदमे के लिए शायद सिर्फ एक संख्या। एक पीड़िता के लिए जिंदगी का बड़ा हिस्सा।

सभी मामले बलात्कार या यौन उत्पीड़न के नहीं थे। कुछ मामलों में निजी वीडियो सामने आए और आरोपों से इनकार हुआ।
एन.डी. तिवारी का 2009 का सेक्स-वीडियो विवाद और बाद में डीएनए जांच से विवाहेतर बेटे की पुष्टि हुई। अभिषेक मनु सिंघवी का 2012 का वीडियो विवाद भी खूब उछला। अदालतों ने उसके प्रसार पर रोक लगाने की कोशिश की।

स्वामी नित्यानंद का वीडियो विवाद, अभिनेता शाइनी आहूजा की बलात्कार में सजा और 1970 के दशक का सुरेश राम से जुड़ा राजनीतिक सेक्स-फोटो विवाद बताते हैं कि यह बीमारी नई नहीं है।
नई सिर्फ कैमरे की ताकत है। सोशल मीडिया की रफ्तार है। और शायद समाज की याददाश्त भी थोड़ी तेज हुई है।
पैटर्न साफ दिखाई देता है
इन मामलों को साथ रखिए तो कुछ बातें साफ दिखती हैं।
आरोप और अंतिम कानूनी फैसले के बीच अक्सर बहुत लंबा फासला होता है। तेजपाल का मामला तेरह साल चला। कई मामलों में अपीलें वर्षों तक चलती रहती हैं।
नतीजे भी अलग-अलग रहे। कहीं दोषसिद्धि हुई। कहीं बरी किया गया। कहीं मामला अभी अदालतों में है। इसलिए आरोप को फैसला मानना भी गलत है और बरी होने को हर सवाल का अंत मान लेना भी।
कई मामलों में पीड़ित महिलाएँ उस व्यक्ति पर संस्थागत रूप से निर्भर थीं। घरेलू कामगार, नाबालिग लड़कियाँ और खेल संघों के अधीन रहने वाली महिला खिलाड़ी इसका उदाहरण हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता मुक्ता गुप्ता कहती हैं, “सूची में आरोपी और दोषी सभी पुरुष हैं। महिलाएँ आरोप लगाने वाली, पीड़ित या सर्वाइवर के रूप में दिखाई देती हैं।”
उनका कहना है कि यह केवल भारत की कहानी नहीं है। दुनिया भर में सार्वजनिक जीवन के ताकतवर पुरुषों पर यौन दुर्व्यवहार के आरोप सामने आते रहे हैं। सत्ता, राजनीतिक पद, फिल्मी हैसियत और धार्मिक प्रभाव जैसे पद अक्सर एक असमान शक्ति-संबंध स्थापित करते हैं।
महिला सार्वजनिक हस्तियों पर भी विवाद होते हैं। लेकिन भारत में उनके खिलाफ मामले अधिकतर भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद या निजी जीवन से जुड़े विवादों के रूप में सामने आते हैं।
असली सवाल अभी बाकी है
मामले आते रहते हैं। अदालतें अपनी रफ्तार से चलती रहती हैं। वकील तारीखें लेते रहते हैं। गवाह थकते रहते हैं। पीड़ित इंतजार करते रहते हैं।
और जनता?
जनता कुछ दिन गुस्सा करती है। फिर अगली खबर पर चली जाती है।
यही शायद इस पूरी कहानी का सबसे कड़वा सच है।
कानून अंधा हो सकता है, लेकिन सत्ता कभी-कभी बहुत अच्छी तरह देखती है कि रास्ता कहाँ से निकलेगा।
तो सवाल फिर वही है:
एक औरत को कितनी बार बोलना पड़ेगा, तब जाकर व्यवस्था सचमुच सुनेगी?

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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