भोपाल। हाल में सोशल मीडिया पर एक वीडियो बार-बार सामने आ रहा है, जिसमें दुर्गा माँ के वेश में एक नृतकी के रूप में नृतक अशोभनीय ढंग से नृत्य करती दिखाई दे रहा है। शरीर का अग्र भाग मालाओं से और पीछे का भाग लंबे बालों से ढका हुआ है लेकिन एक क्षण में वह अपने बाल उठाकर दर्शकों की ओर अपनी देह का वह हिस्सा भी प्रदर्शित करता है।
स्वाभाविक है कि इसे देखकर अनेक लोगों की धार्मिक भावनाएँ आहत हुई हैं। माना कि संभव है नृतक ने अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर सस्ती प्रसिद्धि के लिए इस तरह नग्न होकर नृत्य करने का साहस किया।सोशल मीडिया पर प्रश्न उठ रहा है कि क्या यह हिंदू धर्म की आस्था पर प्रहार है?
लेकिन मेरे मन में इस वीडियो को देखकर सबसे पहला प्रश्न कुछ और उठता है।
“वहाँ बैठे लोग उस समय बैठे क्यों रहे?”
लेकिन मेरे मन में इस वीडियो को देखकर सबसे पहला प्रश्न कुछ और उठता है।
“वहाँ बैठे लोग उस समय बैठे क्यों रहे?”
क्या उनमें से एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं था जो उठकर कहता, “बस, यह नहीं चलेगा?” क्या एक भी व्यक्ति मंच की ओर बढ़कर कार्यक्रम रुकवा नहीं सकता था?
क्या हम इतने असहाय हो गए हैं कि अपने सामने होने वाली किसी भी बात पर प्रतिक्रिया देने के बजाय पहले कैमरा निकालते हैं, वीडियो बनाते हैं और फिर सोशल मीडिया पर आक्रोश व्यक्त करते हैं?
हिंदू धर्म इतना कमजोर नहीं है कि किसी नृतकी के अशोभनीय नृत्य से उसकी आस्था टूट जाए।
हिंदू धर्म हजारों वर्षों की परंपरा है। उसमें प्रश्न पूछने की जगह है, असहमति की जगह है, तर्क की जगह है, दर्शन है, विविधता है और सबसे बड़ी बात—वह स्वयं को किसी एक व्यक्ति की हरकत से समाप्त हो जाने वाला धर्म नहीं मानता।
हिंदू धर्म इतना कमजोर नहीं है कि किसी नृतकी के अशोभनीय नृत्य से उसकी आस्था टूट जाए।
हिंदू धर्म हजारों वर्षों की परंपरा है। उसमें प्रश्न पूछने की जगह है, असहमति की जगह है, तर्क की जगह है, दर्शन है, विविधता है और सबसे बड़ी बात—वह स्वयं को किसी एक व्यक्ति की हरकत से समाप्त हो जाने वाला धर्म नहीं मानता।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि आस्था के प्रतीकों के साथ कुछ भी करने की अनुमति होनी चाहिए और यहीं से असली प्रश्न शुरू होता है।
हम स्वयं अपने धर्म के प्रतीकों को किस तरह इस्तेमाल करते हैं, कभी उस पर भी विचार कीजिए।बीड़ी और पटाखों के बंडलों पर देवी-देवताओं के चित्र छपते हैं। पूजा के बाद वही पैकेट कूड़े में फेंक दिए जाते हैं। सड़कों पर धार्मिक पात्रों का स्वांग करके लोग कभी-कभी ऐसी हरकतें करते हैं जिनका धर्म से दूर-दूर तक संबंध नहीं होता।
विवाह समारोहों में दूल्हा-दुल्हन के स्वागत के लिए कृष्ण-राधा के रूप में कलाकारों को बुलाया जाता है। कई बार यह प्रस्तुति श्रद्धा से अधिक मनोरंजन बन जाती है।
सड़कों पर नाचते भगवान के स्वरूप, शिव का रूप धारण किए बहरूपिए सार्वजनिक स्थानों पर बैठे दिखाई देते हैं और कभी वे किसी जगह बैठे शराब पी रहे दिखते हैं। कांवड़ यात्रा ,दुर्गा पूजा आदि में तेज आवाज में बजते डीजे, नाचते थिरकते उन्मुक्त युवा…क्या विरोध यहां नहीं होना चाहिए?
उस समय कितने लोग कहते हैं कि भगवान का रूप मनोरंजन का सामान नहीं है? कितने लोग अपने ही धार्मिक आयोजनों में यह प्रश्न उठाते हैं कि आस्था और तमाशे के बीच की रेखा कहाँ है?
उस समय कितने लोग कहते हैं कि भगवान का रूप मनोरंजन का सामान नहीं है? कितने लोग अपने ही धार्मिक आयोजनों में यह प्रश्न उठाते हैं कि आस्था और तमाशे के बीच की रेखा कहाँ है?

फिर इस नृत्य पर आपत्ति क्यों?क्योंकि हर चीज समान नहीं होती।
किसी देवी-देवता की कलात्मक प्रस्तुति और जानबूझकर धार्मिक प्रतीक को अश्लीलता के साथ जोड़ना एक ही बात नहीं है।
कृष्ण की रासलीला का नृत्य अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक पृष्ठभूमि में एक बात है; किसी देवी के रूप को केवल उत्तेजक प्रदर्शन का माध्यम बना देना दूसरी बात।
धर्म के प्रतीकों का इस्तेमाल कला में हो सकता है, व्यंग्य में हो सकता है, रंगमंच पर हो सकता है लेकिन संदर्भ, उद्देश्य, प्रस्तुति और मर्यादा का प्रश्न हमेशा रहेगा।
यही अंतर हमें समझना होगा।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि जो मन में आए, जैसे मन में आए, वैसा करने का असीम अधिकार मिल गया।
भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मौलिक अधिकार है, लेकिन संविधान स्वयं इसके ऊपर कुछ युक्तिसंगत प्रतिबंधों की व्यवस्था करता है। इसी तरह वर्तमान कानून में भी धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर और दुर्भावनापूर्वक आहत करने वाले कृत्यों के लिए प्रावधान हैं। भारतीय न्याय संहिता की धारा 299 ऐसे कृत्यों को दंडनीय बनाती है, जब धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के पीछे जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य हो।
इसलिए केवल यह कह देना कि “यह मेरी कला है, मेरी अभिव्यक्ति है, हर परिस्थिति में अंतिम उत्तर नहीं हो सकता।
लेकिन दूसरी ओर, केवल यह कह देना भी ठीक नहीं कि “मेरी धार्मिक भावना आहत हुई, इसलिए हर ऐसी अभिव्यक्ति अपराध है।”क्योंकि धर्म की रक्षा और धर्म के नाम पर असहमति को दबाना,दो अलग बातें हैं।
हमें यह अंतर समझना ही होगा और शायद इस पूरे प्रसंग में सबसे बड़ी कमी उस नृतकी की नहीं, हमारी सामूहिक मानसिकता की है कि हम विरोध करने के समय चुप रहते हैं और वायरल होने के बाद जागते हैं।
हम अपने सामने गलत होते देखकर कहते हैं, “मुझे क्या करना?”
लेकिन वही घटना मोबाइल की स्क्रीन पर दिखाई देती है तो हमारा धर्म, हमारी संस्कृति और हमारी भावनाएँ अचानक जाग उठती हैं।
सोचिए, क्या यह विरोध है या केवल सोशल मीडिया का आक्रोश?
अगर किसी कार्यक्रम में हमारी आस्था का खुलेआम उपहास हो रहा है और हम वहाँ बैठे रहकर देखते हैं, तो उस समय हमारी चुप्पी भी एक तरह की स्वीकृति बन जाती है।
विरोध का अर्थ हिंसा नहीं है।विरोध का अर्थ गाली देना नहीं है।विरोध का अर्थ भीड़ इकट्ठी करके किसी को पीटना नहीं है।
विरोध का अर्थ हिंसा नहीं है।विरोध का अर्थ गाली देना नहीं है।विरोध का अर्थ भीड़ इकट्ठी करके किसी को पीटना नहीं है।
विरोध का अर्थ है…शांतिपूर्वक कहना कि यह स्वीकार्य नहीं है, आयोजक से कार्यक्रम रोकने को कहना, आवश्यकता हो तो शिकायत करना और कानून के रास्ते पर जाना और यदि कोई कानून नहीं टूटा केवल हमारी भावनाएँ आहत हुई हैं, तब भी हम उस कला या प्रस्तुति का शांतिपूर्ण बहिष्कार कर सकते हैं।
यही एक सभ्य समाज की पहचान है।
यही एक सभ्य समाज की पहचान है।
हमें यह भी तय करना होगा कि हम वास्तव में धर्म की रक्षा करना चाहते हैं या केवल धर्म के नाम पर अपना आक्रोश प्रदर्शित करना चाहते हैं क्योंकि धर्म किसी वीडियो से नहीं टूटता।
धर्म तब कमजोर होता है जब उसके अनुयायी उसकी मर्यादा को स्वयं अपने व्यवहार में छोड़ देते हैं।
भगवान की तस्वीर बीड़ी के पैकेट पर छपने से यदि हमें आपत्ति नहीं होती, धार्मिक पात्रों का बाजार में प्रदर्शन देखकर हम हँसकर आगे निकल जाते हैं, मंदिरों और धार्मिक प्रतीकों के आसपास गंदगी देखकर हमें फर्क नहीं पड़ता लेकिन सोशल मीडिया पर कोई विवादित वीडियो आते ही हम धर्मरक्षक बन जाते हैं तो समस्या केवल सामने वाले की नहीं है।
हमारी आस्था चयनात्मक हो गई है।
भगवान की तस्वीर बीड़ी के पैकेट पर छपने से यदि हमें आपत्ति नहीं होती, धार्मिक पात्रों का बाजार में प्रदर्शन देखकर हम हँसकर आगे निकल जाते हैं, मंदिरों और धार्मिक प्रतीकों के आसपास गंदगी देखकर हमें फर्क नहीं पड़ता लेकिन सोशल मीडिया पर कोई विवादित वीडियो आते ही हम धर्मरक्षक बन जाते हैं तो समस्या केवल सामने वाले की नहीं है।
हमारी आस्था चयनात्मक हो गई है।
हमें तय करना होगा कि हमें अपने धर्म के प्रतीकों का सम्मान चाहिए या केवल उनके अपमान पर वायरल होने का अवसर और शायद आज इस पूरे विवाद से हमें यही सीखने की जरूरत है—
हिंदू धर्म को किसी से बचाने की जरूरत नहीं है।
हिंदू धर्म को किसी से बचाने की जरूरत नहीं है।
जरूरत है तो अपने भीतर की उस संवेदना को बचाने की, जो भगवान के प्रतीक को देखकर केवल भावुक नहीं होती बल्कि उसके सम्मान की जिम्मेदारी भी समझती है।
आस्था इतनी कमजोर नहीं कि कोई उसे तोड़ दे लेकिन आस्था इतनी सस्ती भी नहीं होनी चाहिए कि हम उसे अपने ही हाथों तमाशा बना दें।
आस्था इतनी कमजोर नहीं कि कोई उसे तोड़ दे लेकिन आस्था इतनी सस्ती भी नहीं होनी चाहिए कि हम उसे अपने ही हाथों तमाशा बना दें।



