सोनम वांगचुक पर एक टिप्पणी

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साकेत बिहारी पाण्डेय

भुवनेश्वर : जब जब बलात ओढ़ी गई करुणा की नकियाई सी स्त्रैण ध्वनि (सोनम वांगचुक) सुनता हूं…..

“हरेक आदमी
मुखौटा पहने हुए है।
इसलिए यदि तुम किसी आदमी से मिलो
तो यह मत समझो कि वह वही है
जो दिखाई पड़ता है।
उसे सावधानी से देखो।”। (गजानन माधव मुक्तिबोध)

सोनम वांगचुक एक फ्रॉड आईडेंटिटी है। उसके सारे इन्वेंशन या तो वो इन्वेंशन ही नहीं हैं या किसी और के द्वारा किए गए हैं। आर्टिफिशियल ग्लेशियर लद्दाख के एक सिविल इंजीनियर chewang नॉरफेल के द्वारा किया गया है। इंटरनेट वाईफाई का जो मामला है वो नव वायरलेस कंपनी के हार्दिक सोनी के द्वारा उन्हें प्रदान किया गया था। जिसका कि क्रेडिट भी वो खा गए।

दूसरी बात यह कि वो neet विद्यार्थियों के लिए आंदोलन कर रहे हैं। बात उपरी तौर पर सही लग सकती है लेकिन है नहीं। काक्रोचेस के पास कोई सोशली वैलिड चेहरा नहीं था। दीपके, राठी, हरियाणवी डांसर दहिया, या उसका सोशल मीडिया मैनेजर सौरभ दास … किसी के पास भी नहीं। ऐसे में सोनम वांगचुक उसे एक नेता मिला जिससे वो अपना काम आगे बढ़ा सकते थे। वांगचुक के आने के पहले कॉकरोच का प्रोटेस्ट समलैंगिकों के प्राइड मार्च से अधिक कुछ भी नहीं था।

वांगचुक: वांगचुक और उनका एनजीओ गृह मंत्रालय के विदेशी फंडिंग रोकथाम विभाग के द्वारा ब्लैकलिस्टेड है। फिर भी लूप होल्स निकालकर इन्होंने फंडिंग की व्यवस्था कर रखी थी। वांगचुक ऐसा क्या कर रहे हैं जो इन्हें अमेरिका एवं अन्य देशों से फंडिंग पुश हो रहा है ?

वांगचुक एक बार आंदोलन कर के फेल हो चुके हैं। इन्हें दूसरे मौके की तलाश थी। भारत में गांधी जी द्वारा ईजाद किया तरीका आज भी प्रभावकारी है। सहज ही कोई भी कह देगा कि बेचारा आम आदमी के लिए मर रहा है और सरकार इसकी सुध नहीं ले रही है। संवेदना मिलनी आसान हो जाती है। कॉकरोच और वांगचुक एक दूसरे के लिए बने थे। ‘राम मिलाए जोड़ी। एक अंधा एक कोढ़ी।’ वांगचुक को दूसरा मौका चाहिए था और कॉकरोच को एक वैलिड चेहरा। यहीं आकर दोनों की आवश्यकताएं पूरी हो जाती है। अफस्पा हटाने के लिए इरोम शर्मिला ने ऐसे ही नाटक रचे थे। समय कांग्रेस का था। कुछ नहीं हुआ क्योंकि नेशनल सिक्योरिटी का मामला था। हारकर अंतिम में उन्होंने विवाह किया और बच्चे किए। आज उनकी एक हैप्पी फैमिली है।

अब आते हैं कॉकरोच पर : कॉकरोच के निदेशक श्री दीपके जी ने अपना संबंध राठी से खुलेआम स्वीकार किया है। राठी ने अपना एक शोधार्थी दीपके को डोनेट किया। दीपके ने दहिया को अपने साथ किया। आंदोलन के लिए मचलते प्राइड मार्च के प्राइम मेंबर्स को कॉन्ट्रैक्ट्स मिला और वो पहुंच गए। आंदोलन हुआ। बाद में वांगचुक इनसे आकर जुड़ते हैं। क्यों … ? क्या वांगचुक को नहीं पता था कि विदेश में रहने वाले कॉकरोच अधिपति अचानक भारत में आकर जनहित के मुद्दे क्यों चला रहे हैं ? उन्हें पता था इसलिए ही आकर वो जुड़े थे। कॉकरोच अधिपति एवं वांगचुक दोनों का हैंडलर एक ही है। CIA दोनों को हैंडल कर रही है। CIA ने ही वांगचुक को पुरस्कार दिलवाया। उसका प्रचार किया। CIA एक दिन में अपने मोहरे नहीं उगलती है। लंबे समय से उसका पब्लिक प्रोफाइल तैयार करती है फिर उसे फील्ड में उतारती है। ठीक वैसे ही जैसे पटनायक हिंदू पुराणों का व्याख्याता बना हुआ है। पहले अपनी स्वीकारोक्ति बनाओ उसके बाद उसका प्रयोग जहर घोलने में करो।

अब प्रश्न है कि क्या सरकार मासूम है? सरकार वांगचुक से ज्यादा हरामी है। मासूम विद्यार्थियों का जीवन दांव पर लगाकर अजगर की तरह सो रही है। एक भी परीक्षा बिना पेपर लीक संपन्न नहीं हो रहा है लेकिन प्रधानमंत्री के कान पर जूं नहीं रेंग रहा है। धर्मेंद्र प्रधान एक जोंकनुमा व्यक्तित्व है। वह अपने फायदे देखता है बाकी चीजों से उसे कोई मतलब नहीं है। सेंट्रल यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र और विज्ञान विषयों में नियुक्तियों में राज्यवार डाटा निकाल लीजिए। आपको एक पैटर्न मिलेगा। कुछ लोग वाइस चांसलर के मामले में भी कुछ ऐसे ही डेटा की ओर संकेत कर रहे हैं। यह संकेत गलत नहीं है। पैटर्न तो है। भारतीय जनता पार्टी की सरकार अपनी नैतिक दृढ़ता से उतरकर सरकार के स्थायित्व की दृढ़ता की ओर कार्य कर रही है। इस पार्टी ने अब वो सारे कार्य किए हैं जिनसे कभी इनका विरोध रहा है। ऐसी परिस्थिति में जनहित तेल लेने गया।

सरकार की इसी संवेदनहीनता और नकारपने का फायदा वांगचुक CIA आदि उठा रहे हैं। भाजपा अपनी एक मूर्खता के चलते पूरे देश में अपने खिलाफ माहौल बनवा रही है, एक देशद्रोही को वैलिडेशन दिलवा रही है, फर्जी संवेदना तैयार करवा रही है।

बाकी … रथयात्रा आ गई है …

जय जगन्नाथ

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