विजय मनोहर तिवारी
भोपाल। गीता कोई धार्मिक ग्रंथ है ही नहीं। वह मनोविज्ञान की संसार की सबसे पुरानी किताब है। जैसे अशोका सही नहीं है, अशोक ही सही है। उसी तरह गीता भी गीता नहीं एक गीत है, एक कविता है। आज के जेन-जी के अगर कोई ईश्वर हो सकते हैं तो वो केवल श्रीकृष्ण हैं। गीता जेन-जी के लिए ही है। क्योंकि आज के युवा को तर्क चाहिए। यथार्थ में वह जीता है। गीता उसके लिए सच्चा मार्गदर्शन करती है।
डॉ. विजय अग्रवाल का यह परिचय सब जानते हैं कि वे भारत के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति रहे डॉ. शंकरदयाल शर्मा के साथ दस साल ओएसडी के रूप में रहे हैं। वे प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो के अधिकारी थे मगर उसके पहले पाँच साल एक कॉलेज में पढ़ाया भी। उनकी लिखी किताबों की सूची लंबी है, जिसमें श्रीराम, हनुमान और गीता से लेकर समय प्रबंधन जैसे विषय शामिल हैं। गुरुजनों के लिए गीता विषय पर उन्हें सुनना अपनी ही विरासत से अपना जोड़ और मजबूत करने का अनुभव रहा।
वे कहते हैं कि गीता मनुष्य के पहचान के संकट की समस्या को संबोधित करती है। यही महाभारत की समस्या है। कुरुक्षेत्र में अर्जुन की पहचान एक योद्धा की है। वह सशस्त्र होकर आया है युद्ध के लिए। मगर आते ही विरक्त हो रहा है। अपनी पहचान से दूर हो रहा है। अपनी पहचान भूल रहा है। अब उसे सारे कौरव अपने संबंधी दिखाई पड़ रहे हैं और युद्ध की व्यर्थता पर विचार कर रहा है। अर्जुन के सारे तर्क थोथे हैं। हास्यास्पद हैं। एक प्रकार से विदुर को छोड़कर महाभारत के सारे पात्र इसी समस्या में पड़े हैं।
यह आज के युग में हम सबकी समस्या है। अर्जुन, कर्ण, भीष्म सहित सभी पात्र जीवन में हम सबके भीतर इसी संकट में डाले हुए रखते हैं। हम अपने मूल स्वभाव में नहीं होते। गीता यहीं हमें थामती आई है। वह कहती है कि अपने कर्म को ठीक से करें। वही आपका धर्म है। और अपने धर्म में मृत्यु परधर्म से श्रेष्ठ है।
गुरुजनों के लिए डॉ. अग्रवाल कहते हैं कि वह केवल एक विषय ही नहीं पढ़ाता। वह विषय के बहाने बहुत कुछ पढ़ाता है। जीवन का सार पढ़ाता है। तत्वज्ञानी का मतलब है ज्ञानवान होना और तत्वदर्शी का अर्थ है व्यावहारिक ज्ञान से अनुभव संपन्न होना।
उज्जैन में कृष्ण केवल 64 दिन रहे और 64 कलाओं में निष्णात होकर निकले। वह व्यावहारिक ज्ञान में पारंगत यहाँ हुए और उसके बाद वाराणसी जाकर घोर अंगीरस नाम के ऋषि से सांख्य दर्शन सीखा। व्यावहारिक ज्ञान और दार्शनिक ज्ञान के बाद ही गीता कही उन्होंने। एक गहराई उसमें है, जिसके कारण व्याख्या की जरूरत पड़ती है। हर श्लोक में कृष्ण का अनुभव झलकता है। गीता के 700 श्लोकों में से 574 श्लोक कृष्ण के हैं। 84 अर्जुन के।
अंत में वे अर्जुन से पूछते हैं-“तुमने मेरी बातों को ध्यान से सुना?’ अर्जुन कहता है-“अमृत की बूंदों की तरह ग्रहण किया है।’ तब कृष्ण उत्तर देते हैं-“अब जो इच्छा हो वह करो। अब निर्णय तुम लो।’
गीता हमारे जीवन का मैनुअल है। गीता कहती है कि ज्ञान से पवित्र इस धरती पर कुछ नहीं है। गीता में कृष्ण का कथन है-“ज्ञान के माध्यम से जो मेरी पूजा करता है, वही मेरी सच्ची पूजा है।’
कृष्ण अपने विराट रूप दर्शन में संसार की प्रत्येक रचना में स्वयं को श्रेष्ठतम रूप में परिभाषित करते हैं। हाथियों में एरावत, पर्वतों में हिमालय। मगर पांडवों में स्वयं को युधिष्ठिर नहीं बताते। कहते हैं पांडवों में मैं अर्जुन हूं। यह एक व्यावहारिक संकेत है कि यदि काम अभी अर्जुन से लेना है तो अर्जुन को ही संबोधित होना है। अर्जुन को उनके हर संबोधन- पार्थ या कौंतेय के अपने अर्थ हैं। हर संबोधन अर्जुन को किसी स्मृति से जोड़ रहा है ताकि वह अपने स्वभाविक धर्म को पहचाने और सारी दुविधा से बाहर आकर अपने कर्म में लग जाए।
श्रीकृष्ण द्वारिका जाने के पहले हस्तिनापुर में अर्जुन ने पूछा-“आप द्वारिका जा रहे हैं। कुरुक्षेत्र का ज्ञान स्मृतियों में धुंधला गया है। कृपया वही ज्ञान एक बार फिर से दें।’ कृष्ण कहते हैं- “कुरुक्षेत्र के कृष्ण को हस्तिनापुर के महलों में ढूँढ रहे हो।’ इसका अर्थ है कि कृष्ण संकेत कर रहे हैं कि कोई भी दार्शनिक विचार परिस्थितिजन्य होता है। ऐसा नहीं कि कभी भी कहीं भी कुछ भी बोल दिया।
“कृष्ण नाम के बादल में जो कुछ भी था वह कुरुक्षेत्र के मैदान में गीता के रूप में बरस गया।’
(डॉ. विजय अग्रवाल भोपाल में रहते हैं। सिविल सेवाओं की तैयारी करने वालों के लिए यूट्यूब पर उनके वीडियो उपलब्ध हैं। उनकी किताबें ऑनलाइन उपलब्ध हैं।)



