श्रीराम मंदिर का दान : श्रद्धा, मर्यादा की कसौटी पर 

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लखनऊ । अयोध्या स्थित भगवान श्रीरामलला के मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित की जाने वाली भेंट-राशि में अनियमितता की घटना सामने आई है। इसे एक साधारण प्रशासनिक चूक मानकर अनदेखा करना उचित नहीं होगा। यह मात्र एक मंदिर नहीं है, बल्कि करोड़ों हिंदुओं श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। इससे जुड़ी किसी भी अनियमितता का प्रभाव केवल प्रशासनिक स्तर तक ही सीमित नहीं रह सकता। यह लाखों श्रद्धालुओं की भावनाओं को गहराई से स्पर्श करती है। पाँच सौ वर्षों के दीर्घ संघर्ष और प्रतीक्षा के बाद जिस मंदिर में श्रीरामलला विराजमान हुए, वहाँ एक-एक रुपये की भेंट केवल धनराशि नहीं, बल्कि करोड़ों भक्तों के अश्रु, उनकी पीढ़ियों की प्रतीक्षा और अटूट श्रद्धा का प्रतीक है। ऐसे पावन स्थल पर उठा कोई भी प्रश्न सीधे जनमानस के हृदय को छूता है। आहत करता है।

श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास में विश्व हिंदू परिषद तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े अनेक समर्पित भक्त स्वयं सेवक वर्षों से इस पावन स्थल पर सेवाकार्य में दायित्व निभा रहे हैं। उनका जीवन सादगी और राष्ट्रसेवा के मूल्यों पर आधारित रहा है। ऐसे में इस प्रकरण को न्यास के समस्त कार्यकर्ताओं से जोड़ना थोड़ा बेमानी हो जाएगा। साथ ही, इस घटना की गंभीरता को देखते हुए व्यापक और पारदर्शी जाँच अपेक्षित है, चल भी रही है। जिन भक्तों ने दूर-दूर से, कष्ट सहकर, अपनी श्रद्धा-निधि भगवान के चरणों में अर्पित की, उनके विश्वास को आहत नहीं होने देना अब श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास का प्रथम परम कर्तव्य है।

यह विदित है कि कुछ ऐसे व्यक्ति भी धर्म कार्ययुक्त ऐसे संगठन में स्थान पा लेते हैं जो चरित्र, योग्यता या प्रतिबद्धता में अपेक्षित स्तर पर खरे नहीं उतरते। यह किसी संगठन की विफलता नहीं, बल्कि मानवीय स्वभाव और विशाल संगठनात्मक संरचना की एक नैसर्गिक सीमा है। महत्त्वपूर्ण यह है कि संगठन इसे पहचाने और सुधार की दिशा में सक्रिय व त्वरित कदम उठाए। एक और विचारणीय पक्ष है कि किसी भी बड़े संगठन में श्रेष्ठ और समर्पित कार्यकर्ता प्रायः मौन साधना में लीन रहते हैं। वे प्रचार और प्रशंसा से दूर रहकर कार्य करते हैं। दूसरी ओर, कुछ व्यक्ति चाटुकारिता और दिखावे के बल पर नेतृत्व के निकट पहुँच जाते हैं। यह प्रवृत्ति किसी भी संस्था-संगठन के लिए हानिकारक होती है। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास में जो हुआ, उसके मूल में कहीं न कहीं यही कमज़ोरी परलक्षित हो रही है।

संघ के पास आत्मावलोकन की एक सुदृढ़ परंपरा-पद्धति है, 100 वर्षों का संगठन अनुभव भी है। जनमानस की यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि संघ इस घटना को गंभीरता से लेगा और भविष्य में कोई पुनरावृत्ति न हो, ऐसा आवश्यक आंतरिक मंथन भी करेगा। केवल पुलिस, सीबीआई या एसआईटी जाँच पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास को स्वयं आगे आकर एक स्वतंत्र, पारदर्शी और विश्वसनीय जाँच सुनिश्चित करनी चाहिए।

इस घटना का एक और आयाम है। जब भी किसी धार्मिक संस्था में इस प्रकार की अनियमितता होती है, तो कुछ अवसरवादी तत्त्व इसे राजनीतिक रंग देने का प्रयास करते हैं। धर्म और राजनीति दोनों से ही ऐसे स्वर उठते हैं जो इस प्रसंग को अनावश्यक रूप से विवादास्पद बना देना चाहते हैं। हिंदू समाज से अपेक्षा है कि वह ऐसी उत्तेजनाओं से बचकर शांत और विवेकपूर्ण दृष्टिकोण अपनाए।
अंततः यह प्रसंग हमें स्मरण दिलाता है कि धार्मिक संस्थाओं में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और नैतिक मानकों का पालन कितना आवश्यक है। करोड़ों भक्तों की श्रद्धा का यह पावन केंद्र किसी प्रकार की अनदेखी या लापरवाही का भार वहन नहीं कर सकता। समय की माँग है कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास अपनी प्रबंधन व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़, पारदर्शी तथा जवाबदेह बनाए। ताकि श्रीरामलला के प्रति समाज की अटूट आस्था और विश्वास बना रहे।

भगवान श्रीराम और इस विशाल मंदिर के प्रति आस्था केवल एक धार्मिक भावना नहीं, बल्कि सदियों की पीड़ा, संघर्ष और प्रतीक्षा से उपजा अमूल्य विश्वास है। जिसे हर भारतीय ने अपने हृदय में श्रीरामलला के प्रतिबिंब रूप संजोकर रखा हुआ है।। यह विश्वास अक्षुण्ण रहे, यही समस्त हिंदू समाज की हार्दिक अभिलाषा और अपेक्षा है। यह अपेक्षा विभिन्न संगठनों और सरकारों से है, क्योंकि भारत का भक्तिमय समाज अब सुदृढ़ है, सशक्त है, जो हर परिस्थिति को प्रभु की इच्छा मान जीवन पथ पर बढ़ता है। होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥

(लेखक चिंतक-विचारक, पर्यावरणविद -समाजसेवी हैं एवं
शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली में राष्ट्रीय सह-सचिव के दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं)

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संजय स्वामी

संजय स्वामी

लेखक शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय संयोजक (पर्यावरण शिक्षा) हैं

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