सूचना का अधिकार :  स्वप्रेरित प्रकटीकरण से लोकतंत्र होगा अधिक पारदर्शी

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लखनऊ। भारतीय लोकतंत्र ने सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 के माध्यम से नागरिकों को शासन में भागीदारी का एक ऐसा संवैधानिक औजार प्रदान किया, जिसने पहली बार यह स्पष्ट किया कि सरकारी सूचनाएँ सरकार की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि जनता की धरोहर हैं। यह कानून केवल सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया निर्धारित करने वाला अधिनियम नहीं था, बल्कि शासन की संस्कृति बदलने का एक क्रांतिकारी प्रयास था। इसका उद्देश्य यह नहीं था कि प्रत्येक नागरिक अपने ही पैसे से चलने वाले सरकारी विभागों से हर छोटी-बड़ी जानकारी के लिए आवेदन लिखे, शुल्क जमा करे, निर्धारित समय तक प्रतीक्षा करे और आवश्यकता पड़ने पर प्रथम तथा द्वितीय अपीलों की लंबी प्रक्रिया से गुजरे। इस कानून का वास्तविक दर्शन इससे कहीं अधिक व्यापक था। इसकी मूल भावना यह थी कि सरकार स्वयं अधिकतम सूचनाएँ सार्वजनिक करे, ताकि नागरिकों को सूचना माँगने की आवश्यकता ही न्यूनतम रह जाए। दुर्भाग्य से दो दशकों के अनुभव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत में सूचना के अधिकार की प्रक्रिया तो विकसित हुई, किंतु उसकी आत्मा आज भी प्रशासनिक फाइलों में कहीं दबकर रह गई है। सूचना माँगना सामान्य हो गया है और सूचना देना अब भी अपवाद बना हुआ है।

आज देश में प्रतिवर्ष लाखों आरटीआई आवेदन दायर किए जाते हैं। इनमें से बड़ी संख्या ऐसे प्रश्नों की होती है जिनका उत्तर किसी भी आधुनिक, पारदर्शी और उत्तरदायी सरकार की वेबसाइट पर पहले से उपलब्ध होना चाहिए। नागरिक किसी भर्ती की चयन सूची जानना चाहता है, किसी सड़क निर्माण पर हुए व्यय का विवरण देखना चाहता है, किसी सरकारी योजना के लाभार्थियों की सूची प्राप्त करना चाहता है, किसी परियोजना की प्रगति रिपोर्ट समझना चाहता है, किसी विभाग का बजट या निविदा प्रक्रिया देखना चाहता है, या यह जानना चाहता है कि उसके आवेदन पर क्या कार्रवाई हुई। इन सूचनाओं के लिए आरटीआई आवेदन की आवश्यकता ही क्यों पड़े? यदि प्रत्येक सार्वजनिक प्राधिकरण नियमित रूप से अपनी वेबसाइटों को अद्यतन रखे और इन सभी जानकारियों को व्यवस्थित, खोजने योग्य तथा डाउनलोड करने योग्य स्वरूप में उपलब्ध कराए, तो न केवल नागरिकों का समय और धन बचेगा, बल्कि सरकार स्वयं भी अनावश्यक प्रशासनिक बोझ से मुक्त हो जाएगी। आज हजारों जन सूचना अधिकारी अपने समय का बड़ा भाग उन सूचनाओं को खोजने और उपलब्ध कराने में व्यतीत करते हैं जिन्हें तकनीकी रूप से एक बार सार्वजनिक कर देने के बाद लाखों लोग बिना किसी अतिरिक्त सरकारी प्रयास के देख सकते हैं। यह केवल प्रशासनिक अक्षमता नहीं, बल्कि सार्वजनिक संसाधनों का अनावश्यक अपव्यय भी है।

लोकतांत्रिक शासन में पारदर्शिता का अर्थ केवल भ्रष्टाचार सामने आने के बाद जाँच करना नहीं होता, बल्कि ऐसी व्यवस्था विकसित करना होता है जिसमें भ्रष्टाचार की संभावनाएँ प्रारंभ से ही सीमित हो जाएँ। स्वप्रेरित प्रकटीकरण इसी सिद्धांत पर आधारित है। जब किसी विभाग का प्रत्येक व्यय, प्रत्येक निविदा, प्रत्येक ठेका, प्रत्येक भुगतान, प्रत्येक परियोजना की प्रगति, प्रत्येक खरीद, प्रत्येक नियुक्ति और प्रत्येक प्रशासनिक निर्णय जनता की निगाह में होता है, तब अनियमितताओं के लिए स्थान स्वतः संकुचित हो जाता है। दुनिया के अनेक लोकतांत्रिक देशों ने पिछले दो दशकों में ‘ओपन गवर्नमेंट’ और ‘ओपन डेटा’ की अवधारणाओं को इसलिए अपनाया क्योंकि उन्होंने समझ लिया कि सूचना को छिपाना शासन की शक्ति नहीं, बल्कि उसकी कमजोरी का संकेत है। जितनी अधिक जानकारी जनता के पास होगी, उतनी ही अधिक जवाबदेही स्थापित होगी और उतना ही अधिक विश्वास लोकतांत्रिक संस्थाओं में विकसित होगा। इसके विपरीत जहाँ सामान्य सूचनाएँ भी नागरिकों से छिपाई जाती हैं, वहाँ संदेह, अविश्वास और भ्रष्टाचार की संस्कृति स्वतः विकसित होती है।

डिजिटल प्रौद्योगिकी ने आज सरकारों के सामने वह अवसर उपलब्ध करा दिया है जिसकी कल्पना सूचना का अधिकार अधिनियम बनाते समय भी सीमित रूप में ही की गई होगी। अब किसी सूचना को सार्वजनिक करना न तो अत्यधिक महँगा है और न ही तकनीकी रूप से कठिन। प्रत्येक मंत्रालय, विभाग, विश्वविद्यालय, स्थानीय निकाय, सार्वजनिक उपक्रम, विकास प्राधिकरण और पंचायत अपने अभिलेखों का डिजिटल प्रबंधन कर सकता है। वेबसाइटों पर केवल औपचारिक परिचय या अधिकारियों की सूची डाल देना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक पारदर्शिता तब होगी जब बजट, व्यय, ऑडिट रिपोर्ट, परियोजनाओं की प्रगति, निविदाएँ, अनुबंध, सेवा मानक, भर्ती प्रक्रिया, शिकायत निवारण की स्थिति, बैठकों के निर्णय, वार्षिक प्रतिवेदन, लाभार्थियों के आँकड़े और नागरिकों से संबंधित प्रत्येक महत्त्वपूर्ण सूचना समयबद्ध रूप से सार्वजनिक की जाए। यह भी आवश्यक है कि यह सूचना केवल अंग्रेज़ी तक सीमित न रहे, बल्कि भारतीय भाषाओं में भी उपलब्ध हो, ताकि सूचना का अधिकार वास्तव में प्रत्येक नागरिक का अधिकार बन सके, न कि केवल उन लोगों का जो तकनीकी या भाषाई दृष्टि से सक्षम हैं।

आज जब विश्व कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा विश्लेषण और डिजिटल प्रशासन के युग में प्रवेश कर चुका है, तब सरकारी सूचनाओं का महत्व और भी बढ़ गया है। यदि सार्वजनिक सूचनाएँ मशीन-पठनीय स्वरूप में उपलब्ध हों, तो शोधकर्ता, विश्वविद्यालय, पत्रकार, उद्योग, स्टार्टअप, नीति निर्माता और नागरिक समाज संगठन उनके आधार पर बेहतर विश्लेषण कर सकते हैं। इससे न केवल अधिक वैज्ञानिक नीतियाँ बनेंगी, बल्कि प्रशासनिक कमियों की पहचान भी समय रहते की जा सकेगी। ओपन डेटा केवल पारदर्शिता का माध्यम नहीं, बल्कि नवाचार, आर्थिक विकास और बेहतर सार्वजनिक सेवाओं का भी आधार है। सूचना का लोकतंत्रीकरण ज्ञान का लोकतंत्रीकरण भी है। जो समाज अपनी सार्वजनिक सूचनाओं को खुला रखता है, वही भविष्य की ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करने की क्षमता विकसित करता है।

यह भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है कि स्वप्रेरित प्रकटीकरण को केवल कानूनी अनुपालन का विषय न माना जाए। अनेक सरकारी वेबसाइटें वर्षों तक अद्यतन नहीं होतीं, अनेक लिंक निष्क्रिय रहते हैं, अनेक दस्तावेज़ अधूरे होते हैं और कई बार सूचना इस प्रकार प्रस्तुत की जाती है कि उसे समझना ही कठिन हो जाता है। ऐसी औपचारिकता पारदर्शिता नहीं कहलाती। सूचना तभी उपयोगी है जब वह समय पर, सटीक, पूर्ण, सरल, खोजने योग्य और नागरिकों के लिए सहज रूप से उपलब्ध हो। यदि नागरिक को वेबसाइट पर जानकारी खोजने में उतनी ही कठिनाई हो जितनी आरटीआई आवेदन करने में होती है, तो स्वप्रेरित प्रकटीकरण का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है।

भारत यदि वास्तव में सुशासन, डिजिटल लोकतंत्र और उत्तरदायी प्रशासन की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है, तो सूचना के अधिकार की प्राथमिकता को पुनर्परिभाषित करना होगा। सफलता का मापदंड यह नहीं होना चाहिए कि कितने आरटीआई आवेदनों का निस्तारण हुआ, बल्कि यह होना चाहिए कि कितनी सूचनाएँ ऐसी थीं जिनके लिए नागरिकों को आवेदन करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। जिस दिन सरकारी कार्यालयों की वेबसाइटें इतनी समृद्ध, अद्यतन और विश्वसनीय हो जाएँगी कि सामान्य नागरिक अपनी अधिकांश आवश्यक जानकारियाँ कुछ ही क्लिक में प्राप्त कर सकेगा, उस दिन सूचना का अधिकार अधिनियम अपनी वास्तविक सफलता प्राप्त करेगा। लोकतंत्र का आदर्श नागरिकों को सूचना प्राप्त करने के लिए संघर्ष करने पर आधारित नहीं हो सकता; उसका आदर्श यह है कि शासन स्वयं नागरिकों के प्रति इतना पारदर्शी हो कि सूचना माँगना असाधारण घटना बन जाए। अंततः किसी भी लोकतंत्र की परिपक्वता इस बात से नहीं आँकी जाती कि उसके पास सूचना का अधिकार कानून है या नहीं, बल्कि इस बात से आँकी जाती है कि उसकी सरकार जनता से सूचना छिपाने की संस्कृति का पालन करती है या जनता को सूचना देने की संस्कृति का। भारत के लिए अब समय आ गया है कि वह दूसरे मार्ग को पूरी प्रतिबद्धता के साथ अपनाए, क्योंकि सूचना का अधिकार तभी सार्थक होगा जब सरकार की पहली प्रवृत्ति सूचना रोकना नहीं, बल्कि उसे स्वेच्छा से सार्वजनिक करना होगी। यही लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का सर्वोच्च मानक है और यही सुशासन की वास्तविक पहचान भी।

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डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला, नईदुनिया एवं गौड़सन्स टाइम्स के सलाहकार संपादक हैं और सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह के संपादक की भी भूमिका निभा रहे हैं)

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