तिब्बतियों का सवाल: लौटेंगे कभी या बनेंगे परमानेंट गेस्ट?

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बैंगलोर: पिछले कुछ दिनों में तिब्बती प्रतिनिधिमंडलों ने कर्नाटक के नेताओं से मुलाकात की है। बेंगलुरु में नवनिर्वाचित तिब्बती सांसद चोप्पेल ने मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार से मुलाकात कर शिक्षा, स्वास्थ्य, कल्याण और संस्कृति के संरक्षण के लिए सरकारी सहायता मांगी। उन्होंने कर्नाटक में बसे तिब्बतियों की समस्याओं पर भी ध्यान देने की अपील की।
मैसूर में गुरुपुरा बस्ती के प्रतिनिधियों ने सांसद यदुवीर वाडियार से मुलाकात की। उन्होंने संसद और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तिब्बत का मुद्दा उठाने की मांग की। प्रतिनिधियों ने 2 जुलाई को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र के बाहर तिब्बती कार्यकर्ता लोबगा रंगजेन के आत्मदाह का भी उल्लेख किया।
इन मुलाकातों में राजनीति थी, मगर केवल राजनीति नहीं थी। इनके पीछे रोजमर्रा की जिंदगी की फिक्र भी थी; बच्चों की पढ़ाई, इलाज, रोजगार और अपनी संस्कृति को बचाए रखने की चिंता।
यही चिंता आज तिब्बती समुदाय के सामने सबसे बड़ा सवाल बनकर खड़ी है।
मैसूर की गलियों में जब तिब्बती भिक्षु लाल चोगे में चलते हैं, तो लगता है जैसे हिमालय की कोई ठंडी हवा दक्षिण तक चली आई हो। बाइलकुप्पे के मठों में घंटियां बजती हैं, बच्चे तिब्बती भाषा सीखते हैं और दुकानों में हिमालयी संस्कृति की खुशबू मिलती है। मगर इस शांत तस्वीर के पीछे एक पुराना सवाल आज भी बेचैन है; क्या तिब्बती कभी अपने वतन लौट पाएंगे, या भारत ही उनका स्थायी घर बन जाएगा?
छह दशक से ज्यादा गुजर चुके हैं। 1959 में दलाई लामा के तिब्बत से निकलकर भारत आने के बाद हजारों तिब्बती शरणार्थियों ने यहां नई जिंदगी शुरू की। करीब 80 हजार लोग उस दौर में भारत पहुंचे थे। उनके पीछे छूट गए थे घर, खेत, रिश्तेदार और एक पूरी दुनिया।
भारत ने उनके लिए दरवाजे खोले। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने जमीन उपलब्ध कराई। बस्तियां बनीं, स्कूल खुले और मठों का पुनर्निर्माण हुआ। धर्मशाला धीरे-धीरे तिब्बती निर्वासित समुदाय का राजनीतिक और आध्यात्मिक केंद्र बन गया।
कर्नाटक की बाइलकुप्पे और मुंडगोड बस्तियां इस सफर की अहम मिसाल हैं। मैसूर के पास गुरुपुरा भी इसी कहानी का हिस्सा है। कभी जंगल और कठिन जमीन के बीच शुरू हुई ये बस्तियां आज खेतों, स्कूलों, मठों, छोटे कारोबार और रेस्तरां से गुलजार हैं।

निर्वासित तिब्बती प्रशासन धर्मशाला से काम करता है। उसके पास निर्वाचित नेतृत्व और संसद जैसी संस्थाएं हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक मामलों के लिए भी व्यवस्थाएं हैं। लेकिन यह व्यवस्था एक ऐसे भविष्य के लिए बनी थी, जिसमें कभी न कभी तिब्बत लौटने की उम्मीद थी।

वक्त ने उस उम्मीद की परीक्षा लंबी कर दी है।
आज भारत में तिब्बतियों की संख्या लगभग 70 से 85 हजार के बीच मानी जाती है। नई पीढ़ी का जन्म भारत में हुआ है। उनके लिए भारत केवल शरण की जगह नहीं, बल्कि बचपन, स्कूल, दोस्ती और रोजी-रोटी की जमीन है।
कई युवा भारतीय विश्वविद्यालयों में पढ़ते हैं। वे हिंदी, कन्नड़ और अंग्रेजी बोलते हैं। नौकरी के लिए अमेरिका, कनाडा, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया भी जाते हैं। दूसरी ओर, तिब्बत से भारत आने का सिलसिला लगभग बंद हो चुका है। सीमा पर कड़ी निगरानी और नियंत्रण ने पलायन को बेहद मुश्किल बना दिया है।
पहली पीढ़ी ने जंगल साफ किए, खेती की और कठिन परिस्थितियों में जिंदगी खड़ी की। दूसरी पीढ़ी ने स्कूल और कारोबार संभाले। तीसरी पीढ़ी अब दुनिया के दूसरे हिस्सों में अपने सपने तलाश रही है।
यहीं से एक अजीब-सा विरोधाभास पैदा होता है।
जिस भारत ने उन्हें शरण दी, वही अब उनकी जिंदगी का हिस्सा बन चुका है।
फिर भी तिब्बत उनकी पहचान के केंद्र में है।
चीन तिब्बत को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है और राजनीतिक नियंत्रण को मजबूत करता रहा है। तिब्बती समुदाय का आरोप है कि उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान पर दबाव बढ़ा है। इसी वजह से बड़े पैमाने पर वापसी का रास्ता आज भी नजर नहीं आता।
कुछ तिब्बती चीन लौटे हैं। कुछ रिश्तेदारों से मिलने गए हैं। लेकिन सामूहिक वापसी कभी नहीं हुई।
तो क्या छह दशक का निर्वासन अब स्थायी बसावट में बदल रहा है?
शायद जवाब सीधा नहीं है।
एक बुजुर्ग तिब्बती के लिए तिब्बत स्मृतियों का वतन है। उसके पोते के लिए भारत रोजमर्रा की जिंदगी है। एक के दिल में बर्फीले पहाड़ हैं, दूसरे के मन में कर्नाटक की लाल मिट्टी।
यही तिब्बती निर्वासन की सबसे बड़ी त्रासदी भी है और सबसे बड़ा सच भी।
वतन की याद बची हुई है। संस्कृति भी बची हुई है। उम्मीद भी जिंदा है। मगर पीढ़ियां गुजर रही हैं।
शायद इतिहास का सबसे कठिन सवाल यही है; क्या शरण स्थली कभी घर बन सकती है?
तिब्बतियों के लिए इसका जवाब अभी भी अधूरा है। लौटने का ख्वाब बाकी है, लेकिन जिंदगी भारत में आगे बढ़ रही है।
वक्त की रफ्तार कहती है कि अस्थायी पनाह धीरे-धीरे स्थायी घर का रूप ले सकती है। मगर दिल शायद अब भी हिमालय की तरफ देखता है।
और यही इंतजार इस कहानी को आज भी जिंदा रखे हुए है।

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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