राहुल चौधरी नील
लखनऊ। 2027 में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं होगा। विपक्ष तो वर्षों से अपनी भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन असली चुनौती उन ‘नवोदित महारथियों’ से होगी जो 2014 के बाद सीधे राजनीतिक विश्वविद्यालय के कुलपति बन बैठे हैं। जिन लोगों ने संगठन की सीढ़ियाँ कम और अवसरों की लिफ्ट ज़्यादा इस्तेमाल की, वे आज स्वयं को विचार से बड़ा और संगठन से ऊपर समझने लगे हैं। इनकी ड्योढी पर टंगे जरा सा हट जाए ना तो अंदर से भ्रष्टाचार और दोगलेपन की सारी परते हट जाएंगीं।
कुछ नेताओं की स्थिति ऐसी है कि उन्हें पद कैसे मिला, यह उन्हें भी ठीक से याद नहीं होगा, लेकिन पद मिलने के बाद संगठन को चलाने, सुधारने और दिशा देने की चिंता उनसे अधिक किसी को नहीं है। संघ के संस्कार, कार्यकर्ता जीवन का तप और विचारधारा की साधना उनके लिए उतनी ही दूर की चीज़ है जितनी किसी बच्चे के लिए आयकर रिटर्न।
आज कई जगह विचारधारा छुट्टी पर है, संगठन प्रतीक्षालय में बैठा है और व्यक्तिगत खुंदक मुख्य मंच पर भाषण दे रही है। एक नेता दूसरे को रोकने में लगा है, दूसरा तीसरे को निपटाने में और तीसरा पहले दोनों का राजनीतिक हत्या करने की योजना बना रहा है। जनता समझती है कि भाजपा विपक्ष से लड़ रही है, जबकि कई स्थानों पर भाजपा के लोग दिन-रात भाजपा वालों से ही लड़ने में व्यस्त हैं।
पार्टी को विपक्ष से उतना खतरा नहीं है जितना उन स्वयंभू योद्धाओं से है जो हर बैठक को कुरुक्षेत्र और हर नियुक्ति को पानीपत का युद्ध समझ लेते हैं। इनमें से कुछ लोग संगठन को परिवार मानते हैं, लेकिन केवल तब तक जब तक परिवार का मुखिया वही हों।
संगठन को शायद अब नए सदस्य अभियान के साथ-साथ ‘अहंकार मुक्ति अभियान’ भी चलाना पड़े। क्योंकि पार्टी को विपक्ष नहीं, बल्कि अपने ही घर में बैठे वे लोग अधिक नुकसान पहुँचा सकते हैं जिन्होंने कमल को सीढ़ी तो बनाया, लेकिन उसके विचारों को कभी आत्मसात नहीं किया।
आख़िर विपक्ष से लड़ना आसान है वह सामने खड़ा दिखाई देता है। मुश्किल तो उनसे है जो मंच पर ‘वंदे मातरम्’ बोलते हैं और मंच से उतरते ही अपने ही साथी के राजनीतिक खात्मे की रणनीति बनाने बैठ जाते हैं।”



