अवधेश चतुर्वेदी
पटना। आप दिल्ली के किसी भी सामान्य होटल में चले जाइए, दस मिनट के भीतर आप समझ जाएंगे कि यह स्थान वेश्यावृत्ति का अड्डा है। संभावना है कि कमरे के घुसने के कुछ ही देर में कोई कर्मी ऑफर लेकर आ जाय।
बात केवल दिल्ली की नहीं है, बात यूपी बिहार के छोटे शहरों तक आम हो चुकी है। मेरे ही शहर में दर्जनों बार पुलिस ने होटलों में छापा मार कर लड़के लड़कियों को गिरफ्तार किया होगा। वे जेल जाते हैं, कुछ दिनों में छूटते हैं और फिर वही धंधा शुरू…
शहर छोड़िए, देहात के छोटे कस्बों में ऑर्केस्टा पार्टी चलाने के नाम पर भी यही हो रहा है। पुलिस कितना पकड़ेगी? पुलिस के जिम्मे भी तो केवल यही एक काम नहीं। और यदि समाज के बाकी लोग इसका हिस्सा बनने में शर्म महसूस नहीं कर रहे तो पुलिस से उच्च नैतिकता की आशा कैसे की जा सकती है?
कौन हैं इस धंधे में लगी लड़कियां? उनमें सबसे बड़ी संख्या उन लड़कियों की है जो अपने प्रेमियों के साथ घर से भागी थीं। छः महीने, साल भर बाद प्रेमी/ पति ने छोड़ दिया, लज्जा और भय के कारण घर लौट नहीं सकीं और फिर भटकते भटकते इस धंधे में गिर गईं। कुछ वे हैं जो घर से हीरोइन, मॉडल बनने निकली थीं और अंत में यहां पहुंच गईं। अब कुछ ऐसी भी लड़कियां हैं जिन्हें उनकी अतिमहत्वाकांक्षा वहां ले गई है। सारी सुविधाएं पाने के लिए धन चाहिए और धन कमाने का सबसे आसान तरीका यही दिखा है उन्हें… कुल मिला कर एक बहुत बड़ा बाजार खड़ा हो गया है। ग्राहक भी है, बेचने वाले भी हैं…
ग्राहक रिक्शावाला भी है, ग्राहक तथाकथित बड़े लोग भी हैं। धंधे में गांव देहात से भागी मजबूर लड़कियां भी हैं और मॉडल्स और हीरोइन बनने निकली सम्पन्न परिवारों की लड़कियां भी हैं। पनीर पांच सौ रुपए किलो बिक रहा है, बैगन चालीस रुपए किलो। जिसके पास जितना धन है उस हिसाब से खरीद रहा है। हिसाब लगाइए तो देश में वेश्यावृत्ति का बाजार कई हजार करोड़ का होगा। बाजार है तो उसका पूरा इकोसिस्टम है। उनके पास ऐसे लोग भी हैं जो इस धंधे के विरुद्ध बोलने वालों को आसानी से चुप कराना जानते हैं। पटना के बंटी यादव को इसी तरह चुप कराया गया है।
बंटी यादव को नहीं जानते होंगे आप। पटना का युवक था, उसके पड़ोस में ही शुरू हो गया यह सब… किसी भी सभ्य व्यक्ति को इससे दिक्कत होगी, उसे भी हुई। उसने इसके विरुद्ध आवाज उठाई। फल यह मिला कि किडनैप हुआ और मार दिया गया। बस हफ्ते भर पुरानी खबर है।
क्या बंटी को न्याय मिलेगा? मेरा उत्तर है कि नहीं मिलेगा। कुछ लोग गिरफ्तार होंगे पर असली खिलाड़ियों का गिरेबान नहीं छुआ जा सकता। जो पकड़े जाएंगे वे भी छूट जाएंगे। धंधा चलता रहेगा।
इस बीमारी को केवल कानून के बल पर नहीं रोका जा सकता। सरकार और समाज दोनों इसके विरुद्ध मुखर हो तभी कुछ हो सकता है। पर क्या समाज मुखर है? क्या बंटी के साथ उसके मुहल्ले वाले भी मन से खड़े थे? उत्तर आपको भी पता है…
बंटी जैसे युवक नहीं के बराबर हैं। बंटी उदाहरण बन गए हैं कि बोलोगे तो मार दिए जाओगे। ऐसे में क्या सरकार जगेगी? क्या बंटी के पीछे कोई खड़ा होगा?



