दिल्ली। कांग्रेस गठबंधन बारह साल से सत्ता से बाहर है। सत्ता खोने के बाद पार्टी संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने और अपनी समानांतर व्यवस्था खड़ी करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन (@lafcindia) ने पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज मदन लोकुर की अध्यक्षता में एक ‘स्वतंत्र कमीशन’ बनाया है। यह कमीशन चुनावी रोल के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर मतदाताओं की शिकायतें सुनने का दावा कर रहा है। 15 अक्टूबर को जवाहर भवन, नई दिल्ली में इसकी पहली सार्वजनिक सुनवाई होनी है। कमीशन मतदाताओं की गवाहियां रिकॉर्ड करेगा और इसने चुनाव आयोग को भी अधिकारी भेजने का न्योता दिया है।
यह ‘स्वतंत्रता’ का नाटक है। जवाहर भवन जवाहर भवन ट्रस्ट की संपत्ति है, जिस पर गांधी परिवार का नियंत्रण है। राजीव गांधी फाउंडेशन का मुख्यालय भी यहीं है। सोनिया गांधी इसकी चेयरपर्सन हैं, जबकि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ट्रस्टी हैं। यही वह जगह है जहां कांग्रेस का थिंक टैंक बैठता है।
कमीशन के सलाहकारों में कपिल सिब्बल, प्रशांत भूषण जैसे नाम शामिल हैं, जो कांग्रेस और उसके सहयोगियों के करीबी माने जाते हैं। मदन लोकुर ने 2019 में पाकिस्तान जाकर वहां के चीफ जस्टिस की शपथ ग्रहण समारोह में हिस्सा लिया था और कुछ समय बेंच पर भी बैठे। ऐसी पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति जब गांधी परिवार की इमारत में बैठकर चुनावी प्रक्रिया पर ‘न्याय’ करता है, तो इसे स्वतंत्र कैसे कहा जा सकता है? यह योजना कांग्रेस की पुरानी राजनीति का नया रूप है-संस्थाओं पर भरोसा न करके अपनी ही अदालतें खड़ी करना।
यह कमीशन किसी भी संवैधानिक प्राधिकरण से नहीं बना है। न इसका कोई कानूनी दर्जा है, न कोई जवाबदेही। यह पूरी तरह गैर-सरकारी, राजनीतिक रूप से प्रेरित निकाय है। चुनावी रोल की जिम्मेदारी संविधान के तहत चुनाव आयोग की है। सुप्रीम कोर्ट पहले ही SIR को वैध ठहरा चुका है। फिर भी कांग्रेस समर्थक वकील और पूर्व जज मिलकर समानांतर सुनवाई कर रहे हैं। यह राज्य को दरकिनार कर अपनी व्यवस्था बनाने की कोशिश है। कल को कोई और समूह भी ऐसा कमीशन बनाकर अपने अपराधियों को निर्दोष घोषित कर सकता है।
देश में कानून का शासन तभी चलता है जब संस्थाएं अपनी जगह काम करें। जब राजनीतिक दल हारने के बाद कंगारू कोर्ट खड़े करने लगें, तो लोकतंत्र कमजोर होता है। सुप्रीम कोर्ट को इसका संज्ञान लेना चाहिए और ऐसी गतिविधियों पर रोक लगानी चाहिए। बारह साल सत्ता से बाहर रहने के बाद कांग्रेस अगर संस्थागत रास्ते छोड़कर इस तरह के गैर-संवैधानिक रास्ते अपना रही है, तो यह न सिर्फ उसकी हताशा दिखाता है, बल्कि देश की स्थिरता के लिए भी खतरा बन जाता है। लोकतंत्र में शिकायतें अदालतों और संवैधानिक निकायों में सुनी जाती हैं, गांधी परिवार की इमारत में नहीं।



