प्रशांत सौरभ
बेतिया (बिहार): बिहार को सेक्यूलर शासन वाला राज्य कहा जाता है, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अलग दिखाई देती है। सावन का पवित्र महीना चल रहा है। हजारों हिंदू शिक्षक कांवड़ यात्रा पर देवघर जाना चाहते हैं, भगवान शिव की आराधना करना चाहते हैं। यह यात्रा कम से कम 6 से 7 दिन की होती है। लेकिन छुट्टियों की कमी के कारण वे अपने धर्म का निर्वाह नहीं कर पा रहे। यदि वे आकस्मिक अवकाश का उपयोग कर लें, तो पूरे वर्ष के बाकी कामों और पारिवारिक जरूरतों के लिए छुट्टियां ही नहीं बचेंगी। 16 दिन के सालाना आकस्मिक अवकाश में से इतने दिन निकालना व्यावहारिक रूप से असंभव है।
अब तुलना करें मुस्लिम शिक्षकों की स्थिति से। शुक्रवार के दिन मध्यांतर के बाद उन्हें लगभग तीन घंटे की विशेष सुविधा मिलती है। वर्ष के 52 शुक्रवारों में यह लगभग 156 घंटे बनता है, जो दिन के हिसाब से 6 से 7 पूर्ण कार्यदिवसों के बराबर है। यह सुविधा नियमित रूप से उपलब्ध रहती है। इसके अलावा रमजान के पूरे महीने मुस्लिम कर्मचारियों और शिक्षकों को एक घंटा पहले जाने की अनुमति दी जाती है। लगभग 26-30 दिनों में यह 26-30 घंटे अतिरिक्त समय की बचत है। शिक्षा विभाग और सामान्य प्रशासन विभाग के आदेशों से यह व्यवस्था हर साल लागू की जाती है।
प्रश्न यह है कि जब एक समुदाय के शिक्षकों को अपने धार्मिक कर्तव्यों के निर्वाह के लिए नियमित और व्यवस्थित समय-छूट दी जा सकती है, तो हिंदू शिक्षकों को सावन में कांवड़ यात्रा के लिए 6-7 दिनों की समान सुविधा क्यों नहीं? यह कोई पहाड़ तोड़ने वाला काम नहीं है। स्कूलों में पढ़ाई प्रभावित हुए बिना व्यवस्था की जा सकती है। मुस्लिम भाइयों की सुविधा को छीनने की बात नहीं है। मांग केवल समानता की है—कि हिंदू शिक्षक भी अपने धर्म का पालन कर सकें।
यदि सावन में हिंदू शिक्षकों को पूजा-अर्चना या यात्रा के लिए एक घंटे की भी दैनिक सुविधा नहीं दी जा सकती, तो सेक्यूलरिज्म का दावा खोखला लगता है। सेक्यूलरिज्म का अर्थ सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान होना चाहिए, न कि एक तरफ विशेषाधिकार और दूसरी तरफ उपेक्षा। हजारों हिंदू शिक्षक हर साल इस असमानता का अनुभव करते हैं। वे अपने बच्चों को पढ़ाते हैं, लेकिन स्वयं अपने आस्था के अधिकार से वंचित रह जाते हैं।
यह स्थिति लंबे समय से चली आ रही है। आकस्मिक अवकाश सभी के लिए समान बताए जाते हैं, लेकिन व्यवहार में एक समुदाय को अतिरिक्त धार्मिक छूट मिलती है जबकि दूसरे को नहीं। सावन जैसे महत्वपूर्ण महीने में हिंदू शिक्षकों को कांवड़ यात्रा के लिए विशेष अवकाश या समय-समायोजन देना न्यायसंगत और व्यावहारिक दोनों है। इससे न तो प्रशासनिक व्यवस्था बिगड़ेगी और न ही शिक्षा प्रभावित होगी।
सच्ची समानता तभी स्थापित होगी जब सभी धर्मों के अनुयायियों को अपने विश्वास का पालन करने का समान अवसर मिले। बिहार के हिंदू शिक्षकों की यह जायज मांग अब अनसुनी नहीं रहनी चाहिए।



