आर्यावर्त की अगली कड़ी वैवस्वत मनु 

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प्रमोद भार्गव

भोपाल। वैवस्त मनु मेरा नया उपन्यास है,जो अभी लिखा जा रहा है। इसे मेरे पूर्व में लिखे उपन्यास आर्यावर्त की अगली कड़ी के रूप में लें,यह आर्य और अनार्यों के सभ्यतागत विकास की प्रलय के बाद की कथा है…। क्रमशः प्रकाशित किए जा रहे इस उपन्यास की तीसरी कड़ी…..,

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3-आहार में वायु

आसमान खुल गया है। लंबे समय बाद सूर्योदय और सूर्यास्त दृष्टिगोचर होने लगे हैं। दीर्घकाल तक व्याप्त रहे प्रलय को अंधेरे से ढके रहने वाला कोहरा छट गया है। अतएव सूर्य,प्रकाश और उसकी आंच का प्रभाव धरती पर उतरने लगा है। मनु सूर्य ऊर्जा के इस अजस्त्र स्रोत का अनुभव करके प्रफुल्लित हैं। वे सोचने लगे हैं कि वैदिक ऋषियों ने वास्तव में सच ही कहा था कि सूर्य ऊर्जा का अक्षुण्ण स्रोत है। मनु देख रहे हैं, सूर्य किरणों के नियमित फूटने के क्रम के चलते,जल से रिक्त हुई मुलायम धरती की कोख से अनेक वनस्पतियों के अंकुरण का सिलसिला चल पड़ा है। कोपलें फूटने लगी हैं। कीट पतंगे भी अस्तित्व में आ रहे हैं। तब क्या इनके बीजों के सूक्ष्म कण पृथ्वी के गर्भ और धरती से अंतरिक्ष तक फैले वायुमंडल में सुशुप्त अवस्था में पड़े रहते हैं। उनका आनुवंशकीय सूक्ष्मजीवी पारिस्थितिकी-तंत्र और प्राकृतिक पोषण संरचना वायुमंडल में बनी रहती है ? उपरोक्त प्रश्नों के उत्तर के सूत्र खोजने के लिए मनु ने अपने स्मृति-तंतुओं को बलपूर्वक सक्रिय किया। तब उन्हें ध्यान आया, ” अरे ! यही तो ऋषि हिरण्यगर्भ अपने एक मंत्र में कह गए है…,”

हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक असीत।

स दाधार पृथिवीं धामुतेमां कस्मै देवाय हविशा विधेम।

ऋग्वेदः10-12-1 (हिरण्यगर्भ सूक्त)

मनु इस मंत्र को उच्चारित करके एकाएक चैतन्य हुए। किसी व्यक्ति के समक्ष नहीं होने पर भी बोल पड़े, ”प्राकृतिक अवस्थाओं को अपनी तीक्ष्ण बुद्धि से ज्ञात कर लेने वाले ऋषि हिरण्यगर्भ आप अवश्य दृष्टा थे। आपके रचित मंत्र का अर्थ मैं यर्थात रूप में पृथ्वी और वायुमंडल में प्रत्यक्ष देख रहा हूं। आपने ठीक ही कहा था कि इस सृष्टि के निर्माण से पहले इसके आदि स्रोत के रूप में ‘हिरण्यगर्भ’ अत्यंत सूक्ष्म रूप में विद्यमान रहा है। इसी सूक्ष्म से सृष्टि का विस्तार हुआ है। इस विराट महाकाव्य सृष्टि के आधारभूत मूल में प्रकृति अत्यंत सूक्ष्म है, जिसे केवल अनुमान से ही जाना जा सकता है। आपने निश्चित ही, कितना सटीक कहा है कि हिरण्यगर्भ में ‘हिरण्य’ स्वर्ण भी चमकने वाली ऊर्जा का प्रकाशपुंज है। ‘गर्भ’ से आशय कोख या अंडे से है। यही, वह प्राकृतिक अवयव, अंग, बीज या उपकरण हैं, जिनसे समस्त जीव-जगत उत्पन्न होता है।”

दीर्घस्वाँस लेकर मनु फिर बोले, ,”वास्तव में किसी भी सूक्ष्मजीव की सुषुप्त अवस्था एक गहरी नींद है। सुषुप्त एक अस्थायी स्थिति है। बीज की इस अवस्था का ज्ञान कश्यप की पत्नी दिति से उत्पन्न पुत्र हिरण्यकश्यप को भी थी। उन्होंने अपनी मेधा और अनुसंधानमयी साधना से अनेक चमत्कारिक वैज्ञानिक उपलब्धियां प्राप्त की हुई थीं। उन्होंने जान लिया था कि प्रकृति में उपलब्ध प्रत्येक जीव या पदार्थ के सूक्ष्म कण स्वमेव संयोजित होकर मात्र नव-सृजन ही नहीं करते हैं, अपितु उन्हें संयोजित और वियोजित (विघटित) भी करते हैं। इसी कारण इस अनंत ब्रह्मांड में दृश्यमान एवं अदृश्यमान संपूर्ण पदार्थों के जीवनदायी तत्व उपलब्ध हैं। सूर्य की किरणों में भी सभी पदार्थों को उत्सर्जित करने वाले तत्वों की उपस्थिति मानी जाती है। हिरण्यकश्यप वायुमंडल में विचरण कर रहे जीवन के इन मूलभूत तत्वों पर नियंत्रण की विज्ञान-सम्मत व्यावहारिक विधि में निपुण थे। इसीलिए ऋषियों ने उनके लिए कहा था..,

अकृश्यपच्या तस्यासीत सप्त द्वीपवतीमही।

तथा कामुधाद्यौस्तु नानाष्चर्य पदं नभः।।

श्रीमद् भागवत महापुराण स्कंध 1-4

यानी दैत्यराज हिरण्यकश्यप अपने तप और योग से इतने तेजस्वी हो गए थे कि पृथ्वी के सातों द्वीपों पर उनका एकछत्र राज्य था। वसुंधरा को बिना जोते-बोए ही सभी प्रकार के अन्न उत्पन्न हो जाया करते थे। अकृशयपच्या का अर्थ ही, भूमि को बिना जोते-बोए फसल पैदा करने की विधि कहा जाता है। अर्थात वे अंतरिक्ष में बीज अंकुरित कर लिया करते थे या प्राकृतिक रूप में उन्हें प्राप्त कर लिया जाता था। क्योंकि उनके उत्सर्जन के सूक्ष्म जीव वायुमंडल में निरंतर विचरते रहते हैं।

प्रलय में बचने के बाद मनु ने इतना लंबा एकांगी संवाद प्रकृति से पहली बार किया था। प्रकृति कह लें या ब्रह्म से किए संवाद के उपरांत मनु उत्साहित हैं। उन्होंने निश्चित कर लिया कि जब तक शाकाहार की सहज उपलब्धता नहीं हो पाती है, वे वायु से ही सीधे आहार श्वांस के माध्यम से लेंगे। मनु जानते हैं, पेड़-पौधे एवं वनस्पतियां वायु से ही भोजन ग्रहण करते हैं। प्रकृति में नैसर्गिक रूप से उपलब्ध तत्वों से ही अपना पोषण करके जीवित रहते हैं। अनेक ऋषि -मुनियों ने भी वायु और सूर्य किरणों से सीधे पोषण ग्रहण कर ब्रह्मांड को खंगाला और ग्रह-नक्षत्रों व निहारिकाओं को जाना। उन्होंने भोजन की यह प्रेरणा वृक्षों से ली थी। जल, वायु और प्रकाश से अवशोषण पेड़ के जड, तना,शाखाएं और फूल-पत्तियां करते हैं। प्रकृति से सीधे आहार ग्रहण करने की इस विधि के स्मरण से मनु की इंद्रियों में जीवन की लालसा का आवेग बढ़ गया। उन्होंने जीवन निर्वाह की इस कठिन परिस्थिति में जैसे जीवन निर्वाह की सरलता से आसान डोर पकड़ ली। इस आभासी स्थिति में एकाएक स्मृतियों के इन डोरों को उन्होंने जैसे कसकर मुट्ठियों में भींच लिया और वे अतीत की चेतनामयी सीख के इस स्मरण से जुगनुओं की तरह जगमगाने का अनुभव करने लगे। उन्हें लगा कि इन यादों ने जैसे जीवन के कष्ट को संजीवनी दे दी है। ये स्मृतियां मात्र स्वप्न नहीं थीं, अपितु जीवन की इच्छा में रंग, गंध, स्वर और स्पर्श का ऐसा आत्मीय अनुभव थीं, जो शरीर के जीवनरस को ऊर्जा की तरह भाव-विभोर कर रही थीं। इस उत्साह से चैतन्य होते हुए मनु उगते सूर्य की दिशा में एकाग्राचित खड़े हुए और लंबी-लंबी साँसें लेते हुए वायुग्रहण करने लगे। आहार ग्रहण की इस प्रक्रिया के पूर्ण होने के उपरांत मनु को असहाय अहल्या की याद आ गई। स्मृति श्रृंखला का जैसे एक अध्याय खुलता चला गया…।

सप्त सिंधु क्षेत्र में प्रलय से ठीक पहले राजा वघ्रयश्व का प्रभुत्व था। इस पूरे क्षेत्र में भरत संख्याबल में सर्वाधिक थे। उनके प्रधान थे वघ्रयश्व। वघ्रयश्व की दो पत्नियां थीं, पौरवी और मेनका। पौरवी की कोख से दिवोदास जन्मे थे। वघ्रयश्व की वीरगति होने के बाद इन्हीं दिवोदास को राजपाट भारद्वाज, वशिष्ठ और विश्वामित्र की उपस्थिति में सौंपा गया था। वघ्रयश्व की दूसरी पत्नी थीं, मेनका! यह मेनका इंद्र की वह अप्सरा नहीं थी, जिसने विश्वामित्र का तप इंद्र के कहने पर भंग किया था। वघ्रयश्व और मेनका की पुत्री थी, अहल्या! यही गौतम ऋषि से विवाहित वह अहल्या है, जो सप्तसिंधु क्षेत्र में आर्य और अनार्यों के बीच छिड़े भीषण युद्ध के समय इंद्र के वैभव से आकर्षित होकर उनकी अंकशायिनी बन गई थी।

भरतों के प्रमुख वघ्रयश्व, दिवोदास और सुदास ये तीनों पितामह, पिता और पुत्र थे। दिवोदास एवं सुदास को प्रलय से पहले वैदिक कालखंड में पुरु-भरत भी कहा जाता रहा है। यही तृत्सुओं के भी प्रधान रहे हैं। परंतु दासराज्ञ युद्ध में पुरुओं ने भरतों का साथ नहीं दिया था। भरत उस समय परुष्णी (रावी) नदी के तटों पर रहते थे। इस युद्ध में वशिष्ठ और विश्वामित्र के बीच इतना उग्र विवाद हुआ कि दोनों परस्पर मरपीट पर उतारू हो गए थे। तब राजा दिवोदास ने दोनों के बीच आकर हस्तक्षेप किया और पुरोहित विश्वामित्र को राजऋषि के पद से निष्काषित कर दिया था। तब विश्वामित्र ने प्रतिकार की भावना से दासराज्ञ युद्ध में अनार्यों का नेतृत्व किया, किंतु दिवोदास-सुदास के साथ इंद्र अपने शस्त्र व सैन्य बल के साथ सहायता करने आ गए। फलतः जिन दस राज घरानों ने दिवोदास के साथ सप्त-सिंधु क्षेत्र में युद्ध की स्थिति निर्मित की थी,उनसे इंद्र व वशिष्ठ के नेतृत्व में दिवोदास एवं सुदास के साथ आर्यों के पांच राज घराने भी लड़े थे। दस घरानों का नेतृत्व शंबर ने किया था। परंतु सुदास को इंद्र की शक्ति मिल जाने से अनार्य पराजित हो गए, जो बचे उनमें से बड़ी संख्या में भलान के संकीर्ण मार्ग (वर्तमान में बोलन दर्रा) से आर्याना की ओर पलायन कर गए। इन्हीं लोगों ने वहां वैदिक संस्कृति की नींव रखी।

इंद्र जब दिवोदास के दुर्ग में रहकर अनार्यों से संग्राम की रणनीति बना रहे थे, तब अहल्या भी अपने भाई दिवोदास के घर में थी। अहल्या का ऋषि गौतम से पाणिग्रहण हो चुका था। किंतु जब विशाल दुर्ग के गलियारों में अहल्या का इंद्र से आमना-सामना हुआ तो दोनों के चक्षु परस्पर केंद्रित हो गए। इंद्र तो पूर्व से ही सोम और परस्त्री के भोग का तीव्रकांक्षी था, अहल्या भी इंद्र के सुगठित शरीर-सौष्ठव से प्रभावित हुए बिना रह न सकी। इंद्र के राजसी वैभव और प्रभावी व्यक्तित्व की चर्चाएं तो वह खूब सुन चुकी थी। यहां एक-दूसरे के चित्र आंखों में समाए तो प्रण्य मिलन की लालसाएं भी हिलोर उठीं। दोनों ने बिना कोई वार्तालाप किए, जैसे आंखों ही आंखों से संवाद स्थापित कर लिए। परस्पर देह मिलन की सहमति तय कर ली। तत्पश्चात अहल्या और इंद्र के बीच अनैतिक मिलन का संयोग बनने लगा। तथापि अभी तक ये संबंध मुखर लोकनिंदा का आधार तो नहीं बन पाए थे, परंतु दुर्ग के कुछ विशिष्ठ लोगों को दासियों और प्रहरियों के माध्यम से यह संदेश मिल गया कि अहल्या एवं इंद्र अनेक बार संदिग्घ स्थिति में देखे गए हैं। दिवोदास के संज्ञान में जब बहन अहल्या और इंद्र के बीच बन चुके अवैध काम-व्यवहार को लाया गया, तब इंद्र के सापेक्ष असहाय दिवोदास ने संयम से काम लेते हुए अहल्या को ससम्मान गौतम ऋषि के घर भेज दिया। तब भी दुर्ग के बाहर यह प्रसंग लोक-कलंक का पर्याय बनता चला गया था। आमजन कहने लगे कि अहल्या इंद्र की ‘अहल्यायै जार’ शतपथ ब्राह्मण) है। अर्थात इंद्र परस्त्री अहल्या से प्रेम करने वाला उप पति (प्रेमी) है। यही इंद्र दासराज्ञ युद्ध की समाप्ति के उपरांत कालांतर में ऋषि गौतम की अनुपस्थिति में उन्हीं के। आश्रम में अहल्या से संबंध बनाने के बाद पकड़े जाते हैं। ऋषि गौतम अहल्या को वायु का सेवन कर, राख के बिछौने पर जीवन व्यतीत करते हुए जीवित रहने का श्राप देते हैं। और अहल्या दंड भोगने को विवश हो जाती है। दंड भोगने के दिनों में अहल्या के संताने उनकी देख रेख करती हैं और वे भूख की चिंता से निश्चिंत हो गए।

प्रलय के बाद अब ज्ञात नहीं अहल्या के प्राण बच पाए या नहीं? बचें होंगे तो आज भी हवा को आहार बनाकर राख में पड़ी होगी। मनु का स्मृति-पाठ पूर्ण हुआ तो वे बोले, ‘हे ब्रह्म जब अहल्या वायु पीकर जीवित रह सकती है तो यह मनु क्यों नहीं ?’ जैसे मनु का आत्मिक चेतना तंत्र जागृत हो गया।

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