अब विवाद में क्यों है अयोध्या का रामालय ट्रस्ट

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अयोध्या : अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के चढ़ावे और दान में कथित अनियमितताओं की जांच SIT कर रही है, उसी बीच अयोध्या का एक और ट्रस्ट – श्री राम जन्मभूमि रामालय ट्रस्ट – सुर्खियों में आ गया है। राम भक्तों के आस्था के केंद्र में विश्वास की रक्षा के लिए यह जांच जरूरी हो गई है।

 

रामालय ट्रस्ट की स्थापना 1994 में हुई थी, जब राजीव गांधी द्वारा राम जन्मभूमि पर शिलान्यास के बाद स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती (द्वारका पीठाधीश्वर) इसके मुख्य ट्रस्टी बने। रामानंदाचार्य रामनरेशाचार्य समेत कुल 25 सदस्यों वाला यह ट्रस्ट राम मंदिर निर्माण का दावा करता था। 2019 के सुप्रीम कोर्ट फैसले के बाद केंद्र सरकार ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट गठित किया, जिसके बाद रामालय ट्रस्ट निष्क्रिय हो गया। लेकिन सवाल यह है कि 1994 से 2019 तक जमा हुए चंदे और दान का क्या हुआ?

 

2020 में, जब आधिकारिक ट्रस्ट पहले से गठित हो चुका था, रामालय ट्रस्ट के सचिव स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने “स्वर्ण संग्रह सपर्या” या “राम-राम ग्राम-ग्राम अभियान” शुरू किया। लक्ष्य था – देश के 7 लाख गांवों से 1,008 किलो सोना जुटाना। इसमें 108 किलो से अस्थायी “स्वर्णालय” (बाल मंदिर) बनाने और 900 किलो भव्य राम मंदिर को समर्पित करने का दावा किया गया। अभियान चला, प्रचार हुआ, लेकिन सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट नहीं कि कितना सोना वास्तव में जमा हुआ, कहां रखा गया, किस बैंक लॉकर या सुरक्षित स्थान पर है, उसका ऑडिट हुआ या नहीं, और उसका उपयोग कहां किया गया। कोई वार्षिक रिपोर्ट, बैलेंस शीट या उपयोग विवरण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।

 

स्वामी गोविंदानंद सरस्वती (स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य) ने खुलकर आरोप लगाया है कि अविमुक्तेश्वरानंद ने रामालय ट्रस्ट के नाम पर 1,000 से अधिक गांवों से अवैध तरीके से सोना, हीरा और नकद इकट्ठा किया। उन्होंने SIT से इसकी जांच कराने की मांग की है। आरोप है कि आधिकारिक ट्रस्ट गठन के बाद भी यह संग्रह जारी रहा, जो कानूनी रूप से गलत था। अविमुक्तेश्वरानंद ने इन आरोपों को खारिज किया और कहा कि मुख्य जिम्मेदारी आधिकारिक ट्रस्ट की है। लेकिन सवाल बरकरार है – रामालय ट्रस्ट द्वारा जुटाया गया धन, सोना और आभूषण आधिकारिक ट्रस्ट को सौंपे गए या नहीं? अगर नहीं, तो वे कहां गए?

राम मंदिर चढ़ावे में कथित गड़बड़ी की जांच के बीच यह मामला और गंभीर हो गया है। SIT की प्रारंभिक रिपोर्ट में सोने-चांदी की गायबी, नकद की अनियमितताओं और रिकॉर्ड की कमी की बात सामने आई। जब एक ट्रस्ट की जांच हो रही है, तो दूसरे ट्रस्ट की भी होनी चाहिए, खासकर जब दोनों का उद्देश्य एक ही – राम मंदिर – था। राम भक्तों ने लाखों-करोड़ों का दान राम के नाम पर दिया। अगर उसमें कोई अनियमितता हुई, तो आस्था के साथ धोखा है।

 

रामालय ट्रस्ट की आय-व्यय की विस्तृत रिपोर्ट सार्वजनिक डोमेन में आसानी से उपलब्ध नहीं। 1,008 किलो सोने के अभियान का अंतिम हिसाब-किताब, सोने की शुद्धता, भंडारण और उपयोग का प्रमाण पत्र कहां है? स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने हाल ही में पीएमओ और गृह मंत्रालय को ज्ञापन सौंपकर दावा किया कि उनका ट्रस्ट ही सबसे सक्षम है और नया ट्रस्ट बनाने की जरूरत नहीं। उन्होंने 1008 फीट शिखर वाले भव्य मंदिर का सपना दिखाया, जिसमें एक लाख से अधिक श्रद्धालु पूजा कर सकें। लेकिन जब पुराने अभियानों का हिसाब नहीं दिया गया, तो नए दावों पर भरोसा कैसे बने?

 

जांच की वकालत: पारदर्शिता और जवाबदेही लोकतंत्र और आस्था दोनों की मजबूती है। राम मंदिर जैसे पवित्र प्रोजेक्ट में किसी भी ट्रस्ट की फंडिंग पर सवाल उठे, तो स्वतंत्र, निष्पक्ष और व्यापक ऑडिट जरूरी है। SIT या किसी अन्य एजेंसी द्वारा रामालय ट्रस्ट के सभी बैंक खातों, सोने के संग्रह, दान रसीदों, खर्च के दस्तावेजों और संपत्ति का फॉरेंसिक ऑडिट होना चाहिए। स्वामी गोविंदानंद जैसे संतों के आरोपों की भी जांच हो। अगर सब कुछ सही है, तो ट्रस्ट को इससे राहत मिलेगी। अगर गड़बड़ी है, तो दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए, चाहे कोई भी हो।

 

राम के नाम पर जुटा हर पैसा, हर तोला सोना राम भक्तों की आस्था का प्रतीक है। इसे गबन या दुरुपयोग से बचाना सबका दायित्व है। अयोध्या विवाद के समाधान के बाद मंदिर निर्माण में जो उत्साह था, उसे बनाए रखने के लिए पारदर्शिता अनिवार्य है। रामालय ट्रस्ट की जांच न केवल अनियमितताओं को उजागर करेगी, बल्कि भविष्य में ऐसे ट्रस्टों को जवाबदेह बनाने का उदाहरण बनेगी।

 

राम भक्त मांग कर रहे हैं कि “राम के नाम पर लूट” न चले। समय आ गया है कि सभी संबंधित ट्रस्टों का पूरा लेखा-जोखा सार्वजनिक हो। जब तक हिसाब साफ नहीं होगा, विवाद थमेगा नहीं। आस्था की रक्षा के लिए जवाबदेही जरूरी है।

 

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