आखिर चर्च को एफसीआरए संशोधन विधेयक से इतनी दिक्‍कत क्‍यों हो रही है?

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– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

मुंबई । विदेश से आने वाला धन जब शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा राहत, गरीबों की सहायता और सामाजिक सेवा जैसे घोषित उद्देश्यों पर खर्च होता है, तो उसके पारदर्शी उपयोग पर किसी को आपत्ति नहीं होती। प्रश्न उस समय खड़ा होता है, जब विदेशी धन के स्रोत, उसके उद्देश्य और उसके वास्तविक इस्तेमाल के बीच अंतर दिखाई देने लगे। यदि कहीं ऐसा हो रहा है तो स्‍वभाविक है विदेशी अंशदान देश की आर्थिक पारदर्शिता, राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता को चुनौती देता हुआ दिखाई देता है।

ऐसे समय में जब विभिन्न ईसाई संप्रदायों और अल्पसंख्यक संगठनों के प्रतिनिधियों ने प्रस्तावित एफसीआरए संशोधन विधेयक, 2026 को वापस लेने की मांग की है, तब सहज ही अनेक प्रश्न खड़े हो गए हैं, आखिर इस कानून के प्रस्तावित प्रावधानों से ऐसी चिंता क्यों पैदा हो रही है, जबकि सरकार पहले ही स्‍पष्‍ट कर चुक है कि इसका उद्देश्य विदेशी धन के उपयोग को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है?

सवाल अधिकारों का है या विदेशी धन के इस्तेमाल की निगरानी का?

हाल ही में विभिन्न ईसाई संप्रदायों और अल्पसंख्यक संगठनों के प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर प्रस्तावित एफसीआरए संशोधन विधेयक को वापस लेने का आग्रह किया। इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व सांसद और अल्पसंख्यकों पर संयुक्त कार्रवाई मंच (जेएएफएम) के अध्यक्ष पी. विल्सन ने किया। इसमें कैथोलिक चर्च, चर्च ऑफ साउथ इंडिया, चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया, नेशनल काउंसिल ऑफ चर्च्स इन इंडिया, यूनाइटेड इवेंजेलिकल लूथरन चर्च, बैपटिस्ट और मार थोमा चर्च सहित विभिन्न संगठनों के वरिष्ठ प्रतिनिधि शामिल थे। उनकी प्रमुख आपत्ति एफसीआरए की धारा 15 से जुड़ी है। उनका तर्क है कि विदेशी अंशदान या उससे निर्मित धर्मार्थ संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण का प्रावधान धार्मिक और संवैधानिक अधिकारों को प्रभावित कर सकता है।

यहां गृहमंत्री अमित शाह के सामने इन तमाम ईसाईपंथी चर्च नेताओं जिसमें दिल्ली के आर्कबिशप अनिल कौटो, चर्च ऑफ साउथ इंडिया के मॉडरेटर के. रूबेन मार्क, जीसस कॉल्स के संस्थापक पॉल धिनकरन, नेशनल काउंसिल ऑफ चर्च्स इन इंडिया के महासचिव असिर एबेनेजर, यूनाइटेड इवेंजेलिकल लूथरन चर्च्स के कार्यकारी सचिव बिशप जोशुआ पीटर, चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया के बिशप पॉल नोएल वॉकर स्वरूप, सीबीसीआई के उप महासचिव मैथ्यू कोयिकल और कई अन्य ईसाई संप्रदायों और संगठनों के प्रतिनिधि शामिल थे का कहना है, एफसीआरए संशोधन विधेयक से चर्च के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं! वस्‍तुत: यहां ये सभी यह बताने में विफल रहे हैं कि ये अधिकार प्रभावित कैसे हो रहे हैं!

अब यहां मूल प्रश्न को भावनात्मक धार्मिक बहस से अलग करके देखना जरूरी है। विदेशी धन भारत में किस उद्देश्य से आता है, किस संस्था को मिलता है, किस खाते में जाता है और अंततः किस काम में खर्च होता है- क्या इन प्रश्नों की निगरानी नहीं होनी चाहिए? यदि किसी संस्था को शिक्षा के लिए धन मिलता है तो उसका उपयोग शिक्षा में ही होना चाहिए। स्वास्थ्य सेवा के लिए प्राप्त राशि स्वास्थ्य सेवा में लगे। राहत के नाम पर आए धन का इस्तेमाल किसी अन्य गतिविधि में न हो। यही वित्तीय जवाबदेही का सामान्य सिद्धांत है।

सरकार आखिर क्या बदलना चाहती है?

सरकार के अनुसार प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य किसी धर्म या समुदाय की धर्मार्थ गतिविधियों को रोकना बिल्‍कुल नहीं है। प्रस्तावित प्रावधान उस स्थिति से संबंधित हैं, जब किसी व्यक्ति या संस्था का एफसीआरए पंजीकरण समाप्त, रद्द या सरेंडर हो जाता है। ऐसी स्थिति में विदेशी अंशदान और उससे निर्मित संपत्तियां निर्धारित प्राधिकारी के अधीन जाएंगी। यदि संस्था बाद में अपना पंजीकरण बहाल कराने में सफल होती है, तो विदेशी अंशदान और संपत्तियां वापस किए जाने का प्रावधान है।

इस व्यवस्था का तर्क यही है कि विदेशी धन से बनी संपत्ति किसी ऐसे संगठन के हाथों में अनिश्चितकाल तक न रहे, जिसका विदेशी धन प्राप्त करने का वैधानिक अधिकार समाप्त हो चुका है। यहां सरकार के सामने चुनौती यह भी है कि पंजीकरण रद्द होने के बाद ऐसी संपत्तियों का संरक्षण और प्रबंधन कौन करे। प्रस्तावित संशोधन इसी प्रशासनिक रिक्तता को भरने का प्रयास है। विधेयक में नामित प्राधिकारी, अस्थायी निहितीकरण, निर्धारित अवधि में पंजीकरण बहाल होने पर संपत्ति की वापसी और उसके बाद स्थायी निहितीकरण जैसी व्यवस्थाएं प्रस्तावित हैं।

धार्मिक संस्था है तो वित्तीय जांच से छूट कैसे?

चर्च प्रतिनिधियों की चिंता का एक बड़ा आधार यह है कि शिक्षा संस्थानों, अस्पतालों, अनाथालयों, वृद्धाश्रमों और कमजोर वर्गों की सेवा करने वाली संस्थाओं पर इसका प्रभाव पड़ सकता है। यह तर्क सुनने में मानवीय है, क्योंकि ऐसे संस्थानों का सामाजिक योगदान महत्वपूर्ण हो सकता है। मगर इसके साथ दूसरा प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है- क्या किसी संस्था के धर्मार्थ या धार्मिक स्वरूप के कारण उसके विदेशी वित्तीय लेन-देन की पारदर्शिता समाप्त हो जानी चाहिए?

धर्मार्थ कार्य करने वाली संस्था को कानून के दायरे से बाहर रखने का अर्थ यह होगा कि उसके विदेशी धन के उपयोग की निगरानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा कमजोर हो जाए, जबकि एफसीआरए का मूल ढांचा ही विदेशी योगदान के स्रोत, प्राप्ति और उपयोग का हिसाब मांगता है। उपलब्ध सामग्री के अनुसार एफसीआरए किसी भी धर्म के वैध धार्मिक कार्य, पूजा स्थलों के रखरखाव, धार्मिक शिक्षा और धर्म आधारित कल्याणकारी गतिविधियों के लिए विदेशी वित्त पोषण की संभावना को समाप्त नहीं करता, इसलिए बहस यह नहीं होनी चाहिए कि चर्च को विदेशी धन मिलेगा या नहीं। असली सवाल यह होना चाहिए कि विदेशी धन किस शर्त पर मिलेगा और उसका इस्तेमाल किस तरह सुनिश्चित किया जाएगा।

पारदर्शिता से परेशानी क्यों हो?

2026 के प्रस्तावित संशोधन में विदेशी फंड के स्रोत और उपयोग की जानकारी, परियोजना-वार तथा स्थान-वार खर्च का विवरण, डिजिटल गतिविधियों और सोशल मीडिया खातों की जानकारी, अंतिम विदेशी दाता की पहचान तथा वित्तीय लेन-देन का ऑनलाइन विवरण जैसी व्यवस्थाओं पर जोर दिया गया है। धर्मार्थ उद्देश्य के लिए प्राप्त विदेशी धन उसी उद्देश्य पर खर्च करने की बात भी स्पष्ट की गई है।

यहां विरोध का आधार तभी मजबूत दिखाई देगा, जब यह सिद्ध किया जाए कि इन प्रावधानों का उद्देश्य वैध धर्मार्थ गतिविधियों को रोकना है। महज यह कहना कि अधिक निगरानी से संस्थाओं के अधिकार प्रभावित होंगे, अपने आप में पर्याप्त तर्क नहीं बनता। लोकतंत्र में अधिकारों के साथ जवाबदेही भी सुनिश्‍चित की जाती है। जिस धन का स्रोत देश के बाहर है, उसके उपयोग की पारदर्शिता मांगना अपने आप में किसी संस्था की धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला नहीं कैसे हो सकता है?

एफसीआरए कोई नया कानून नहीं

यह समझना भी जरूरी है कि विदेशी अंशदान का नियमन भारत में पहली बार नहीं हो रहा। एफसीआरए की यात्रा 1976 से शुरू हुई और 2010 में नया कानून आया। इसके बाद 2016, 2018 और 2020 में भी व्यवस्था में बदलाव किए गए। 2020 के संशोधनों में विदेशी योगदान के लिए निर्दिष्ट बैंक खाते, उप-अनुदान पर नियंत्रण और प्रशासनिक खर्च की सीमा जैसे प्रावधानों को मजबूत किया गया।

इसका अर्थ यह है कि विदेशी धन की निगरानी को किसी एक सरकार की अचानक पैदा हुई प्राथमिकता के रूप में नहीं देखा जा सकता। समय के साथ विदेशी वित्तीय प्रवाह बढ़ा है, उसके रास्ते जटिल हुए हैं और इसलिए निगरानी के साधनों का बदलना स्वाभाविक है।

विदेशी धन और राष्ट्रीय हित का प्रश्न

आज विदेशी फंडिंग का इस्तेमाल नीति-अनुसंधान, जनअभियान, पर्यावरणीय आंदोलनों, कानूनी गतिविधियों, मीडिया नैरेटिव और डिजिटल अभियानों तक पहुंच गया है। यही कारण है कि विदेशी फंड को सिर्फ ‘दान’ मानकर उसकी निगरानी को अनावश्यक बताना उचित नहीं होगा। किसी भी संप्रभु राष्ट्र के लिए यह जानना जरूरी है कि उसके भीतर आर्थिक या सामाजिक प्रभाव पैदा करने वाली गतिविधियों के पीछे धन का स्रोत क्या है।

धर्मांतरण के आरोपों ने बहस को और संवेदनशील बनाया

एफसीआरए पर बहस का एक संवेदनशील पक्ष धर्मांतरण से जुड़े आरोप भी हैं। कुछ ईसाई संगठनों और एनजीओ के विरुद्ध विदेशी फंड के दुरुपयोग तथा धर्मांतरण गतिविधियों में इस्तेमाल के आरोप अब तक सही पाए गए हैं। कुछ मामलों में एफसीआरए पंजीकरण निलंबित या रद्द किए जाने की कार्रवाई भी दर्ज है। ऐसे में सरकार की ओर से भी प्रस्तावित ढांचे में वैध धार्मिक गतिविधियों के लिए स्थान बनाए रखने की बात कही गई है, जबकि विदेशी धन के जरिए जबरन धर्मांतरण अथवा सामाजिक सौहार्द को प्रभावित करने वाली गतिविधियों पर रोक की बात है, अब इसमें अनुचित क्‍या है ? संविधान भी यही चाहता है कि धर्मांतरण किसी लालच, भय, दबाव या चमत्‍कार दिखाकर नहीं होना चाहिए।

असली कसौटी: धन का स्रोत, उद्देश्य और उपयोग

एफसीआरए की पूरी बहस को तीन शब्दों में समेटा जा सकता है, जिसे हम कह सकते हैं- स्रोत, उद्देश्य और उपयोग। पैसा कहां से आया? किस उद्देश्य के लिए आया? और वास्तव में कहां खर्च हुआ? यदि इन तीनों सवालों का स्पष्ट उत्तर उपलब्ध है तो पारदर्शी व्यवस्था से डरने की कोई वजह नहीं होनी चाहिए।

समस्या तब पैदा होती है जब किसी संस्था को एक उद्देश्य के नाम पर विदेशी धन मिले और उसका उपयोग किसी दूसरे उद्देश्य के लिए हो। ऐसी स्थिति में कार्रवाई किसी धर्म के विरुद्ध नहीं, बल्कि वित्तीय नियमों के उल्लंघन के विरुद्ध होगी। वस्‍तुत: इसी बिंदु पर एफसीआरए संशोधन की बहस को धार्मिक अधिकार बनाम सरकारी नियंत्रण की द्वंद्वात्मक भाषा से निकालकर वित्तीय जवाबदेही और राष्ट्रीय हित के व्यापक संदर्भ में देखने की जरूरत है।

यही वह प्रश्न भी है जिसका उत्तर चर्च प्रतिनिधियों से भी अपेक्षित है; यदि विदेशी धन पारदर्शी तरीके से आता है, घोषित उद्देश्य पर खर्च होता है और सभी कानूनी शर्तों का पालन करता है, तो अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही वाली व्यवस्था से वास्तविक आपत्ति आखिर किस बात की है?

विदेशी धन पर निगरानी लोकतंत्र के विरुद्ध नहीं

वास्‍तव में आज विदेशी अंशदान पर निगरानी को लोकतांत्रिक अधिकारों के विरुद्ध बताना एक ऐसी दलील है, जिसकी व्यापक पड़ताल जरूरी है। लोकतंत्र नागरिकों और संस्थाओं को अपनी गतिविधियां चलाने की स्वतंत्रता देता है, मगर ध्‍यान रहे कि यह स्वतंत्रता वित्तीय जवाबदेही से मुक्त नहीं करती। जब धन देश के बाहर से आता है, तब सरकार का यह जानना स्वाभाविक है कि उसका स्रोत क्या है, वह किस उद्देश्य के लिए आया है और उसका इस्तेमाल कहां हुआ। कहना होगा कि एफसीआरए इसी बुनियादी सिद्धांत को लागू करने का माध्यम है।

यदि किसी धार्मिक संस्था को देश के भीतर से मिलने वाला सामान्य दान उसके लिए लेखांकन और आयकर संबंधी नियमों के अधीन है, तो विदेश से आने वाले धन के लिए अतिरिक्त निगरानी को असामान्य क्यों माना जाए? विदेशी धन के साथ विदेशी हित, विदेशी प्राथमिकताएं और कभी-कभी विदेशी प्रभाव की संभावनाएं भी जुड़ी होती हैं, इसलिए इस धन को सामान्य घरेलू चंदे की तरह देखना नीति की दृष्टि से पर्याप्त नहीं हो सकता।

विदेशी फंडिंग और प्रभाव का संबंध

विदेशी सहायता अपने आप में गलत नहीं है। भारत में अनेक संस्थाएं शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा राहत, महिला सशक्तीकरण, बाल कल्याण और सामाजिक सेवा के क्षेत्रों में विदेशी सहायता का इस्तेमाल करती रही हैं। समस्या तब पैदा होती है, जब वित्तीय सहायता धीरे-धीरे किसी व्यापक प्रभाव-तंत्र का हिस्सा बन जाए।

किसी संस्था के पास लगातार विदेशी संसाधन आते हैं तो उसकी गतिविधियों का विस्तार होता है, उसकी जनसंपर्क क्षमता बढ़ती है और समाज के विभिन्न वर्गों तक उसकी पहुंच मजबूत हो सकती है। यह अपने आप में अवैध नहीं है। मगर इसी कारण पारदर्शिता भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। सरकार को यह सुनिश्चित करना पड़ता है कि विदेशी धन का इस्तेमाल भारत की संवैधानिक व्यवस्था, कानून और सार्वजनिक हित के अनुरूप ही हो।

यही कारण है कि एफसीआरए को सिर्फ चंदे का कानून समझना अधूरा दृष्टिकोण होगा। यह उस आर्थिक रास्ते को नियंत्रित करने वाला कानून है, जिसके माध्यम से विदेशी संसाधन भारतीय सामाजिक जीवन में प्रवेश करते हैं।

क्या धर्म के नाम पर अलग वित्तीय व्यवस्था हो सकती है?

चर्च संगठनों की ओर से धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मार्थ संस्थाओं के अधिकारों की चिंता व्यक्त की गई है। यह चिंता लोकतांत्रिक विमर्श में रखी जा सकती है। मगर इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। धार्मिक संस्था होने से किसी संगठन को विदेशी धन के स्रोत और उपयोग की पारदर्शिता से छूट कैसे मिल सकती है?

धर्मार्थ सेवा और विदेशी धन, दोनों को अलग-अलग देखना होगा

चर्च द्वारा संचालित अस्पताल, स्कूल, अनाथालय, वृद्धाश्रम और सामाजिक सेवा केंद्र माना कि समाज के कमजोर वर्गों के लिए काम करते हैं। मगर इसी आधार पर विदेशी धन के नियमन को कमजोर कर देना समाधान नहीं है। उलटे, बेहतर व्यवस्था यह होगी कि वास्तविक धर्मार्थ संस्थाओं को स्पष्ट, पारदर्शी और समयबद्ध अनुपालन व्यवस्था मिले। जिस संस्था का रिकॉर्ड साफ है, उसे अनावश्यक प्रशासनिक बाधाओं से बचाया जाए; जिस संस्था पर वित्तीय अनियमितता के ठोस प्रमाण हों, वहां कानून पूरी कठोरता से लागू हो। इससे दो बातें एक साथ संभव हैं, धर्मार्थ सेवा भी जारी रहे और विदेशी धन की जवाबदेही भी बनी रहे।

एफसीआरए की सख्ती का अर्थ हर संस्था अपराधी नहीं

एफसीआरए के प्रावधानों पर बहस करते समय एक महत्वपूर्ण अंतर बनाए रखना जरूरी है। किसी संस्था का एफसीआरए पंजीकरण रद्द होना अपने आप में यह प्रमाण नहीं है कि संस्था ने कोई गंभीर आपराधिक कृत्य किया है। प्रशासनिक उल्लंघन, दस्तावेजी कमी, नियमों का पालन न करना और जानबूझकर विदेशी धन के दुरुपयोग जैसे मामलों की प्रकृति अलग-अलग हो सकती है, इसलिए सरकार की कार्रवाई भी प्रमाण, प्रक्रिया और कानून के आधार पर होगी। यदि कोई संस्था नियमों का पालन करती है तो उसे इससे कोई परेशानी होनेवाली नहीं है। हां, यदि कोई संस्था विदेशी धन का गलत इस्तेमाल करती है तो धार्मिक पहचान उसे कानून से सुरक्षा नहीं दे सकती, इतना तय है ।

असली चिंता वहां शुरू होती है जहां सेवा और प्रभाव की सीमा धुंधली हो

धर्मार्थ सेवा और धार्मिक प्रभाव के बीच की रेखा कई बार बेहद संवेदनशील हो जाती है। किसी गरीब को भोजन देना, किसी बीमार का इलाज करना, किसी बच्चे को शिक्षा देना या किसी आपदा पीड़ित की सहायता करना अपने आप में सामाजिक सेवा है। मगर यदि ऐसी गतिविधियों के पीछे विदेशी धन का इस्तेमाल किसी विशेष वैचारिक या धार्मिक प्रभाव के विस्तार के लिए किया जा रहा हो, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

दुनिया के अनेक देशों में विदेशी फंडिंग को लेकर कठोर नियम हैं। इसका कारण यह है कि आधुनिक समय में प्रभाव सिर्फ सैन्य शक्ति से नहीं आता। आर्थिक संसाधन, गैर-सरकारी संगठन, शोध संस्थान, मीडिया नेटवर्क, डिजिटल अभियान और सामाजिक आंदोलनों के माध्यम से भी किसी देश के भीतर प्रभाव निर्मित किया जा सकता है। इस संदर्भ में भारत का अपने विदेशी अंशदान कानून को समय के अनुसार मजबूत करना असामान्य नहीं है। यहां सभी को समझना होगा कि राष्ट्रीय सुरक्षा का अर्थ सीमा पर सुरक्षा के साथ वित्तीय संप्रभुता को भी बनाए रखना है, ताकि बाहर से आए धन का दुरुपयोग नहीं हो सके।

अमेरिका या पश्चिमी देशों की आलोचना अंतिम कसौटी नहीं

एफसीआरए को लेकर विदेशी सांसदों, संगठनों या अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की टिप्पणियां बहस का एक हिस्सा हो सकती हैं। मगर भारत में कानून बनेगा या नहीं, यह निर्णय भारतीय संसद, भारतीय संविधान और भारतीय राष्ट्रीय हित के आधार पर होना चाहिए। कोई भी संप्रभु देश यह अधिकार रखता है कि वह अपने यहां आने वाले विदेशी धन के लिए नियम निर्धारित करे। यदि भारत अपने विदेशी अंशदान को विनियमित करता है तो अन्य देशों की अपनी वित्तीय और विदेशी प्रभाव संबंधी व्यवस्थाएं भी हैं, इसलिए किसी विदेशी संस्था या राजनेता की असहमति को भारत के लिए अंतिम प्रमाण मानना उचित नहीं होगा। भारत को अपने अनुभव और अपनी आवश्यकताओं के आधार पर नीति बनानी होगी और वह आज यही कर रहा है।

चर्च की आपत्ति का उत्तर पारदर्शिता से ही संभव

अब मूल प्रश्न पर लौटते हैं- आखिर चर्च को एफसीआरए संशोधन विधेयक से इतनी दिक्कत क्यों हो रही है? यदि चर्च और अन्य धर्मार्थ संस्थाएं यह चाहती हैं कि उनकी सामाजिक सेवा गतिविधियों पर अनावश्यक प्रशासनिक दबाव न हो, तो सबसे प्रभावी रास्ता यही है कि वे पूर्ण वित्तीय पारदर्शिता रखें। हर विदेशी दाता की पहचान, धन के उद्देश्य, परियोजना-वार खर्च, संपत्ति के विवरण और लेखांकन की जानकारी सार्वजनिक होने में किसी वैध संस्था को सिद्धांततः कठिनाई नहीं होनी चाहिए।

बहस का समाधान टकराव में नहीं, स्पष्ट नियमों में है

एफसीआरए संशोधन को लेकर चल रही बहस को धार्मिक बनाम धर्मनिरपेक्ष, सरकार बनाम चर्च अथवा बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक के खांचे में रख देना समस्या को और जटिल करता है। असली मुद्दा इससे कहीं व्यापक है। यह सच है कि भारत को विदेशी धन चाहिए- विशेषकर विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा राहत और सामाजिक सेवा के क्षेत्रों में। मगर भारत को विदेशी प्रभाव से अपनी संस्थागत स्वतंत्रता भी सुरक्षित रखनी है। दोनों उद्देश्यों में कोई अनिवार्य टकराव नहीं है।

अंतिम सवाल संस्थाओं से भी पूछा जाना चाहिए

लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना जरूरी है, मगर नागरिक संस्थाओं से सवाल पूछना भी उतना ही जरूरी है। यदि सरकार से पारदर्शिता की अपेक्षा की जाती है तो गैर-सरकारी और धार्मिक संस्थाओं से भी पारदर्शिता की अपेक्षा स्वाभाविक है। जो संस्था समाज के लिए काम करती है, उसके लिए जनता का विश्वास सबसे बड़ी पूंजी है। विदेशी धन का पूरा हिसाब देना उस विश्वास को कमजोर नहीं, मजबूत करता है। यदि धन का उपयोग घोषित उद्देश्य के अनुरूप हुआ है तो पारदर्शिता संस्था के पक्ष में ही जाएगी।

अत: एफसीआरए पर बहस का सबसे मजबूत रास्ता यही है कि विदेशी धन आए, वैध काम में लगे, गरीब और जरूरतमंद तक पहुंचे, धर्मार्थ संस्थाएं स्वतंत्र होकर सेवा करें, मगर धन के स्रोत और उपयोग पर भारत सरकार तथा भारतीय जनता को स्पष्ट जवाब भी मिले। वस्‍तुत: यही वित्तीय पारदर्शिता है। यही राष्ट्रीय हित है। और यही लोकतांत्रिक जवाबदेही की मूल भावना भी है।

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