दिल्ली। ऑलन ऑक्टेवियन ह्यूम (A.O. Hume), ब्रिटिश इंडियन सिविल सर्विस (ICS) के अधिकारी थे। उन्होंने 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में प्रमुख भूमिका निभाई। ह्यूम ने इसे भारतीयों के लिए एक मंच के रूप में देखा, जहां वे अपनी शिकायतें संवैधानिक तरीके से रख सकें। कई इतिहासकार इसे “सेफ्टी वॉल्व” थ्योरी कहते हैं-ब्रिटिश साम्राज्य के हित में उग्र राष्ट्रवाद को नियंत्रित करने का साधन।
ह्यूम ने 1883 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्नातकों को खुला पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने एक राष्ट्रव्यापी संगठन की जरूरत बताई। पहला अधिवेशन 28 दिसंबर 1885 को मुंबई में हुआ, जिसमें 72 प्रतिनिधि थे (ज्यादातर वकील और शिक्षित वर्ग)। ह्यूम इसके पहले 22 वर्षों तक महासचिव रहे। कांग्रेस शुरू में ब्रिटिश शासन के सुधारों की मांग करती थी, न कि पूर्ण स्वराज की। प्रारंभिक नेता जैसे वी.सी. बनर्जी, दादाभाई नौरोजी आदि ब्रिटेन में पढ़े हुए थे।
यह सही है कि कई बड़े कांग्रेस नेता लंदन से बैरिस्टर (बैरिस्टर-एट-लॉ) थे। ब्रिटिश कानूनी शिक्षा महंगी थी, जो मुख्यतः धनी परिवारों तक सीमित थी। इनका क्लाइंटेल अक्सर जमींदार, तालुकदार और बड़े व्यापारी होते थे, जो ब्रिटिश व्यवस्था से जुड़े थे। मोतीलाल नेहरू इसका क्लासिकल उदाहरण हैं। वे इलाहाबाद हाईकोर्ट के प्रमुख वकील थे। उन्होंने जमींदारों के मुकदमे लड़े, जैसे लखना राज केस (इटावा), अमेठी राज आदि। प्रिवी काउंसिल तक गए और भारी फीस कमाई। किसानों-मजदूरों के मुकदमे उनका मुख्य स्रोत नहीं थे।
कांग्रेस बाद में उग्र राष्ट्रवादी बनी (स्वदेशी, असहयोग, सविनय अवज्ञा), जिसने ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दी। ह्यूम खुद भारतीय स्वशासन के पक्षधर थे और बाद में लंदन से समर्थन करते रहे। औपनिवेशिक काल में अंग्रेजी शिक्षा ही उच्च पद और राजनीति का द्वार थी।
नेहरू: सत्ता हथियाना, विभाजन और विरासत
जवाहरलाल नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री बने, लेकिन उनका चयन विवादास्पद रहा। 1946 में कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए प्रादेशिक कांग्रेस कमेटियों (PCC) की नॉमिनेशन में सरदार वल्लभभाई पटेल को 12 में से 12 समर्थन मिला, नेहरू को शून्य। पटेल ने गांधीजी के अनुरोध पर नाम वापस ले लिया। गांधी ने नेहरू को पसंद किया क्योंकि वे युवा, अंग्रेजी बोलने वाले, आधुनिक विचारों वाले और अंतरराष्ट्रीय छवि वाले थे। पटेल को मजबूत संगठनकर्ता माना जाता था।
नेहरू अंतरिम सरकार (1946) के उप-प्रधानमंत्री बने और 15 अगस्त 1947 को प्रधानमंत्री। 1952 के चुनावों तक यह “अनचुने” प्रधानमंत्री वाली बहस सही है-कोई सार्वजनिक वोट नहीं था, लेकिन कांग्रेस की आंतरिक प्रक्रिया और गांधी की पसंद तय कर गई। नेहरू ने बाद में 1952, 1957, 1962 में लोकप्रिय जनादेश जीते।
विभाजन पर: 1946 कैबिनेट मिशन प्लान में ढीला संघीय ढांचा था, जिसे नेहरू ने अस्वीकार किया क्योंकि यह कमजोर केंद्र बनाता। मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग की। जिन्ना की ‘डायरेक्ट एक्शन’ और दंगे बढ़े। गांधी ने एक बार जिन्ना को संयुक्त भारत का पीएम बनाने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन यह नेहरू को स्वीकार नहीं था। ना नेहरू को यह स्वीकार था कि देश के प्रधानमंत्री पटेल बने।
जिन्ना का कैंसर 1940 के दशक के अंत में पता चल गया था, उन्हें सशर्त प्रधानमंत्री बनाया जा सकता था। यदि ऐसा होता तो देश का बंटवारा नहीं होता। इसलिए आगे से जब हम बंटवारे की बात करे तो इसके बंटने से किसे डायरेक्ट बेनीफिट हासिल हुआ। इस पर जरूर चर्चा करें।
ब्रिटिश (माउंटबेटन) जल्दी निकलना चाहते थे। कांग्रेस नेतृत्व ने नेहरू के दबाव में अंततः विभाजन स्वीकार किया क्योंकि विभाजित भारत में हिन्दुस्तान वाले हिस्से का नेतृत्व नेहरू करेंगे, यह बात तय हो गई थी। गांधी इसके खिलाफ थे लेकिन असहाय हो गए। आजादी मिलने के बाद भी एक बार गांधी ने दोनों देशों को जोड़ने के लिए आंदोलन की योजना बनाई थी, उसे कार्यान्वित करते। उसके पहले उनकी हत्या हो गई। जब गांधी की हत्या हुई। फिर उन लोगों की जांच कौन करता, जो सत्ता में थे। जो कांग्रेसी पत्रकार आज मीडिया के विपक्ष की भूमिका निभाने की इतनी वकालत करते हैं, वे गांधी हत्या के बाद उन लेखों को तलाश कर लाएं, जिसमें कांग्रेस और नेहरू से प्रश्न पूछा गया हो। सरकार नेहरू चला रहे थे, फिर गांधी हत्या का सारा ठीकरा आरएसएस पर क्यों फोड़ दिया गया? गांधी की जान खतरे में है, इस बात की जानकारी सरकार के पास थी, नेहरू ने गांधी की सुरक्षा के लिए क्या किया? यह क्या कोई संयोग था कि गांधी ने कांग्रेस पार्टी को खत्म कर देने की बात की और उनकी हत्या हो गई। इस पर कभी किसी समाचार पत्र में उस दौर में क्यों नहीं लिखा? राजदीप, प्रणॉय रॉय, रामचन्द्र गुहा, करण थापर, सिद्धार्थ वरदराजन को कभी इस मुद्दे पर कुछ लिखने की क्यों नहीं सुझी? जिम्मेदारी ब्रिटिश ‘डिवाइड एंड रूल’, लीग की दो-राष्ट्र थ्योरी और कांग्रेस की गलतियों पर बंटती है।
ऐतिहासिक तथ्यों की कसौटी पर नेहरू
कश्मीर: 1947 में पाक आक्रमण पर भारतीय सेना भेजी, लेकिन UN में शिकायत कर युद्धविराम स्वीकार किया। पूर्ण एकीकरण नहीं हुआ। नेहरू की अंतरराष्ट्रीय छवि और ‘सेकुलर’ इमेज इसकी दोषी थी।
विदेश नीति: गुटनिरपेक्षता आदर्शवादी थी, लेकिन 1962 चीन युद्ध में भारत की तैयारी कमजोर पड़ी। नेहरू ने चीन को ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ कहा, लेकिन सीमा विवाद अनसुलझा रहा। भारत ने मुंह की खाई।
आर्थिक नीति: समाजवादी मॉडल, लाइसेंस राज, भारी उद्योग पर जोर। प्रारंभिक विकास हुआ लेकिन 1960-70 के दशक में कृषि और निजी क्षेत्र उपेक्षित रहे।
परिवारवाद: नेहरू के बाद इंदिरा-राजीव लाइन चली, जो लोकतंत्र के लिए सवालिया निशान।
धर्मनिरपेक्षता: कुछ आलोचक कहते हैं कि मुस्लिम तुष्टीकरण (हिंदू कोड बिल बनाम मुस्लिम पर्सनल लॉ) ने विभाजन की मानसिकता को बढ़ावा दिया।
कांग्रेस ब्रिटिश काल में elite-driven थी, ह्यूम का रोल safety valve जैसा था। ह्यूम ने अपना डबल एजेन्ट की भूमिका खुबसूरती से निभाई। अंग्रेज भी चाहते थे कि भारत की सत्ता एक ऐसा व्यक्ति संभाले जो सिर्फ पैदा भारत में हुआ हो। उसकी सोच और परवरिश सब ब्रिटिश हो। नेहरू उनकी सोच पर पूरी तरह खरे उतरते थे। उन्होंने सत्ता संभाली भी। वह सिर्फ गांधी की पसंद थे। देश पटेल को प्रधानमंत्री देखना चाहता था।



