अतीत की आशंका, वर्तमान का संवाद: गोलवलकर से भागवत तक

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आतिफ रशीद

दिल्ली। भारत के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास को समझने का सबसे सुरक्षित तरीका यही है कि हर विचार को उसके समय के भीतर रखा जाए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय मुसलमानों के संबंधों पर भी यही नियम लागू होता है। आज जब मोहन भागवत भारतीय मुसलमानों को समाज का अभिन्न हिस्सा बताते हैं, तो उनके वक्तव्य को गुरु गोलवलकर के दौर से जोड़कर पढ़ना उपयोगी है-तुलना के लिए नहीं, संदर्भ के लिए।

 

विभाजन की पीढ़ी और ‘Bunch of Thoughts’ का समय

गोलवलकर की पुस्तक Bunch of Thoughts में मुसलमानों को लेकर कठोर टिप्पणियाँ हैं। “miniature Pakistans” जैसी अभिव्यक्ति भी उसी पुस्तक में आती है। यह भाषा आज के कानों में तीखी लगती है, और लगनी भी चाहिए। लेकिन 1947 के तुरंत बाद का भारत एक घायल देश था। विभाजन की त्रासदी ताज़ा थी, भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध और तनाव का वातावरण था, और लाखों परिवार सीमा के दोनों ओर बँटे हुए थे। किसी का भाई भारत में था तो दूसरा पाकिस्तान में; किसी की माँ या बहन उधर रह गई थी। उस पीढ़ी के लिए सीमा-पार रिश्तेदारी सामान्य अनुभव था।

इसी पृष्ठभूमि में गोलवलकर को राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा को लेकर गहरी आशंकाएँ थीं। उन्होंने उन लोगों की चर्चा की जिनकी निष्ठा भारत के बजाय पाकिस्तान से जुड़ी दिखाई देती थी। उनकी चिंता को उनके समय में समझा जा सकता है। उसे आज के प्रत्येक भारतीय मुसलमान पर थोपना न तो इतिहास की समझ है, न न्याय।

क्रिकेट के मैदान से बदलती पीढ़ी तक

1960 से 1980 का दौर भी तनावपूर्ण रहा। 1965 और 1971 के युद्ध के बाद भारत-पाक क्रिकेट अक्सर खेल से अधिक भावना बन जाता था। उस समय कभी-कभी कुछ भारतीय मुसलमान पाकिस्तान टीम का समर्थन करते दिखे। इसके पीछे पारिवारिक स्मृतियाँ, विभाजन की छाया या पहचान की उलझन हो सकती थी। लेकिन कुछ लोगों के व्यवहार को पूरे समुदाय का चरित्र मान लेना गलत है।

1980 के बाद यह दूरी धीरे-धीरे बढ़ी। 1990-2000 तक आते-आते बड़ी संख्या में भारतीय मुसलमानों के लिए पाकिस्तान व्यक्तिगत पारिवारिक अनुभव नहीं, एक अलग देश रह गया। आज का हिंदुस्तानी मुसलमान मुख्यतः उसी भारत में पैदा हुआ है जिसमें वह रहता है। उसका स्कूल, नौकरी, कारोबार, मित्र मंडली और बच्चों का भविष्य यहीं है। दो-तीन पीढ़ियों बाद कई पुराने सीमा-पार रिश्ते भी समाप्त हो चुके हैं। इसलिए 1947 की मानसिकता से 2026 के भारतीय मुसलमान को नापना उचित नहीं।

भागवत का संदेश और नए संवाद की जगह

यहीं मोहन भागवत का वर्तमान स्वर महत्वपूर्ण हो जाता है। 29 अगस्त 2026 को न्यूयॉर्क में ‘One World, One Humanity’ कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि यदि कोई हिंदू यह सोचता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रहेगा। उन्होंने यह बात 2018 के उस संवाद के संदर्भ में दोहराई, जब मुस्लिम श्रोताओं ने उनसे पूछा था कि हिंदू राष्ट्र का अर्थ क्या उन्हें देश से निकालना है। उनका उत्तर था—नहीं, वह हिंदुत्व नहीं है।

यह वक्तव्य केवल मुसलमानों के लिए आश्वासन नहीं है। यह हिंदू समाज के लिए भी स्पष्ट सीमा है: भारत में मुसलमानों की नागरिक उपस्थिति विवाद का विषय नहीं होनी चाहिए। गोलवलकर अपने अस्थिर समय की आशंकाएँ लिख रहे थे; भागवत कई पीढ़ियों बाद के भारत की बात कर रहे हैं। दोनों को एक ही वाक्य में बाँधकर खारिज करना या महिमामंडित करना, दोनों ही सरलताएँ हैं।

आवश्यकता टकराव की नहीं, संवाद की है। भारतीय मुसलमान को अपने पूर्वजों के फैसलों का बोझ ढोकर निष्ठा सिद्ध नहीं करनी चाहिए। उनका मूल्यांकन उनके वर्तमान जीवन, उनके योगदान और भारत के प्रति उनके बोध से होना चाहिए। हिन्दू समाज को भी यह स्वीकार करना होगा कि देश की मजबूती साझी भागीदारी में है। इतिहास भुलाया नहीं जाना चाहिए; इतिहास की मानसिकता में हमेशा रहना भी राष्ट्रहित नहीं है।

भारत का भविष्य किसी एक समुदाय की जीत में नहीं, इस विश्वास में है कि यहाँ रहने वाला हर नागरिक-चाहे वह किसी भी धर्म का हो-इस देश के भविष्य का बराबर भागीदार है। संघ और हिंदुस्तानी मुसलमानों के बीच सकारात्मक, राष्ट्रहित आधारित संवाद यहीं से शुरू हो सकता है।

(लेखक आतिफ रशीद, पूर्व उपाध्यक्ष, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, भारत सरकार रहे हैं)

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