BBC के CNR में क्या मुस्लिम वीडियो एडिटर और हिंदुओं के लिए है ना

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विवेक गुप्ता

खुर्जा (उप्र) : मीडिया की विश्वसनीय वेबसाइट भड़ास4मीडिया में शीर्षक “भड़ास में खबर छपने के बाद बीबीसी इंडिया से इकबाल का इस्तीफा वापस; ये पाँच बड़े अपडेट पढ़िए!” से छपी खबर के माध्यम से मीडिया की अनकही,अपचनीय,काली और भूरी सच्चाई बताने की कोशिश करूंगा.

भड़ास लिंक 1:
https://www.bhadas4media.com/bbc-india-five-big-updates/

विश्वसनीय वेबसाइट भड़ास4मीडिया में छपी इस खबर में ‘5 अपडेट’ की बात की गई है. जिसमें से पहला अपडेट मैंने हूबहू लिख दिया है.

पहला: आपने जो खबर प्रकाशित की थी कि इकबाल अहमद ने इस्तीफा दे दिया है,वह अब वापस हो गया है. बताया जा रहा है कि आपकी (Bhadas4Media) खबर प्रकाशित होने के बाद उनका इस्तीफा वापस ले लिया गया.

इसका मतलब,इस बात की संभावना ज्यादा हैं कि इकबाल अहमद ने खुद या अपने किसी साथी की मदद से ये खबर भड़ास को भेजी हो. जिससे कलेक्टिव न्यूज रूम के निर्णायक लोगों पर दवाब बने और उनका इस्तीफा वापस ले लिया जाए. क्योंकि कोई भी संस्थान विवादों में नहीं फंसना चाहता और बीबीसी के कंटेंट पार्टनर कलेक्टिव न्यूजरूम को आए अभी चंद महीने ही हुए हैं.

उनके इस्तीफे की जो खबर छपी थी उसे भी नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके पढ़िए…

भड़ास लिंक 2:

https://www.bhadas4media.com/collective-newsroom-muslim…/

बेहद जरूरी और आंखें खोलने वाली पोस्ट का पूरा मर्म समझने के लिए आप इन दो लिंक पर क्लिक करके Bhadas4media में छपी ये दोनों खबरें जरूर पढ़ें…
इस खबर में लिखा भी है.

“सीएनआर के प्रबंध निदेशक संजय मजूमदार से इकबाल अहमद की मार्च महीने में ओखला स्थित दफ्तर में खुल कर मतभेद हुए और इकबाल ने उन्हें इस बात का दोषी ठहराते हुए सीईओ से शिकायत की. मामला एचआर तक गया जहां संजय की सुनी गयी क्योंकि उनका तर्क सही साबित हुआ. इकबाल ने क्रोधित होते हुए अपना त्यागपत्र उसी रात सीएनआर और बीबीसी प्रबंधन को भेज दिया.

सुनवाई में कम्पनी के बोर्ड ने एकमत से उन्हें पद छोड़ने को कहा और उनके इस्तीफे की सूचना संजय मजूमदार ने एक मेल के जरिए सभी स्टाफ को दे दी है.”
इस खबर में भी साफ लिखा है मामला HR तक गया जहां संजय मजूमदार का तर्क सही साबित हुआ. जब संजय जी सही साबित हुए तो इकबाल जी अप्रत्यक्ष रूप से दवाब क्यों बना रहे थे.

पता नहीं देश में एक धर्म विशेष के लोग हमेशा विक्टिम कार्ड क्यों खेलते हैं. सनातन का विरोध करना,राष्ट्रवादी नेताओं,राष्ट्रवादी विचारधारा को गरियाना,हिन्दू लड़कियों को बहकाना,भड़काना, रिझाना ही एक धर्म विशेष के वामपंथियों का मुख्य काम बन गया है.

इकबाल अहमद जी इस्तीफा कोई जबरदस्ती वापस नहीं ले सकता. अगर वाकई आपने इस्तीफा दिया था और आपका कलेक्टिव न्यूज रूम पर दवाब बनाने का कोई प्रयास नहीं था तो आपको कोई जबरदस्ती रीजॉइनिंग के लिए नहीं बुला सकता. ना ही आपका कोई फंड या पैसा रोक सकता है. तो आप अगर इस नाटक के पीछे नहीं हैं तो साफ बोल दीजिए मैंने इस्तीफा अपनी मर्जी से दिया है और अब मैं ज्वाइन नहीं कर पाऊंगा.

अब आते हैं दूसरे अपडेट पर…
दूसरा: वहां काम करने वाले कुछ लोगों का कहना है कि यह कहना सही नहीं है कि BBC इंडिया BBC News हिन्दी में मुसलमानों को मौका नहीं मिलता. उनके मुताबिक,उन्हें पर्याप्त अवसर मिलते हैं,बल्कि कुछ विभागों में उनकी संख्या अधिक है. उदाहरण के तौर पर,वीडियो एडिटर टीम का प्रमुख मुस्लिम है और दावा किया जा रहा है की टीम में अधिकांश सदस्य मुस्लिम हैं तथा उसने कोई हिंदू नियुक्त नहीं किया.

अगर विश्वसनीय भड़ास और भड़ास के पक्के सोर्स पर यकीन करें तो इस बहुसंख्यक देश में जहां मीडिया में मुसलमानों की संख्या बहुत कम है,वहीं एक बड़े संस्थान में वीडियो एडिटर टीम में अधिकांश सदस्य मुस्लिम होना क्या साबित करता है? इस वीडियो एडिटर ने कोई हिन्दू नियुक्त नहीं किया? अगर ये सच है तो इसका मतलब ये वीडियो एडिटर पूरी तरह मुस्लिम परस्त है,और इसके चयन के पैमाने में सबसे अनिवार्य शर्त थी आपका गैर हिन्दू होना या यूं कहें आपका मुस्लिम होना? यानी दलितों,आदिवासियों और पिछड़ों की खबरों से नंबर और व्यूज लेकर इनके साथ भी इस वीडियो एडिटर और इस जैसे अन्य मुस्लिम वामपंथी ने खेला कर दिया? क्योंकि दलित,पिछड़े,आदिवासी ना ही गैर हिन्दू हैं और ना ही मुस्लिम.

 

पता नहीं बीबीसी के कंटेंट पार्टनर कलेक्टिव न्यूजरूम में वीडियो एडिटर के जैसे और कितने लोग हैं? पता नहीं यहां वीडियो एडिट के सेक्शन की तरह और इस तरह के कितने सेक्शन हैं जहां इस तरह की चीजें हो रहीं हैं?
खैर ये तो कोई बड़ी बात नहीं अपने अनुभव से पक्का कह रहा हूं मुस्लिम वामपंथी अंदर से कट्टर मुस्लिम,सनातन विरोधी होते हैं.(यहां अपवाद नहीं है,बस आपको अधिकतम 72 घंटे इनके साथ रहना है. एक बार चेहरा जरूर सामने आ जाएगा.) जब कभी मुस्लिम वामपंथी के बारें में लिखता या सोचता हूं तो मुझे कश्मीरी पुलाव याद आ जाता है,जिसमें कश्मीर नहीं होता जैसे मुस्लिम वामपंथी में वामपंथ नहीं होता.

वैसे अगर यहां मुस्लिमों को बड़ी संख्या में रखना भी था तो उसमें मुस्लिम फीमेल की संख्या अच्छी होनी चाहिए थी. जिससे जेंडर बैलेंस बना रहता. जब एजुकेशन इंस्टीट्यूट और ऑफिस में मुस्लिम मेल,मुस्लिम फीमेल की तुलना में बहुत ज्यादा होंगे तो लव जेहाद या बहकाना,भड़काना,रिझाना जेहाद के मामले सामने आएंगे ही.
एजुकेशन इंस्टीट्यूट और मीडिया ऑफिस में सवर्ण हिंदू लड़कियों की संख्या बहुत होती हैं. ये अपेक्षाकृत देखने में भी बेहतर होती हैं. अक्सर ये लिबरलता के विषाणु से ग्रसित होती हैं. जिससे ये आसानी से आधुनिकता की आड़ लेकर अपने नापाक मकसद को पूरा करने वाले मुस्लिम वामपंथियों के बहकावे में आ जाती हैं. एक काफिर को मुसलमान बनाने में जन्नत पक्की होती ही है तो कौन बेवकूफ मौका छोड़ेगा.

पहले NDTV और अब News24 में काम कर रहे छद्म वामपंथी आरिफ मंसूरी का उदाहरण ले लीजिए. ये भी वामपंथ की आड़ में आधुनिकता के हथियार से लिबरल सवर्ण हिंदू लड़कियों को बहकाने,भड़काने,रिझाने का काम करता है. जो भी इसके नापाक इरादों के आड़े आता है,इसका काला सच बताकर सबको आगाह करना चाहता है,ये उस मासूम को छद्म वामपंथी देशबंधु सिंह,छद्म वामपंथी समरजीत सिंह,छद्म वामपंथी विवेक रस्तोगी और सेक्सुअल हैरेसमेंट का मेलधारी रविकांत ओझा की मदद से अपने रास्ते से पूरी तरह हटा देता है.

जिसके बाद देशबंधु सिंह के दिए अंधाधुंध अधिकार और छूट आरिफ मंसूरी को ऑफिस में जूनियर लड़कियों के साथ द्विअर्थी मजाक करने,”आज तो महक रही हो,बाबू” के संबोधन से ऑफ़िस के अंदर उन्हें संबोधित करने,लड़कियों को ऑफ़िस के बाद कॉल और मैसेज करने में बहुत मदद करते हैं. ध्यान रहे जब आपके पास पावर है,आप शिफ्ट इंचार्ज हैं तब आपकी बात सबको सुननी तो पड़ेगी ही.

क्या BBC News के कलेक्टिव न्यूज रूम में भी कोई आरिफ मंसूरी जैसा है? अगर ऐसा है तो किसी को सामने आकर सच बताना होगा. जिससे मासूमों को बचाया जा सके. किसी का नाम सामने नहीं आएगा. अगर कोई सबूत मिल जाए तो फिर हनुमान जी की जय…

अब ध्यान रखिएगा यहां के PM मोदी जी Narendra Modi हैं ना कि एंडी बर्नहैम और ये 1947 से पहले का समय नहीं चल रहा है…
इस पोस्ट के कमेंट में मैंने भड़ास की खबर के स्क्रीन शॉट डाल दिए हैं,जिससे आपको समझने में आसानी हो.

(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। इनसे मीडिया स्कैन की सहमति या समर्थन अनिवार्य नहीं है।यदि इस लेख पर आपकी कोई प्रतिक्रिया है अथवा दूसरे पक्ष को अपनी बात रखनी हो, तो कृपया mediainvite2017@gmail.com पर भेजें)

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