बिहार उप चुनाव पर आई प्रतिक्रियाएं

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सुभाष चन्द्र लिखते हैं:

क्या बिहार की राजनीति नए समीकरणों की ओर बढ़ रही है?

बिहार की राजनीति एक बार फिर दिलचस्प मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। विधानसभा चुनावों के बाद बदलते राजनीतिक समीकरणों को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। इन्हीं चर्चाओं के बीच एक सवाल बार-बार उठ रहा है कि क्या राज्य में विपक्ष की राजनीति को नए सिरे से आकार देने की कोशिश हो रही है?

कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि विपक्ष में एक नया चेहरा मजबूत होकर उभरता है, तो पारंपरिक विपक्षी दलों के सामने चुनौती खड़ी हो सकती है। वहीं दूसरी राय यह भी है कि यदि विपक्ष कई हिस्सों में बंटता है, तो इसका लाभ सत्तारूढ़ दल को मिल सकता है। ऐसे में यह चर्चा भी हो रही है कि क्या किसी नए राजनीतिक नेतृत्व के उभार से विपक्ष का स्वरूप बदलेगा या वह केवल पारंपरिक दलों की राजनीतिक जमीन को प्रभावित करेगा।

प्रशांत किशोर की सक्रिय राजनीति में भूमिका को लेकर भी कई तरह के अनुमान लगाए जा रहे हैं। समर्थकों का कहना है कि वे बिहार की राजनीति में नया विकल्प देने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि आलोचकों का आरोप है कि उनकी राजनीति अंततः विपक्षी वोटों के पुनर्वितरण का कारण बन सकती है। हालांकि, इन दावों के समर्थन में अभी कोई ठोस प्रमाण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन्हें राजनीतिक अटकलों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या प्रशांत किशोर स्वयं को राज्य के प्रमुख विपक्षी चेहरे के रूप में स्थापित कर पाते हैं, या फिर पारंपरिक दल अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखते हैं। इतना तय है कि बिहार विधानसभा का आगामी कार्यकाल राजनीतिक रणनीतियों, आरोप-प्रत्यारोप और नए समीकरणों के लिहाज से काफी रोचक रहने वाला है।

राजनीति में अंतिम फैसला जनता के जनादेश से ही तय होता है। इसलिए वर्तमान में चल रही तमाम चर्चाओं और कयासों का वास्तविक उत्तर आने वाले चुनावी परिणाम ही देंगे।

कर्मेंन्दु शिशिर लिखते हैं :

बाँकीपुर पटना की सीट अगर प्रशांत किशोर जीत जाते हैं, जैसी प्रबल उम्मीद है। लगभग निश्चित,तो यह बिहार के लिए एक चमत्कार ही होगा।

चमत्कार इसलिए कि बिहार जाति और  धर्म से मुक्त विचारधारात्मक लड़ाई लड़ता तो है लेकिन चुनाव में जाति निर्णायक हो जाती है। इस बार अलग होने जा रहा है।यह बहुत ही स्वागत योग्य है। जब-जब बिहार ने चुनाव में ऐसा किया है, बड़ा बदलाव हुआ है। बिहार में जाति की जकड़न इतनी प्रबल है कि यहाँ के बुद्धिजीवी तक इसका खुलकर लाभ उठाते हैं।आप अपराधी-शिरोमणि रहिए या शीर्ष भ्रष्टाचारी आपको भरपूर समर्थन मिल जायेगा।इसलिए यहाँ लूट की छूट जातिगत समर्थन पर निर्भर है । पूर्व सवर्ण अपराधियों और भ्रष्टाचारियों से लेकर आज तक इसकी परंपरा बदस्तूर कायम है।

मेरे सहपाठी और परिचितों में भी जिनके पास पटना में रात को टिकने की जगह नहीं होती थी ,आज अरबपति हैं।डंके की चोट पर वे और उनके समर्थक इस तरह उनके पक्ष में सशस्त्र रहते हैं कि अगर आपने उनके सच की चर्चा कर दी तो आपको वे लहूलुहान कर सकते हैं।

ऐसे समय में प्रशांत किशोर की जीत एक उम्मीद तो जगाती ही है। लेकिन यह जीत भी बहुत उत्साहित करने वाली साबित होगी ही, ऐसा नहीं है।प्रशांत किशोर हर घाट का पानी पी चुके हैं। इनका लिंक कहाँ है, कोई नहीं जानता।जो आदमी यह कहे कि उसकी कोई विचारधारा नहीं, वह सबसे खतरनाक विचारधारा वाला है।जनता प्रवाह में बह जाती है। सम्राट चौधरी और भाजपा अध्यक्ष के गरूर को मरोड़ने के नजरिए से इस निश्चित संभावित जीत का खूब स्वागत होना चाहिए।

रुद्र विक्रम सिंह लिखते हैं :

दतिया और बांकीपुर विधानसभा सीट के परिणाम ने ये बता दिया कि भाजपा के उस दौर की धीरे धीरे समाप्ति हो रही है जिसमे गधे घोड़े सब जीत जाया करते थे,
समय रहते अगर आपने प्रदेशों में जो सांकेतिक मुख्यमंत्री बनाये रखे हैं उन्हें नहीं बदला गया तो परिणाम ऐसे ही होंगे !

राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की वो सीट जिसपर भाजपा 1995 से कभी नहीं हारी वहाँ हारना यह बताता है कि डमी अध्यक्ष और कैंडिडेट्स को अब जनता नकारना सीख गई है !
प्रशांत किशोर को बधाई, आशा है बिहार में अब मुद्दों के बात की शुरुआत होगी !

विनय चतुर्वेदी लिखते हैं :

सच बतायें, बांकीपुर ने क्या कहा ….
भाजपा ने सही उम्मीदवार नहीं दिया।
कायस्थ को ही टिकट देना था, तो किसी योग्य को देते।
सम्राट मुख्यमंत्री पद के योग्य नहीं।
तेजस्वी विपक्षी नेता के योग्य नहीं।
विधानसभा में एक गरजने वाला विपक्षी नेता होना चाहिए।
किसी को टिकट देंगे और सोचेंगे कि वह जीत जायेगा, यह भ्रम है।
सही विकल्प दिखा, तो आपको ऐसे ही टाटा-बाय बाय कर देंगे।
अहंकार कम करें और जितना शीघ्र हो, धरातल पर लौटें।
विश्व की सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष की क्षमता यही है।
कोर वोटरों को परेशान करने का यहीं हस्र होता है।
कोई भी सीट किसी जाति या पार्टी की बपौती नहीं होती।

देवांशु झा लिखते हैं :

दीदीजी कह रही हैं कि परसांत किसोर भाजपा का लोमड़ी है। परसांत किसोर के समर्थक कह रहे हैं कि बिहार में अब सूराजे सुराज है। सुवर्ण परतिसोध! दूसौदू सीट जो जीते थे सब सुन्ना हो गया। दतिया में जुबराज का जलवा काम कर गया है। परिबर्तन और किरांती के बीच बिनोदबा कह रहा है कि हम को हाॅग के जाना है नहीं तो पैंटे में हाॅग देंगे! देसभक्त लोग अलगे गरज रहे हैं। बोले रनबीर कपुरवा गाय खाया है ऊ राम बनेगा रे…गोभिल जी ही आखरी राम हैं! समाप्त. दी अंड

पटना से गौरव राय की टिप्पणी :

जो प्रशांत पाड़े के समर्थक है आप पेज से जा सकते हैं। चाहे कोई भी हो न मैं आपका रोज़ी रोटी चलाता हूँ न आप मेरा।

न मुझे लाइक और सब्सक्राइब से पैसा चाहिए न लेता हूँ। सार्वजनिक जीवन में अपनी सुनता हूँ और नफ़ा नुक़सान अब इस उम्र में कोई मायने नहीं रखता। गाली बकोगे गाली सुनना ही होगा उन फ्रेंड उन फ़ॉलो का डर तनिक नहीं है। पाँच मित्र रहेंगे न उसमे भी मैं ख़ुश रहूँगा।

प्रियरंजन कुमार शर्मा लिखते हैं :

बाँकीपुर पिछले 30 साल से भाजपा का गढ़ रहा था। विश्व की सबसे बड़ी पार्टी का मुखिया और उसका परिवार इसी क्षेत्र से लगातार जीतता आ रहा था। इस बार के उपचुनाव में भी सब कुछ झोंक दिया गया था। हर मोहल्ला में जोरदार प्रचार करने के लिए भाजपा के 4-5 दिग्गज उतार दिए गए थे।
बावजूद इनके, भाजपा हार गई। वह भी किससे? उस ‘जन सुराज’ से, पिछले विधानसभा चुनाव में जिसके जीरो प्रत्याशी जीते थे। जिस पार्टी के 238 उम्मीदवारों में से 236 की जमानत ही जब्त हो गई थी।
यह तगड़ा झटका लगना जरूरी भी था। भरत तिवारी एनकाउंटर के मामले में बिहार सरकार संवेदनहीनता की चरम सीमा को पार कर गई थी। जबकि एक अंधा भी साफ साफ महसूस कर सकता था कि इस मामले को लेकर यहाँ की जनता में कितना उबाल है। क्या पिछड़ा, क्या दलित, और क्या सामान्य वर्ग सब एकजुट हो गए थे। यहाँ तक कि खुद भाजपा और उनके सहयोगी दलों के ही कई दिग्गज नेता अपनी सरकार के खिलाफ मुखर हो गए थे।
यूजीसी, पेपर लीक, सीबीएसई आदि मुद्दे की चिंगारी तो कबसे सुलग ही रही थी।
प्रशांत किशोर मौके की नजाकत को भांपकर ही इस उपचुनाव में स्वयं प्रत्याशी बन गए थे। अन्यथा सोचने वाली बात है कि पिछले विधानसभा चुनाव में उसने अपने 238 नेताओं को उतार दिया था, लेकिन खुद उस पार्टी का लीडर होकर भी उम्मीदवार नहीं बने थे। जबकि उसकी पार्टी पहली बार ही किसी चुनाव में उतरी थी।
ऐसे में, घोर आश्चर्य है कि भाजपा तत्कालीन माहौल को कैसे भांप नहीं पाई थी? कहीं ऐसा तो नहीं कि वह भांपकर भी घमंड में चूर-चूर होने के कारण हवा में उड़ रही थी?
खैर, कारण जो भी हो, भाजपा वह पार्टी है जो अपने हर एक हार पर पूरी गहराई से मंथन करती है। अपनी हार का ठीकरा ईवीएम पर नहीं फोड़ती है। उम्मीद है कि वह इस हार को लेकर भी करेगी, और उस मंथन से मिले परिणामों से सबक लेकर अपनी उक्त गलतियों में सुधार करेगी।

पवन विजय लिखते हैं :
सामान्य वर्ग और नए वोटर का विश्वास डांवाडोल है, बाकी समूह पहले से ही किसी और नेतृत्व के प्रति प्रतिबद्ध हैं, सर  के बल खड़े हो जाओ, इक्का दुक्का ही आयेंगे लेकिन उसके चक्कर में आपका कोर वोट भसक जाएगा।

दतिया और बांकीपुर एक सबक है, यदि कोई इससे सीख गया तो समझिए दऊ सीधे है।

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