संघ प्रार्थना : गीता के परिप्रेक्ष्य में’ पुस्तक का लोकार्पण सम्पन्न

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राजीव तुली

दिल्ली। सुरुचि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डॉ. मार्कंडेय आहूजा की पुस्तक ‘संघ प्रार्थना : गीता के परिप्रेक्ष्य में’ का लोकार्पण समारोह 3 अगस्त 2026 को नई दिल्ली स्थित विचार विनिमय न्यास सभागार, केशव कुंज, झंडेवाला में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह श्री (डॉ.) कृष्ण गोपाल मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे, जबकि प्रख्यात गीता मनीषी एवं जीओ गीता के संस्थापक स्वामी श्री ज्ञानानन्द महाराज ने अपना आशीर्वचन प्रदान किया।

कार्यक्रम की शुरुआत में सुरुचि प्रकाशन के प्रबंध निदेशक रजनीश जिंदल ने सभी अतिथियों का स्वागत किया और सुरुचि प्रकाशन की साहित्यिक यात्रा पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि देशभर के 150 से अधिक पुस्तक-विक्रय केंद्रों और ऑनलाइन माध्यमों के द्वारा विभिन्न विषयों पर आधारित 600 से अधिक शीर्षक पाठकों के लिए उपलब्ध हैं।

इस अवसर पर पुस्तक के लेखक डॉ. मार्कंडेय आहूजा ने पुस्तक की रचना-प्रक्रिया और उसके मूल उद्देश्य पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संघ प्रार्थना केवल कुछ शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि वह भारतीय जीवन-दृष्टि, राष्ट्रचेतना, कर्तव्यबोध और आध्यात्मिक मूल्यों का सजीव घोष है। उन्होंने यह भी बताया कि पुस्तक में भगवद्गीता के आलोक में संघ प्रार्थना के विविध आयामों का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।

अपने उद्बोधन में डॉ. कृष्ण गोपाल ने भारतीय चिंतन की परंपरा, गीता के सार्वकालिक संदेश और राष्ट्रजीवन में प्रार्थना के महत्त्व पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि गीता ने विश्व के सामने एक नवीन प्रकार का दर्शन प्रस्तुत किया है। गीता मनुष्य को उसके कर्तव्य का बोध कराती है। उन्होंने कहा कि लेखक ने पुस्तक की कुछ पंक्तियों के माध्यम से उस भाव को जागृत करने का प्रयास किया है, जिसकी आज आवश्यकता है। जिस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के मोह का निवारण किया था, उसी प्रकार यह पुस्तक स्वयंसेवकों के मन में कर्तव्य और राष्ट्रभाव को जागृत करने का कार्य करेगी।

स्वामी श्री ज्ञानानन्द महाराज ने उपस्थित जनों को गीता के संदेश को अपने जीवन में आत्मसात करने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि संघ की प्रार्थना का मूल भाव गीता के संदेश से ही प्रेरित है और उसका उद्देश्य मन पर पड़े अज्ञान के आवरण को दूर करना है। उन्होंने इस संदर्भ में सूर्य और बादलों का उदाहरण देते हुए कहा कि सत्य सदैव विद्यमान रहता है, आवश्यकता केवल उसके आवरण को हटाने की होती है। अपने आशीर्वचन के अंत में उन्होंने उपस्थित सभी लोगों से सामूहिक प्रार्थना कराई तथा लेखक और प्रकाशक को शुभकामनाएँ दीं।

कार्यक्रम के अंत में सुरुचि प्रकाशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अंकुर पाठक ने सभी अतिथियों और उपस्थित जनों के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर सुरुचि प्रकाशन के अध्यक्ष राजीव तुली, न्यासी मनमोहन सिंह, सुमित मालूजा और राहुल सिंह सहित शिक्षा, साहित्य, अध्यात्म तथा सामाजिक जीवन से जुड़े अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। अतिथियों ने पुस्तक की विषयवस्तु की सराहना करते हुए इसे भारतीय चिंतन को समझने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कृति बताया।

कार्यक्रम का संचालन संपूर्ण बागड़ी ने किया तथा वन्दे मातरम् के सामूहिक गायन के साथ समारोह का समापन हुआ।

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