ब्रज का स्वाद अब भी दुनिया का दिल जीत रहा है!

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मथुरा । मुगल बादशाह जहांगीर ने चाँदी की कटोरी में रखी ठंडी खीर का एक चम्मच उठाया। फिर गरमागरम गुलाब जामुन का छोटा-सा टुकड़ा उसमें डुबोया। एक कौर लिया और मुस्कुरा उठे। कहते हैं, शाही रसोइयों की यही सबसे बड़ी दाद थी।

कहते हैं, ताजमहल बन रहा था। शाहजहां ने चाशनी में पके पेठे का स्वाद चखा और ऐसे मुरीद हुए कि आगरा का पेठा हमेशा के लिए शाही पहचान बन गया। खासतौर पर पंछी!

इतिहास इन किस्सों की तस्दीक करे या न करे, लेकिन इतना तय है कि आगरा की मिठाइयों का रिश्ता सिर्फ़ स्वाद से नहीं, तहज़ीब, विरासत और जज़्बात से भी रहा है।

आज वही मिठास एक नए इम्तिहान से गुज़र रही है। एक तरफ़ बदलती जीवनशैली, चॉकलेट और बेकरी उत्पादों की बढ़ती घुसपैठ है। दूसरी तरफ़ सरकारी नियम, लगातार निरीक्षण और काग़ज़ी अनुपालन का बोझ।

फिर भी आगरा, मथुरा, वृंदावन और हाथरस के हलवाई हार मानने को तैयार नहीं हैं। वे परंपरा को बचाते हुए नए स्वाद गढ़ रहे हैं।
ब्रज मंडल सदियों से मिठाइयों का इलाक़ा रहा है। मथुरा और वृंदावन अपने दूध, खोए और पेड़ों, खुरचन के लिए मशहूर हैं। हाथरस की रबड़ी और सोन पपड़ी की अलग पहचान है। आगरा की पहचान देसी घी की मिठाइयों, गुलाब जामुन, बूंदी के लड्डुओं, बर्फियों और दुनिया भर में मशहूर पेठे से है। यहाँ शादी हो, जन्मदिन हो, मंदिर का भोग हो या किसी मेहमान का इस्तकबाल, या फिर मृत्यु भोज, मिठाई के बिना बात अधूरी मानी जाती है। हलवे के नाम पर सबसे ज्यादा डिमांड सीजन में गाजर का हलवा, बाकी टाइम मूंग की दाल का देशी घी वाला हलवा, की रहती है। गर्मी में रस गुल्ले, रस मलाई, सर्दी में पिस्ते की बर्फी, खूब बिकती हैं।

ख़ऊओं की नगरी मथुरा के चौबेजी कहते हैं, “ब्रज के ठाकुरजी भी मानो मिठास के सबसे बड़े रसिक हैं। कहीं बूंदी के लड्डू चढ़ते हैं, कहीं पेड़ा, कहीं माखन-मिश्री और कहीं तरह-तरह की बर्फियाँ, मोहन थाल, ठौर, मीठी मठरी, खुरमा, बालू शाही। यही धार्मिक परंपरा इस कारोबार को पीढ़ियों से सहारा देती आई है। जलेबी, इमरती, माल पुओं की तो शान निराली है। माखन का समोसा, परमल भरमा, खोए की गुजिया, रबड़ी आम नहीं चखा तो ब्रज दर्शन बेकार।”

मथुरा-वृंदावन की सबसे प्रसिद्ध और पहचान बन चुकी मिठाई मथुरा का पेड़ा है। यह खोया (मावा), चीनी और इलायची से तैयार किया जाता है। इसका हल्का दानेदार, मुलायम और मुंह में घुल जाने वाला स्वाद इसे खास बनाता है। श्रीकृष्ण भक्ति परंपरा से जुड़े इस पेड़े का मंदिरों में प्रसाद के रूप में भी विशेष महत्व है।

मथुरा के प्रसिद्ध मिठाई विक्रेताओं में बृजवासी स्वीट्स सबसे अधिक चर्चित है। इसके अलावा राधिका स्वीट्स, शंकर मिठाई वाला और श्रीजी पेड़ा भंडार भी अपनी गुणवत्ता के लिए जाने जाते हैं।

पोद्दारजी बताते हैं, “मथुरा की अन्य लोकप्रिय मिठाइयों में खुरचन, रबड़ी और मालपुआ प्रमुख हैं। खुरचन गाढ़े दूध की परतों से बनाई जाने वाली अनोखी मिठाई है, जबकि रबड़ी और मालपुआ का स्वाद एक-दूसरे के साथ और भी लाजवाब लगता है।

इसके अलावा बूंदी लड्डू, बेसन लड्डू, मेवा लड्डू, विभिन्न प्रकार की बर्फियां, जलेबी, बालूशाही, रेवड़ी और गजक भी यहां खूब पसंद की जाती हैं। ब्रज की मिठाइयों में दूध, मावा और घी का भरपूर उपयोग होता है, जो भगवान श्रीकृष्ण की गोपाल संस्कृति और ब्रज की समृद्ध दुग्ध परंपरा का प्रतीक है।”

अगले माह सावन की आहट के साथ घेवर का मौसम शुरू होने वाला है। लेकिन इस बार सिर्फ़ पारंपरिक घेवर नहीं, बल्कि केसर, चॉकलेट, ब्लूबेरी, पान, ड्राई फ्रूट और फ्यूज़न फ्लेवर वाले घेवर भी बाज़ार में उतर रहे हैं। यही नहीं, आगरा के पुराने हलवाई काजू अनारकली, पान पेठा, चॉकलेट पेठा, ड्राई फ्रूट बर्फी और कई नई प्रयोगधर्मी मिठाइयाँ तैयार कर रहे हैं।

करीब तीन सौ साल पुराने भगत हलवाई जैसे प्रतिष्ठानों ने साबित किया है कि परंपरा का मतलब ठहर जाना नहीं होता। पुराने स्वाद को बचाते हुए नई पीढ़ी की पसंद के हिसाब से मिठाइयों में नए रंग, नए आकार और नए फ्लेवर जोड़े जा सकते हैं। गोपाल दास, ब्रज भोग, जीएमबी, डबल हाथरस, मोर मुकुट, सत्तो , देवीराम, हीरालाल और कई अन्य प्रतिष्ठान भी इसी राह पर आगे बढ़ रहे हैं। यह फ्यूज़न सिर्फ़ फैशन नहीं, बल्कि बदलते बाज़ार की ज़रूरत बन चुका है।

मगर तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। आगरा और मथुरा का अधिकांश मिठाई उद्योग आज भी असंगठित है। हज़ारों छोटी दुकानों और पारिवारिक कारोबारों पर इसकी नींव टिकी है। पिछले कुछ वर्षों में मशीनें आई हैं, पैकेजिंग सुधरी है और सफ़ाई के मानकों पर भी काम हुआ है। फिर भी अधिकतर काम आज भी हाथों से होता है। यही इसकी पहचान भी है और चुनौती भी।

खाद्य सुरक्षा के लिए निरीक्षण और निगरानी ज़रूरी हैं। मिलावट करने वालों पर सख़्त कार्रवाई भी होनी चाहिए। लेकिन ईमानदार हलवाइयों का कहना है कि कई बार अलग-अलग विभागों की लगातार छापेमारी, नोटिस और काग़ज़ी औपचारिकताएँ कारोबार पर बेवजह का दबाव बना देती हैं। उनका तर्क है कि सरकार का ध्यान उद्योग को बेहतर बनाने पर होना चाहिए, न कि सिर्फ़ दंडात्मक कार्रवाई पर।

एक नई चिंता मिठाइयों पर स्वास्थ्य संबंधी चेतावनी छापने की संभावित योजना को लेकर भी है। मधुमेह के बढ़ते मामलों के कारण चीनी की मात्रा पर सख़्त नियम बनाने की चर्चा चल रही है। कुछ हलवाई इसे ज़रूरी बहस मानते हैं, लेकिन कई का कहना है कि भारतीय भोजन की परंपरा में थोड़ा-सा मीठा हमेशा से शामिल रहा है। उनके अनुसार स्थानीय दूध, घी, गुड़ और सूखे मेवों से बनी पारंपरिक मिठाइयों की तुलना चॉकलेट, मफ़िन या अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों से नहीं की जानी चाहिए।

हलवाई यह आरोप भी लगाते हैं कि बड़े चॉकलेट और कन्फेक्शनरी ब्रांड भारतीय मिठाइयों को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि उनके उत्पादों की बिक्री बढ़े। इस दावे का स्वतंत्र प्रमाण भले न हो, लेकिन इतना सच है कि बदलती उपभोक्ता आदतों ने पारंपरिक मिठाई कारोबार पर दबाव ज़रूर बढ़ाया है।

फिर भी उम्मीद की वजहें कम नहीं हैं। आगरा आने वाला शायद ही कोई पर्यटक पेठा खरीदे बिना लौटता हो। मथुरा का पेड़ा आज भी श्रद्धा और स्वाद, दोनों का प्रतीक है। ऑनलाइन ऑर्डर, आकर्षक पैकेजिंग, वैक्यूम सील तकनीक और लंबी शेल्फ लाइफ़ ने देश-विदेश तक पहुँचने के नए रास्ते खोल दिए हैं।

ज़रूरत इस बात की है कि सरकार और उद्योग एक-दूसरे के विरोधी नहीं, साझेदार बनें। सफ़ाई, गुणवत्ता और प्रशिक्षण पर निवेश हो। छोटे हलवाइयों को आधुनिक तकनीक और आसान ऋण मिले। साथ ही ब्रज की इस मीठी विरासत को भौगोलिक पहचान, पर्यटन और सांस्कृतिक धरोहर से भी जोड़ा जाए।

आगरा की मिठाइयाँ केवल चीनी और घी का मेल नहीं हैं। इनमें इतिहास की खुशबू है, ब्रज की भक्ति है, मुग़ल रसोई की झलक है और हर भारतीय त्योहार की रौनक बसती है। अगर इस विरासत को समझदारी से सँभाला गया, तो इसकी मिठास आने वाली पीढ़ियों की ज़ुबान पर भी उसी तरह घुलती रहेगी, जैसे कभी बादशाहों की खीर में डूबा एक गुलाब जामुन।

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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