क्या वेलफेयर की मिठास ने भारत के जनआंदोलनों की आग ठंडी कर दी है?

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ग़ाज़ियाबाद । कभी भारत में आंदोलन खड़ा करना सोडा वाटर की बोतल खोलने जैसा था। ढक्कन खुला नहीं कि झाग आसमान छूने लगता था। एक नारा लगता था और हजारों लोग सड़कों पर उतर आते थे। छात्र, किसान, मजदूर, कर्मचारी। हर तरफ उबाल था। सत्ता की पेशानी पर पसीना आ जाता था।

आज भी गुस्सा है। शिकायतें भी हैं। महंगाई है। बेरोजगारी है। किसानों की परेशानियां हैं। लेकिन फिर भी पूरे देश को हिला देने वाले जनआंदोलन पहले जैसे क्यों नहीं दिखाई देते?

क्या जनता बदल गई है? या राजनीति का मिज़ाज बदल गया है? या फिर सरकार ने नाराजगी की आग पर वेलफेयर का पानी डाल दिया है?

यही सवाल आज की भारतीय राजनीति की सबसे दिलचस्प पहेली है।

इतिहास कहता है कि क्रांतियां सिर्फ भूख से नहीं होतीं। वे टूटती उम्मीदों से जन्म लेती हैं। फ्रांसीसी चिंतक एलेक्सिस डी टॉकविल ने बहुत पहले कहा था कि सबसे बड़ा विस्फोट तब होता है, जब लोगों की उम्मीदें तेजी से बढ़ें, लेकिन व्यवस्था उनका साथ न दे। जेम्स सी. डेविस और सैमुअल पी. हंटिंगटन ने भी इसी सोच को आगे बढ़ाया।

भारत का स्वतंत्रता संग्राम हो, सत्तर के दशक का जेपी आंदोलन हो, गुजरात का नव निर्माण आंदोलन हो, रेलवे की ऐतिहासिक हड़ताल हो या 2011 का अन्ना आंदोलन, इन सबकी जड़ में गहरा मोहभंग था। लोगों को लगने लगा था कि सत्ता सुन नहीं रही। जब उम्मीद दम तोड़ देती है, तब इंकलाब जन्म लेता है।

लेकिन 2014 के बाद कहानी का रुख बदलता दिखाई देता है।

सरकार ने विकास के साथ कल्याणकारी योजनाओं का ऐसा ताना-बाना बुना, जिसे कुछ अर्थशास्त्री “सॉफ्ट कैपिटलिज्म” कहते हैं। यानी बाजार भी चले और गरीब का चूल्हा भी जले।

जनधन खाते खुले। आधार जुड़ा। मोबाइल हाथ में आया। डीबीटी के जरिए पैसा सीधे बैंक खातों में पहुंचने लगा। उज्ज्वला का गैस सिलेंडर मिला। पीएम किसान की मदद आई। मुफ्त राशन, पेंशन, छात्रवृत्ति और दूसरी योजनाओं का लाभ सीधे लोगों तक पहुंचने लगा। बिचौलियों की दुकान धीरे-धीरे सिमटने लगी।

यह बदलाव केवल जेब में नहीं, दिमाग में भी हुआ।
जिस गरीब ने पहली बार बैंक में अपना नाम देखा, जिसके घर बिजली आई, नल से पानी आया, राशन की चिंता घटी या इलाज का भरोसा मिला, उसके भीतर व्यवस्था के प्रति पूरी मायूसी की जगह एक उम्मीद ने जन्म लिया।

क्रांतियां उम्मीद से नहीं, निराशा से पैदा होती हैं।
यही शायद सबसे बड़ा बदलाव है।
पिछले एक दशक में करोड़ों लोग औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जुड़े। गांवों तक सड़कें पहुंचीं। डिजिटल भुगतान ने रेहड़ी वाले तक को क्यूआर कोड पकड़ा दिया। मोबाइल इंटरनेट ने गांव और शहर के बीच की कई दीवारें गिरा दीं। स्टार्टअप और स्वरोजगार ने युवाओं के सामने नए सपने रख दिए।

अब लोगों की बातचीत भी बदल गई है।
पहले सवाल होता था, “सरकार कब जाएगी?”
अब सवाल है, “बेटे को नौकरी कब मिलेगी?” “बेटी की पढ़ाई कैसे पूरी होगी?” “अपना घर कब बनेगा?” “दुकान कैसे बढ़ेगी?”
यानी सामूहिक गुस्से की जगह निजी उम्मीदों ने ले ली।

लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि भारत में विरोध खत्म हो गया है।
किसान आंदोलन ने दिखा दिया कि जब मुद्दा गहरा हो, तो लाखों लोग आज भी एकजुट हो सकते हैं। नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन हुए। कई राज्यों में स्थानीय आंदोलनों ने सरकारों को मुश्किल में डाला। लोकतंत्र में असहमति अब भी जिंदा है।

फिर भी एक फर्क साफ दिखाई देता है। आज के आंदोलन अक्सर किसी खास मुद्दे या इलाके तक सीमित रह जाते हैं। वे पूरे देश में वैसी आग नहीं लगा पाते, जैसी पहले लगती थी।
इसके पीछे सिर्फ वेलफेयर योजनाएं ही जिम्मेदार नहीं हैं। मजबूत सरकारी तंत्र, सोशल मीडिया पर बिखरती बहस, कमजोर विपक्ष, बदलती चुनावी राजनीति और युवाओं की नई महत्वाकांक्षाएं भी इस बदलाव की अहम वजह हैं।

सच यह है कि समाज बदल रहा है।
जिस नागरिक के पास बैंक खाता, गैस कनेक्शन, राशन की गारंटी, स्वास्थ्य बीमा और डिजिटल पहचान है, वह व्यवस्था को आग लगाने से पहले दस बार सोचता है। वह क्रांति से ज्यादा सुधार चाहता है। उसे सड़क पर संघर्ष से ज्यादा अपने बच्चों का भविष्य दिखाई देता है।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
बेरोजगारी आज भी बड़ा सवाल है। आय की खाई अब भी चौड़ी है। किसान और युवा अब भी परेशान हैं। अगर उम्मीदें टूटने लगीं, अवसर सिकुड़ गए और विकास की रफ्तार थम गई, तो वही दबा हुआ लावा फिर बाहर भी आ सकता है। इतिहास यही सिखाता है।

इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत में जनआंदोलनों का दौर खत्म हो गया है। इतना जरूर कहा जा सकता है कि उनकी शक्ल बदल गई है। राजनीति का तापमान बदल गया है। विरोध की भाषा बदल गई है।

सोडा वाटर की बोतल अब भी बंद है। उसके भीतर दबाव भी है। फर्क सिर्फ इतना है कि ढक्कन अब पहले जितनी आसानी से नहीं खुलता।

भविष्य किस करवट बैठेगा, यह आने वाला वक्त बताएगा। लेकिन फिलहाल इतना साफ दिखता है कि जिस समाज के पास उम्मीदें बची हों, वह हर सुबह क्रांति का बिगुल नहीं बजाता। वह अपने बच्चों के लिए बेहतर कल बनाने निकल पड़ता है।

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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