
परंतु विरोध का तरीका भी सभ्य होना चाहिए। हाल के प्रदर्शन में ढेर सारे अश्लील पोस्टर देखकर निराशा होती है। अश्लीलता और असभ्यता न तो विरोध को मजबूत बनाती है और न ही समाज को। ऐसे पोस्टर प्रदर्शन के उद्देश्य को कमजोर करते हैं, जनसमर्थन घटाते हैं और मुद्दे को हाशिए पर धकेल देते हैं। युवा ऊर्जा को रचनात्मक दिशा में लगाना चाहिए—तर्कपूर्ण नारे, सभ्य प्लेकार्ड और शांतिपूर्ण तरीकों से।

लोकतंत्र में असहमति का स्वागत है, अश्लीलता का नहीं। विरोध सभ्य रहे तो उसकी ताकत बढ़ती है। युवाओं से अपेक्षा है कि वे अपने आक्रोश को गरिमा के साथ व्यक्त करें, ताकि उनका संदेश समाज तक सही रूप में पहुंचे और बदलाव की दिशा मजबूत हो।



