जो चरस बोई थी, उसमें अब फल आ गया है

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कायनात काजी

दिल्ली। करीब 20–25 साल पहले जब देश में FDI (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) को लेकर बहस चल रही थी, तब अनेक विद्वानों और विचारकों ने आशंका जताई थी कि विदेशी निवेश केवल पूंजी ही नहीं लाएगा, बल्कि अपने साथ जीवनशैली, सांस्कृतिक प्रभाव और मूल्य भी लेकर आएगा। उनका कहना था कि आर्थिक विकास के साथ-साथ हमारी सांस्कृतिक पहचान पर भी इसका असर पड़ेगा।

यह भी सच है कि FDI और उदारीकरण के बाद देश ने अभूतपूर्व आर्थिक प्रगति की। बड़े शहर विकसित हुए, आईटी सेक्टर का विस्तार हुआ, रोजगार के अवसर बढ़े और भारत विकासशील देशों की अग्रिम पंक्ति में खड़ा हो गया। लेकिन विकास की इस दौड़ में हमने यह देखने की कोशिश कम की कि हमारी नई पीढ़ी किस प्रकार के सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण में तैयार हो रही है।


शिक्षा का तेजी से निजीकरण हुआ। विदेशी निवेश और पश्चिमी प्रभावों से संचालित अनेक संस्थान खड़े हुए। अंग्रेज़ी शिक्षा, आधुनिकता और वैश्विक अवसरों के आकर्षण में हमने यह मान लिया कि यही प्रगति का एकमात्र रास्ता है। लेकिन इसी के साथ अनुशासन, मर्यादा और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे प्रश्न धीरे-धीरे पीछे छूटते गए।

हमारे गांव में एक कहानी सुनाई जाती थी। एक महिला ने अपनी पड़ोसन से बदला लेने के लिए अपने बच्चों को गालियां देना सिखाया। उसका विश्वास था कि बड़े होकर वे पड़ोसन को अपमानित करेंगे। लेकिन जब बच्चे बड़े हुए तो वे यह भेद ही भूल गए कि गालियां किसे देनी हैं। परिणाम यह हुआ कि वही भाषा उनके अपने घर और परिवार तक पहुंच गई।

आज कभी-कभी लगता है कि हम भी उसी स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन क्या उसकी कोई मर्यादा नहीं होनी चाहिए? असहमति का अधिकार है, लेकिन क्या भाषा और व्यवहार की गरिमा भी उतनी ही महत्वपूर्ण नहीं है?

महिलाओं और पुरुषों के बीच अवसरों का अंतर कम होना एक सकारात्मक बदलाव है। महिलाओं ने संघर्ष, योग्यता और परिश्रम के बल पर अपनी जगह बनाई है। लेकिन सशक्तिकरण का अर्थ केवल बंधनों को तोड़ना नहीं, बल्कि अपनी गरिमा और आत्मसम्मान को बनाए रखते हुए आगे बढ़ना भी है।

भारत आज अपनी संस्कृति और सभ्यता के बल पर विश्व में ‘सॉफ्ट पावर’ बनने का दावा करता है। ऐसे में जब सार्वजनिक जीवन में भाषा, व्यवहार और सांस्कृतिक संवेदनशीलता का स्तर गिरता दिखाई देता है, तो मन में प्रश्न उठता है कि क्या केवल आर्थिक विकास ही पर्याप्त है?

विकास आवश्यक है, लेकिन विकास के साथ विवेक, मर्यादा और सांस्कृतिक चेतना भी उतनी ही आवश्यक है। अन्यथा हम समृद्ध तो हो जाएंगे, परंतु अपने होने का अर्थ खो बैठेंगे।

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