क्यों बिकता है प्यार और सेक्स का बुखार

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रात के दो बजे हैं।
दुनिया के तमाम शहर सो रहे हैं । सड़कें खाली हैं। लेकिन करोड़ों उंगलियां अब भी मोबाइल स्क्रीन पर फिसल रही हैं। कोई डेटिंग ऐप पर प्रेम खोज रहा है। कोई अश्लील सामग्री देख रहा है। कोई सोशल मीडिया पर अपनी खूबसूरती को “लाइक्स” में बदल रहा है। और कोई अकेलेपन, आकर्षण और इच्छाओं के बीच झूल रहा है।
तो क्या दुनिया को सचमुच सेक्स का बुखार चढ़ गया है?
आज सेक्स हर जगह दिखाई देता है। फिल्मों में, विज्ञापनों में, वेब सीरीज में, गीतों में, फैशन में और सोशल मीडिया में। देह एक उत्पाद बन गई है। आकर्षण एक पूंजी बन गया है। और इच्छा एक बाजार। किसी को सेक्सी बोलो तो खुशी होती है।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या इंसान पहले से ज्यादा कामुक हो गया है, या फिर सेक्स केवल पहले से ज्यादा दिखाई देने लगा है?
सच शायद दोनों के बीच कहीं छिपा है।
सेक्स केवल शारीरिक संबंध नहीं है। यह जीवन की निरंतरता का आधार है। प्रकृति ने इसे प्रजनन के लिए बनाया था। लेकिन इंसान ने इसे प्रेम, आनंद, शक्ति, पहचान, कला, मनोरंजन और व्यापार से जोड़ दिया। आज सेक्स एक बहु-अरब डॉलर का वैश्विक उद्योग है। यह मनोरंजन का साधन भी है और कई लोगों के लिए सामाजिक प्रतिष्ठा तथा व्यक्तिगत उपलब्धि का प्रतीक भी।
लेकिन क्या यह हमेशा ऐसा ही था?
इतिहास बताता है कि सेक्स के प्रति मानव समाज का नजरिया समय के साथ बदलता रहा है। प्राचीन यूनान और रोम में प्रेम, सौंदर्य और कामुकता कला और साहित्य के महत्वपूर्ण विषय थे। मूर्तियों, चित्रों और कविताओं में इसका खुला चित्रण मिलता है। तब इसे जीवन का स्वाभाविक हिस्सा माना जाता था।
फिर समय बदला।
यूरोप में ईसाई धार्मिक प्रभाव बढ़ने के साथ सेक्स को मुख्य रूप से विवाह और संतानोत्पत्ति तक सीमित करने की कोशिश हुई। मध्यकाल और बाद के विक्टोरियन युग में नैतिकता के नाम पर इच्छाओं पर नियंत्रण बढ़ा। विशेष रूप से महिलाओं की कामनाओं को संदेह और पाप की दृष्टि से देखा गया।
कुछ धर्मों, सभ्यताओं में सेक्स को पाप के रूप में देखा गया, लेकिन, भारत की कहानी कुछ अलग है।
करीब दो हजार वर्ष पहले रचित कामसूत्र आज भी दुनिया के सबसे चर्चित ग्रंथों में गिना जाता है। लेकिन यह केवल यौन मुद्राओं की किताब नहीं थी, जैसा कि आम धारणा बना दी गई है। इसके रचयिता वात्स्यायन ने इसे जीवन जीने की कला के रूप में प्रस्तुत किया था। इसमें प्रेम, आकर्षण, संवाद, सामाजिक व्यवहार, सौंदर्यबोध, विवाह और भावनात्मक संतुलन तक की चर्चा मिलती है।
सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि कामसूत्र स्त्री की इच्छा और उसके सुख को भी महत्व देता है। उस दौर के अनेक समाजों की तुलना में यह दृष्टिकोण कहीं अधिक प्रगतिशील माना जा सकता है।
फिर ऐसा क्या हुआ कि आज दुनिया में सेक्स को लेकर इतनी खुली चर्चा दिखाई देती है?
पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं कि इसका सबसे बड़ा कारण 1960 के दशक की यौन क्रांति थी। गर्भनिरोधक गोलियों के व्यापक उपयोग ने पहली बार करोड़ों लोगों को गर्भधारण के भय से काफी हद तक मुक्त कर दिया। सेक्स और प्रजनन के बीच का पारंपरिक संबंध कमजोर पड़ने लगा।
यहीं से समाज में बड़ा बदलाव शुरू हुआ।
लोगों ने विवाह पूर्व संबंधों को अधिक स्वीकार करना शुरू किया। शादी की उम्र बढ़ी। शिक्षा और करियर प्राथमिकता बने। इंटरनेट ने सांस्कृतिक सीमाओं को ध्वस्त कर दिया। पोर्नोग्राफी, डेटिंग ऐप्स और सोशल मीडिया ने यौन अभिव्यक्ति को अभूतपूर्व दृश्यता प्रदान की।
आज का युवा उस दुनिया में बड़ा हो रहा है जहां सेक्स हर जगह मौजूद है।
लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है।
कई अध्ययनों से संकेत मिलता है कि कुछ देशों में किशोरों और युवाओं के बीच वास्तविक यौन गतिविधियों में कमी आई है। यौन रोगों, सहमति, व्यक्तिगत सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता ने व्यवहार को प्रभावित किया है। यानी सेक्स की चर्चा और दृश्यता बढ़ी है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर व्यक्ति पहले से अधिक यौन सक्रिय है।
सोशल एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर का मानना है कि अत्यधिक व्यावसायीकरण ने सेक्स को एक उत्पाद में बदल दिया है। सोशल मीडिया की तुलना संस्कृति, अवास्तविक अपेक्षाएं और पोर्नोग्राफी की लत रिश्तों को कमजोर कर सकती है। कई युवा प्रदर्शन के दबाव, शरीर की छवि और आत्मविश्वास की कमी से भी जूझ रहे हैं।
दूसरी ओर, डॉ. विजयधूत का तर्क है कि खुलापन लोगों को शर्म और अपराधबोध से मुक्त करता है। सहमति, लैंगिक समानता और विविध यौन पहचानों को स्वीकार करना आधुनिक समाज की महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं। उनके अनुसार चुप्पी से अधिक नुकसान होता है, जबकि स्वस्थ संवाद समझ पैदा करता है।
यहीं आधुनिक पश्चिमी सोच और भारतीय कामसूत्र दर्शन के बीच एक दिलचस्प अंतर दिखाई देता है।
समाजशास्त्री टी.पी. श्रीवास्तव के अनुसार आधुनिक पश्चिमी दृष्टिकोण अक्सर व्यक्तिगत स्वतंत्रता और व्यक्तिगत संतुष्टि पर जोर देता है। व्यक्ति की इच्छा सर्वोपरि मानी जाती है। इसके विपरीत कामसूत्र आनंद को जीवन के व्यापक संतुलन का हिस्सा मानता है। वहां सुख है, लेकिन जिम्मेदारी भी है। आकर्षण है, लेकिन भावनात्मक जुड़ाव भी है। इच्छा है, लेकिन उसके साथ संयम और संतुलन भी है।
शायद यही कारण है कि अनेक विद्वान मानते हैं कि भारत की प्राचीन सोच आज भी प्रासंगिक हो सकती है।
सामाजिक कार्यकर्ता विद्या जी कहती हैं कि इंसान की जैविक प्रकृति हजारों वर्षों में बहुत नहीं बदली है। बदला है उसका परिवेश। तकनीक ने इच्छाओं तक पहुंच आसान कर दी है। गर्भनिरोधकों ने पुराने भय कम कर दिए हैं। इंटरनेट ने कल्पनाओं को वैश्विक बना दिया है।
लेकिन एक सवाल आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना सदियों पहले था।
क्या सेक्स केवल मनोरंजन है, या उससे कहीं अधिक?
इतिहास, संस्कृति और मानवीय अनुभव बताते हैं कि यह केवल शरीर का मामला नहीं है। इसमें भावनाएं हैं। रिश्ते हैं। जिम्मेदारियां हैं। संवेदनाएं हैं। जीवन की निरंतरता है। कुछ दार्शनिक और आध्यात्मिक परंपराएं तो इसे आत्मिक ऊर्जा का स्रोत भी मानती हैं।
अब तो जमाना प्राकृतिक सेक्स से काफी आगे निकल चुका है, एनिमल सेक्स से लेकर, LGBTQ और न जाने क्या क्या तक!!
शायद आधुनिक दुनिया की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह स्वतंत्रता और संतुलन के बीच रास्ता खोजे। आनंद और जिम्मेदारी के बीच पुल बनाए। बाजार और मानवीय संवेदना के बीच सामंजस्य स्थापित करे।
क्योंकि सेक्स जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन जब वह केवल उपभोग की वस्तु बन जाता है, तो उसकी मानवीय गहराई कहीं खोने लगती है।
और शायद यही बहस आने वाले वर्षों में और तेज होने वाली है।
आखिर सवाल सेक्स का नहीं है।
सवाल यह है कि हम इंसान होने का अर्थ किस तरह समझते हैं।

म्यांमार: सू सी समेत सभी राजनीतिक बंदियों की रिहाई की मांग तेज

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नव ठाकुरीया
गुवाहाटी । जब म्यांमार की हिरासत में बंद लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू सी ने 19 जून 2026 को अपना 81वां जन्मदिन मनाया, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी और दक्षिण-पूर्व एशियाई देश की विभिन्न जेलों में बंद हजारों अन्य राजनीतिक कैदियों की तुरंत रिहाई की मांग उठी। संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों, सांसदों, मानवाधिकार संगठनों, राजनयिकों, लोकतंत्र कार्यकर्ताओं और देश के अंदर व बाहर रहने वाले म्यांमार के नागरिकों ने इस दिन को उनकी सेहत और गरीबी से जूझ रहे देश में चल रहे सामाजिक-राजनीतिक संकट पर गंभीर चिंता व्यक्त करने के अवसर के रूप में मनाया।
वैश्विक स्तर पर लोगों ने नागरिकों के खिलाफ हिंसा कम करने और संकट को हल करने के लिए समावेशी राजनीतिक बातचीत का समर्थन करने पर जोर दिया। लगभग 5.5 करोड़ की आबादी वाला यह बौद्ध-बहुल देश पांच साल पहले हुए सैन्य तख्तापलट के बाद से ही संकट का सामना कर रहा है। जब इस महान महिला ने म्यांमार की नई राजधानी नेपीडॉ में किसी अज्ञात स्थान पर यह खास दिन मनाया, तो जुंटा-विरोधी कार्यकर्ताओं ने प्रतीकात्मक सभाओं और एकजुटता के संदेशों के साथ इस दिन को मनाया। उन्होंने दोहराया कि नोबेल शांति पुरस्कार विजेता सू सी म्यांमार में लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का एक सशक्त प्रतीक बनी हुई हैं। म्यांमार में आखिरी सैन्य तख्तापलट 1 फरवरी 2021 को हुआ था, जिसे तत्कालीन शीर्ष सैन्य कमांडर (जो बाद में नागरिक प्रमुख बने) ने अंजाम दिया था।
यह सामूहिक अपील आसियान (Association of Southeast Asian Nations) सदस्य देशों के सांसदों के एक मंच से आई, जिसमें सू की और सभी राजनीतिक कैदियों की तुरंत रिहाई की मांग की गई। ‘आसियान पार्लियामेंटेरियंस फॉर ह्यूमन राइट्स’ (APHR) को ऑस्ट्रेलिया, कंबोडिया, इंडोनेशिया, इटली, मलेशिया, सिंगापुर, दक्षिण अफ्रीका, थाईलैंड, तिमोर-लेस्ते और फिलीपींस के 134 मौजूदा और पूर्व सांसदों का समर्थन प्राप्त है। उन्होंने उनकी सेहत और भलाई की जांच के लिए स्वतंत्र पहुंच की भी मांग की।
आसियान 2026 के अध्यक्ष फर्डिनेंड मार्कोस जूनियर (फिलीपींस के राष्ट्रपति) और इसके सदस्य देशों को लिखे एक खुले पत्र में उन्होंने तर्क दिया कि शांति, स्थिरता और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के लिए प्रतिबद्ध एक क्षेत्रीय निकाय के रूप में दक्षिण-पूर्व एशियाई मंच की विश्वसनीयता तब और मजबूत होगी, जब वह अपने एक सदस्य देश (म्यांमार) के सामने आए लगातार संकट को हल करने के लिए व्यावहारिक प्रयास करेगा।
सैन्य नेता मिन आंग ह्लाइंग (जो अब देश के राष्ट्रपति हैं) की अगुवाई में हुए तख्तापलट के बाद से, लोकतंत्र के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों समेत कम से कम 7,800 लोग मारे जा चुके हैं। राजनीतिक कारणों से 31,100 से ज़्यादा लोगों को गिरफ़्तार किया गया, जिनमें से 22,000 से ज़्यादा लोग अभी भी हिरासत में हैं। लाखों लोग बेघर हो गए हैं और वे कामचलाऊ कैंपों में घोर गरीबी और अनिश्चितता के बीच रह रहे हैं। इस पत्र में हिरासत केंद्रों में टॉर्चर, दुर्व्यवहार, इलाज की कमी और अन्य तरह की बदसलूकी की लगातार आ रही खबरों की ओर भी ध्यान दिलाया गया। इसमें कहा गया है कि राजनीतिक विरोधियों को लगातार जेल में रखना तख्तापलट के बाद के दौर की एक मुख्य पहचान बन गई है।
अंतर्राष्ट्रीय चिंता का मुख्य विषय सू सी की सेहत को लेकर बनी अनिश्चितता है। तख्तापलट के दिन से ही हिरासत में रखी गईं सू की ने अपना ज़्यादातर समय बाहरी दुनिया से कटे हुए बिताया है। अप्रैल 2026 में ऐसी खबरें आईं कि उन्हें जेल से हटाकर राजधानी में कहीं नज़रबंद (हाउस अरेस्ट) कर दिया गया है। न तो उनके परिवार के सदस्यों और कानूनी प्रतिनिधियों को, और न ही किसी स्वतंत्र पर्यवेक्षक को इन दावों की पुष्टि करने के लिए उनसे मिलने की इजाज़त दी गई है। स्वतंत्र पुष्टि न होने के कारण उनके जीवित होने के सबूत की मांग ज़ोर पकड़ रही है। सांसदों ने आखिरकार उनकी सेहत के बारे में भरोसेमंद जानकारी और उन्हें ज़रूरी इलाज मिलने की मांग पर ज़ोर दिया।
सू सी के बेटे किम एरिस (जो एक ब्रिटिश नागरिक) द्वारा शुरू किए गए एक अभियान से इस मुद्दे को और ज़्यादा अहमियत मिली है। उन्होंने सरकारों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से अपील की है कि वे इस बात की पुष्टि करें कि उनकी माँ जीवित हैं और उन्हें सही इलाज मिल रहा है। एरिस ने बताया कि तख्तापलट के बाद से उनकी माँ ने हिरासत में ही अपना छठा जन्मदिन मनाया है और उन्होंने उनकी सही जगह और सेहत की ताज़ा स्थिति के बारे में पारदर्शिता की मांग की। उन्होंने तर्क दिया कि परिवार के सदस्यों और कानूनी सलाहकारों से सू सी की लंबी दूरी ने उनकी ज़िंदगी को लेकर चिंताएँ बढ़ा दी हैं। उनका यह भी मानना है कि उनकी अमानवीय हिरासत म्यांमार के राजनीतिक संकट की अनसुलझी स्थिति को दर्शाती है, जहाँ हज़ारों लोग अभी भी पीड़ित हैं, लेकिन अपनी ज़मीन पर समानता, न्याय और आज़ादी पर आधारित लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को बनाए हुए हैं।
‘असिस्टेंस एसोसिएशन फॉर पॉलिटिकल प्रिज़नर्स’ (AAPP) ने भी इन चिंताओं को दोहराते हुए सू सी और सभी राजनीतिक बंदियों की बिना शर्त और तुरंत रिहाई की मांग की। AAPP ने बताया कि 1980 के दशक के आखिर में म्यांमार की राजनीति में आने के बाद से उन्होंने लगभग दो दशक जेल या नज़रबंदी में बिताए हैं, जिससे वह दुनिया की सबसे लंबे समय तक हिरासत में रखी गई राजनीतिक नेताओं में से एक बन गई हैं। एसोसिएशन ने ASEAN सदस्य देशों और संयुक्त राष्ट्र से अपील की कि वे राजनीतिक कारणों से हिरासत में लिए गए सभी कैदियों की रिहाई के लिए प्रयास तेज़ करें।
हाल ही में, म्यांमार के लिए संयुक्त राष्ट्र की विशेष दूत Julie Bishop ने भी सू सी की रिहाई की मांग की और कहा कि म्यांमार के अधिकारियों के सामने यह मुद्दा बार-बार उठाया गया है, लेकिन कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। सुश्री बिशप ने कहा कि पूर्व स्टेट काउंसलर के बारे में कोई भी स्वतंत्र रूप से पुष्टि करने योग्य रिपोर्ट नहीं है; उनकी पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) ने नवंबर 2020 के चुनाव में निर्णायक जीत हासिल की थी, जिसके बाद सेना ने हस्तक्षेप किया था।
म्यांमार की National Unity Government (जो तख्तापलट के बाद ज़्यादातर चुने हुए NLD सांसदों ने बनाई थी), यूरोपीय संघ और ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्विट्ज़रलैंड, नॉर्वे और नीदरलैंड के दूतावासों और राजनयिक मिशनों ने भी उनकी बिना शर्त रिहाई की मांग का समर्थन किया। उन्होंने उन सभी लोगों की रिहाई के लिए भी आवाज़ उठाई जिन्हें गलत तरीके से हिरासत में लिया गया है, और म्यांमार के अधिकारियों से अपील की कि वे सू सी को स्वतंत्र मेडिकल देखभाल, परिवार के सदस्यों और कानूनी सलाहकारों से मिलने की इजाज़त दें। नेशनल यूनिटी कंसल्टेटिव काउंसिल (NUCC) ने भी इन्हीं मांगों को दोहराते हुए एक बयान जारी किया और म्यांमार के लोगों के जज़्बे की सराहना की, जो ‘गोल्डन पैगोडा की धरती’ पर संघीय लोकतंत्र की सामूहिक इच्छा के साथ क्रूर सैन्य ताकत का विरोध कर रहे हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशिया मामलों के विश्लेषक)

Demands raised for urgent release of Suu Kyi, other Myanmarese political prisoners

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Guwahati: When Daw Aung San Suu Kyi celebrated her 81st birthday under detention somewhere in the military controlled Myanmar on 19 June 2026, various global bodies raised voices for her release along with other political prisoners, languishing in different jails across the southeast Asian nation. Amid the military vigil, anti-junta residents of Myanmar also observed her birthday in various locations wishing good health to their beloved pro-democracy icon.
The lawmakers from different countries urged the Association of Southeast Asian Nations (ASEAN) and its member-states to release Suu Kyi and other political prisoners unconditionally from behind the bars. The ASEAN Parliamentarians for Human Rights (APHR), together with a group of 134 former and current Parliamentarians from 10 countries namely Australia, Cambodia, Indonesia, Italy, Malaysia, Singapore, South Africa, Thailand, Timor-Leste and the Philippines, emphasised on upholding the principles of democracy, rule of law, and adequate respect for human rights and fundamental freedoms in the country.
Addressing the ASEAN chair 2026, who happens to be President of the Philippines, Ferdinand R. Marcos Jr, the lawmakers in an open letter pointed out that an independent access to verify the condition and welling of Nobel laureate Suu Kyi, who also chairs the National League for Democracy, should be made available. They also asked to end violence against civilians, provide unhindered humanitarian access and meaningful political dialogue involving all relevant stakeholders.
“Since the military coup of 1 February 2021, the junta led by senior general Min Aung Hlaing (now emerged as the President of Myanmar) arrested more than 31,141 individuals on political grounds. According to the Assistance Association for Political Prisoners (AAPP), more than 22,000 remain in detention and reports continue to document mistreatment, abuse, torture, and denial of medical care. More than 7,800 people, including pro-democracy activists and civilians, were killed. These are verified and documented figures, where the actual numbers are likely higher,” read the open letter.
Mentionable is that Suu Kyi remains in detention since the coup day. Following reports of her transfer from prison to house arrest at an undisclosed location in Naypyidaw during April 2026, serious concerns remain regarding her condition, and the lack of independent verification. Her family and legal counsel continue severe restrictions on access, and the international community remains without credible confirmation of her current conditions. In the absence of independent verification and meaningful access, proof of life is urgently needed, it added.
Similarly, the Assistance Association for Political Prisoners (AAPP) also called for an immediate release of Suu Kyi and other political prisoners. The association revealed that Suu Kyi has spent around 20 years in detention or under house arrest since 1989 for her political participation and her commitment to democracy in Myanmar. It also called on ASEAN members, governments, United Nations mandates, and domestic actors to demand her immediate and unconditional release along with all other political prisoners. Recently her son, Kim Aris (a British citizen) launched an international campaign seeking confirmation whether Suu Kyi is alive and receiving necessary medical care.
Meanwhile, the UN special envoy for Myanmar called for her urgent release saying that the issue has been raised repeatedly with Naypyidaw in vain. There have been no independent verifiable reports regarding the former State Counsellor, who was re-elected in the November 2020 national election but condemned to a harsh and punitive detention after the military takeover, said Julie Bishop. The National Unity Government (NUG) of Myanmar also raised voices for her immediate release.
The European Union and a number of foreign embassies belonging to Australia, UK, Canada, France, Germany, Italy, Switzerland, Norway and the Netherlands, strongly demanded her release with all others unjustly detained by the military brigade. They also urged the regime to allow her access to independent medical care, family members and legal counsel. Suu Kyi’s son, Kim Aris, recently made a public statement asking for her proof of life, essential medical care and the exact location, where the octogenarian lady is serving the sentence.

भारतीय भोजन परंपरागत या पराधीनता वस?

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डॉ. रणजीत सिंह

चंडीगढ़ : आज भारत पूरी दुनिया में डायबिटीज (मधुमेह) की राजधानी बन चुका है। 101 मिलियन (10 करोड़ से ज़्यादा) भारतीयों को डायबिटीज है, और 136 मिलियन लोग ‘प्री-डायबिटिक’ हैं। यानी कुल मिलाकर 23.7 करोड़ लोग—जो कि पूरे ब्राजील देश की आबादी से भी ज़्यादा है—एक ऐसी बीमारी की राह पर खड़े हैं जो धीरे-धीरे और खामोशी से उनकी आँखों, किडनी, नसों और दिल को खोखला कर देगी।

और इस कहानी का विलेन (खलनायक) कौन है? इस पर तो सब एकमत हैं—’अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड’ यानी पैकेटबंद कबाड़, मैदा, चिप्स, कोला, इंस्टेंट नूडल्स, बर्गर-फ्राइज़ और पास्ता। देश का हर हेल्थ इन्फ्लुएंसर सुपरमार्केट के उसी एक शेल्फ की तरफ उंगली उठाकर चिल्ला रहा है कि “यही चीज़ तुम्हें मार रही है।” कुछ लोगों ने तो सिर्फ 1 मिलीग्राम माल्टोडेक्सट्रिन और थोड़े से सोडियम बेंजोएट को कोस-कोसकर अपना पूरा धंधा ही चमका लिया है।
लेकिन इस पूरी कहानी में बस एक ही पेंच है—भारतीय असल में इतना ‘अल्ट्रा-प्रोसेस्ड’ खाना खाते ही नहीं हैं। एक आम भारतीय अपनी दिनभर की कैलोरी का मुश्किल से दसवां हिस्सा (10%) इस प्रोसेस्ड फूड से लेता है। इसके उलट, एक आम अमेरिकी अपनी कैलोरी का 60% और ब्रिटिश लोग करीब 55% हिस्सा इसी कबाड़ से लेते हैं। हम लोग पश्चिमी देशों के मुकाबले इस कचरे का एक बहुत छोटा सा हिस्सा खाते हैं—यानी अमेरिकी लोगों से छह गुना कम।
अब यहाँ एक ऐसा विरोधाभास है जिस पर बात होनी चाहिए: जो देश इस प्रोसेस्ड फूड में पूरी तरह डूबे हुए हैं, उन्हें सबसे ज़्यादा बीमार होना चाहिए था। लेकिन इसकी जगह भारत—जो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे कम प्रोसेस्ड फूड खाता है—वह बाकी दुनिया के मुकाबले सबसे तेजी से डायबिटीज का शिकार हो रहा है। और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह उन लोगों को हो रहा है जिनका वजन बिल्कुल सामान्य है, जो देखने में एकदम दुबले-पतले और फिट लगते हैं। यानी, जिस संदिग्ध को सब गिरफ्तार करना चाहते हैं, उसके पास तो साफ-साफ बचने का बहाना (alibi) मौजूद है।
तो फिर अगर यह हफ्ते में एक बार खाया जाने वाला चिप्स का पैकेट नहीं है, अगर यह प्रिजर्वेटिव्स, रिफाइंड तेल और मैदा नहीं है, तो फिर असली विलेन कौन है?
मुझे बहुत खेद के साथ यह सच आपके सामने रखना पड़ रहा है: यह वही खाना है जिस पर आप सबसे ज़्यादा भरोसा करते हैं। वह खाना, जिसे कभी कोई कटघरे में खड़ा नहीं करना चाहता। वही दाल, चावल, रोटी और सब्जी—यानी आपकी माँ के हाथ का बना वह घर का खाना, जो उनकी माँ ने उन्हें सिखाया था। हम पश्चिम से आए एक विलेन को कोसने में इतने मग्न रहे कि हमने कभी अपनी ही रसोई में पक रहे उस असली कसूरवार पर नजर ही नहीं डाली।
इस मोड़ पर आपमें से कुछ लोग यकीनन चिढ़ गए होंगे। “क्या मजाक है? तुम मेरी माँ के हाथ के खाने को कसूरवार ठहरा रहे हो?” वह खाना बेहद स्वादिष्ट है, उसमें माँ का प्यार घुला है, और उसी खाने ने हमारे परिवारों को युद्ध, अकाल और भयंकर गरीबी के दौर में जिंदा रखा है। हाँ, यह सब शत-प्रतिशत सच है। लेकिन सवाल यहाँ यह नहीं है। सवाल यह है कि क्या वह पारंपरिक थाली—जैसी वह आज है—उस शरीर के लिए सही है जिसमें आप आज जी रहे हैं?
जरा एक आम भारतीय के पूरे दिन के खान-पान को देखिए—किसी ‘चीट डे’ या ऑफिस की बिरयानी-पिज्जा पार्टी की बात नहीं कर रहा, बल्कि एक आम, सादे और संस्कारी घर के खाने वाले दिन को देखिए:
*सुबह का नाश्ता:  इडली, डोसा, पोहा या दो पराठे—यानी सिर्फ कार्बोहाइड्रेट।
* दोपहर से पहले: चीनी वाली चाय और साथ में शायद एक बिस्किट—यानी सिर्फ चीनी और कार्बोहाइड्रेट।
* **दोपहर का खाना:** चावल का एक पहाड़, एक छोटी कटोरी पतली दाल या सांभर, और एक सब्जी—यानी ज्यादातर कार्बोहाइड्रेट।
* शाम की चाय: फिर से चाय और साथ में कुछ चटर-पटर।
* रात का खाना:  चावल, रोटी, दाल, सब्जी—यानी फिर से कार्बोहाइड्रेट।
अगर आप इस पूरे दिन का हिसाब जोड़ें, तो आपकी दिनभर की कैलोरी का लगभग 60 से 65% हिस्सा सिर्फ ‘रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट’ से आया है, और प्रोटीन से मिला सिर्फ 10 से 12%। और ध्यान रहे, यह आपके घर के ‘हेल्दी खाने’ का रिपोर्ट कार्ड है—इसमें कोई रेस्टोरेंट शामिल नहीं है, कोई स्विगी नहीं है, और दूर-दूर तक किसी जंक फूड का नामोनिशान नहीं है।
इस बारे में कोई बात इसलिए नहीं करता क्योंकि इस सच पर कोई अच्छा ‘कंटेंट’ नहीं बनता। आप लोगों को यह बताकर कोई कोर्स या सप्लीमेंट नहीं बेच सकते कि “समस्या उस सफेद चावल में है जो आप चार साल की उम्र से दिन में तीन बार, हर रोज खाते आ रहे हैं।” यह चावल हमारे बहुत करीब है, बहुत जाना-पहचाना है। मैदा बनाने वाली किसी अनाम कॉरपोरेशन को दोष देना बहुत आसान है, लेकिन जिस स्टील की थाली में दादी-नानी ने खाना परोसा, उस पर उंगली उठाना एक गद्दारी जैसा महसूस होता है।
लेकिन रोजमर्रा की आदतों की कहानी में कोई बड़ा ड्रामा नहीं होता। सफेद चावल का एक कटोरा आपके ब्लड शुगर को उस तरह तुरंत नहीं उछालता जैसे एक कोला की बोतल उछालती है। लेकिन आप इसे 40 साल तक दिन में दो बार खाते हैं। कोला तो कभी-कभार खरीदी जाने वाली चीज़ है, लेकिन चावल आपके शरीर का ‘ऑटो-रिन्यू होने वाला सब्सक्रिप्शन’ है। और यह समझने के लिए कि हमारी थाली इतनी असंतुलित कैसे हो गई—अनाज से इतनी भारी और प्रोटीन में इतनी हल्की कैसे हो गई—आपको भारतीय खाने के बारे में फैले सबसे बड़े और तसल्ली देने वाले झूठ को मानना बंद करना होगा: कि यह खाना ‘सदियों पुराना और सनातन’ है।
हम भारतीय थाली के बारे में ऐसे बात करते हैं जैसे यह सीधे वेदों से हुबहू उतरकर हमारे पास आई हो। सच तो यह है कि आज का शहरी भारतीय जो थाली खा रहा है—जो चावल और गेहूं से लबालब है और जिसमें दालों और प्रोटीन का नामोनिशान तक नहीं है—वह मुश्किल से दो या तीन पीढ़ी पुरानी है। इसे किसी ऋषि-मुनि ने तय नहीं किया था; इसे गढ़ा था एक अकाल झेल चुके शरीर ने, एक शोषक साम्राज्य ने और सरकार की एक प्राइस-लिस्ट ने। आइए मैं आपको वे तीन चीजें दिखाता हूँ जिन्होंने मिलकर इस थाली को बनाया।
पहला कारण, जिसे हर कोई बहुत पसंद करता है क्योंकि यह आपको पूरी तरह जिम्मेदारी से मुक्त कर देता है: हमारे जीन्स (Genetics)। 1990 के दशक में, पुणे के एक डायबिटीज रिसर्चर चित्तरंजन याज्ञनिक ने अपने एक ब्रिटिश सहकर्मी के साथ एक फोटो खिंचवाई। दोनों की लंबाई एक थी और दोनों का BMI (बॉडी मास इंडेक्स – जो डॉक्टर लंबाई और वजन के अनुपात के लिए इस्तेमाल करते हैं) भी बिल्कुल एक था। वजन के कांटे पर दोनों का नंबर एक था, लेकिन जब दोनों के शरीरों का स्कैन किया गया, तो याज्ञनिक के शरीर में उस ब्रिटिशर के मुकाबले दोगुने से भी ज़्यादा फैट (चर्बी) था।
इसे कहते हैं ‘थिन-फैट इंडियन फेनोटाइप’ (बाहर से दुबला, अंदर से मोटा)। किसी भी सामान्य वजन पर, हम भारतीयों (और पाकिस्तानियों, बांग्लादेशियों, श्रीलंकाई लोगों) के शरीर में चर्बी ज़्यादा होती है—खासकर ‘विसेरल फैट’ (वह खतरनाक चर्बी जो हमारे अंदरूनी अंगों के आसपास लिपटी होती है)—और यूरोपीय लोगों की तुलना में हमारे पास मांसपेशियां (Muscle) बहुत कम होती हैं। हजारों सालों के अकालों को झेलकर विकसित हुए हमारे शरीर इस तरह बने हैं कि जैसे ही खाना दिखे, उसे तुरंत चर्बी के रूप में जमा कर लो—इसे ‘थ्रिफ्टी जीन’ (कंजूस जीन) कहा जाता है। जब अगला अकाल कभी भी आ सकता था, तब यह जीन जिंदा बचने का एक वरदान था।
तो हाँ, जेनेटिक रूप से आपके अंदर यह कमजोरी पहले से है। लेकिन हम यहाँ खुद को धोखा दे रहे हैं। यह जेनेटिक बनावट हमारे डीएनए में पिछले 10,000 सालों से है; यह उस संकट की वजह नहीं हो सकती जो पिछले 40 सालों में अचानक फटा है। आपके परदादा के पास भी बिल्कुल यही जीन्स थे, लेकिन उन्हें 38 साल की उम्र में डायबिटीज नहीं हुई थी। बंदूक हमेशा से लोडेड थी, सवाल यह है कि हाल ही में इसका ट्रिगर किसने दबाया? और वह ट्रिगर आपके खून में नहीं, आपकी थाली में है। और वह वहाँ एक हादसे की वजह से पहुँचा।
अंग्रेजों के आने से पहले, भारत के किसान फसलों में बहुत विविधता रखते थे: वे मिलेट्स (मोटा अनाज) उगाते थे—रागी, बाजरा, ज्वार, कंगनी और दर्जनों तरह की दालें। ये प्रोटीन और फाइबर से भरपूर, और सूखे को भी झेल जाने वाले अनाज थे जिन्होंने इस देश का पेट सदियों तक पाला। फिर अंग्रेज आए—और जब भी इतिहास में यह वाक्य आता है, तो उसके बाद आमतौर पर कुछ अच्छा नहीं होता।
अंग्रेजों के सामने व्यापार घाटे (trade deficit) का एक बड़ा संकट था। उन्हें चीनी चाय की ऐसी लत थी कि उसे खरीदने के चक्कर में उनका सारा चांदी का भंडार खत्म हो रहा था। अब एक आम समझदार इंसान इसका क्या उपाय सोचेगा? शायद यह कि अपने लोगों को थोड़ी कम चाय पीने को कहे, या चीन को बदले में कोई ऐसी काम की चीज़ बेचे जो उनके काम आए। लेकिन ब्रिटिश साम्राज्य ऐसे काम नहीं करता था। उन्होंने एक रास्ता निकाला: अफीम। इसे भारत में उगाओ, चीन में ले जाकर बेचो और किसी दूसरे देश के लोगों को नशेड़ी बनाकर अपना व्यापार घाटा सुधार लो।
औपनिवेशिक सरकार ने अफीम का एकाधिकार (monopoly) अपने हाथ में लिया और बिहार तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश की लाखों एकड़ उपजाऊ जमीन पर जबरन अफीम (पोस्त) की खेती शुरू करवा दी। शशि थरूर ने एक आंकड़ा दिया है कि करीब 4,000,000 (चार लाख) एकड़ उपजाऊ जमीन अफीम के हवाले कर दी गई थी—वह जमीन जो भूखे भारतीयों के लिए अनाज उगा सकती थी। अफीम का हर एक एकड़ खेत, असल में मिलेट्स और दालों का घटा हुआ एक एकड़ खेत था। ब्रिटिश टैक्स सिस्टम ने किसानों को वह उगाने पर मजबूर किया जिसे साम्राज्य बेच सके, न कि वह जिसे उनके अपने बच्चे खा सकें। भारत की अन्न की टोकरी से विविधता गायब होने लगी, और प्रोटीन तथा फाइबर से भरपूर फसलें सबसे पहले बाहर कर दी गईं। मिलेट्स (मोटे अनाज) का गायब होना और कुछ नहीं, बस अंग्रेजों की एक सोची-समझी पॉलिसी थी।
इसके बाद आई आजादी, और साथ में मिला एक ऐसा देश जो अपना पेट भरने तक के काबिल नहीं था। 1960 के दशक का भारत एक खराब मानसून के आते ही भुखमरी की कगार पर पहुँच जाता था। तब सरकार ने अकाल से निपटने के लिए उस समय के हिसाब से एक बेहद तार्किक और ऐतिहासिक कदम उठाया। उन्होंने किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी दी और अनाज खरीदने के लिए एक पूरा सरकारी तंत्र खड़ा कर दिया।
लेकिन यह पूरा एमएसपी (MSP) का ढांचा सिर्फ दो फसलों के इर्द-गिर्द बुना गया: गेहूं और चावल। सरकार असीमित मात्रा में गेहूं और चावल एक तय कीमत पर खरीदने के लिए तैयार थी। दालें और तिलहन तकनीकी रूप से इस लिस्ट में थे, लेकिन असल में सरकार उन्हें न के बराबर खरीदती थी। तो किसानों ने भी वही किया जो कोई भी समझदार इंसान करता—उन्होंने वही उगाया जिसे खरीदने की गारंटी सरकार दे रही थी। नतीजा यह हुआ कि पूरे देश में चावल और गेहूं की बाढ़ आ गई और वे कृत्रिम रूप से बेहद सस्ते हो गए। दालों को वैसा सरकारी सहारा नहीं मिला, इसलिए दालें महंगी होती चली गईं।
भुखमरी रुक गई, अकाल थम गए—और यह हमारे देश की एक महान और सच्ची जीत है। लेकिन इसने हमारे देश के खाने की थाली का पूरा नक्शा ही बदल दिया। इसने रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट को आपकी मेज पर सबसे सस्ती चीज़ बना दिया, और प्रोटीन तथा फाइबर को एक महंगा सौदा। आपकी दादी-नानी ने थाली में चावल का पहाड़ और कटोरी में तैरती हुई पतली दाल किसी प्राचीन आयुर्वेदिक ज्ञान की वजह से नहीं परोसी थी; उन्होंने वह इसलिए परोसी क्योंकि इतिहास और सरकारी नीतियों ने उसी को सबसे सस्ता बना दिया था।
इस सब को एक साथ मिलाकर देखें, तो हमें एक ऐसी थाली मिली जो अकाल से निपटने के लिए बनी थी, जिसे एक साम्राज्य और सरकारी प्राइस-लिस्ट ने प्रोटीन और फाइबर से पूरी तरह महरुम कर दिया था। इतिहास के एक लंबे दौर तक यह थाली फिर भी काम कर गई, क्योंकि इसे खाने वाला शरीर कभी रुकता नहीं था। आज से 100 साल पहले का इंसान हर जगह पैदल जाता था, उठक-बैठक करके खाना पकाता था, झाड़ू-पोछा करता था, कुएं से पानी खींचता था, हाथ से कपड़े धोता था और सुबह से शाम तक हाड़-तोड़ मेहनत करता था। वे दिनभर में 3,000 कैलोरी फूंक देते थे। उनके लिए वह कार्ब्स से भरी थाली एक ईंधन थी, जो रात होने तक पूरी तरह जल जाती थी।
और आप और मैं? हम बमुश्किल 800 कैलोरी जला पाते हैं। हम दिनभर डेस्क पर बैठते हैं, कार या बाइक से सफर करते हैं, और शाम की इकलौती कसरत होती है रिमोट कंट्रोल तक हाथ बढ़ाना। थाली बिल्कुल वैसी ही रही, लेकिन हमारे शरीर की जरूरतें पूरी तरह बदल गईं।
तो यह पारंपरिक भारतीय डाइट कोई प्राचीन ज्ञान नहीं है। यह अकाल झेल चुके जीन्स, अंग्रेजों के अफीम के काले धंधे और 1965 की सरकारी राशन नीति का एक ऐसा बचा-कुचा हिस्सा है, जिसे एक ऐसे शरीर को परोसा जा रहा है जिसने 50 साल पहले ही हिलना-डुलना बंद कर दिया है। और यह असल में एक बहुत अच्छी खबर है, क्योंकि सदियों पुरानी पवित्र परंपरा को छोड़ना मुश्किल होता है—लेकिन अंग्रेजों के किए एक अपराध को सुधारना बिल्कुल मुश्किल नहीं है।
यहाँ हम दूसरी गलती क्या कर रहे हैं: जब विलेन पश्चिम से इम्पोर्ट (आयात) किया, तो अब हम इलाज भी वहीं से इम्पोर्ट करने की कोशिश कर रहे हैं। कीनुआ (Quinoa), केल (Kale), बादाम का आटा, ब्लूबेरी और कोई ऐसी जड़ी-बूटी जिसका नाम संस्कृत जैसा लगता हो और उस पर 3,000 रुपये का प्राइज टैग हो। आपको इस सब की कोई जरूरत नहीं है। इसका इलाज उसी थाली में छुपा है जो आप रोज पकाते हैं, बस उसके अनुपात (proportions) को थोड़ा बदलना है। चार ऐसे बटन (dials) हैं जिन्हें आपको आसमान पर नहीं पहुंचाना, बस थोड़ा सा घुमाना है और सब कुछ वापस बैलेंस में आ जाएगा।
पहला बटन: प्रोटीन (Protein)
शुरुआत यहीं से कीजिए, क्योंकि यही वह जगह है जहां पूरा भारत सबसे बड़ी गलती कर रहा है। एक औसत भारतीय अपने शरीर के वजन के प्रति किलोग्राम पर सिर्फ 0.6 से 0.8 ग्राम प्रोटीन खाता है। जबकि एक बेहद साधारण शरीर की जरूरत भी कम से कम 1 ग्राम प्रति किलो है, और अगर आप थोड़ा भी मस्कुलर या फिट रहना चाहते हैं, तो यह 1.6 ग्राम के करीब होनी चाहिए। हम एक पूरी सभ्यता के तौर पर अपनी जरूरत के आधे प्रोटीन पर जिंदा हैं।
प्रोटीन आपके शरीर के लिए दो वजहों से सबसे ज़्यादा मायने रखता है। पहला—यह आपके पेट को सबसे ज़्यादा भरता है क्योंकि यह शरीर में ‘GLP-1’, ‘CCK’ और ‘PYY’ जैसे गट-हॉर्मोन्स को एक्टिवेट करता है। ये वो केमिकल मैसेंजर हैं जो आपकी आंतों से सीधे दिमाग को सिग्नल भेजते हैं कि “पेट भर गया है, अब खाना बंद करो।” कार्बोहाइड्रेट इन हॉर्मोन्स के सामने बस फुसफुसाता है, लेकिन प्रोटीन जोर से चिल्लाता है। दूसरा—प्रोटीन को पचाने में शरीर को बहुत मेहनत करनी पड़ती है। प्रोटीन से मिलने वाली 20 से 30% कैलोरी तो शरीर उसे केवल तोड़ने और पचाने में ही फूंक देता है, जबकि कार्ब्स के मामले में यह 10% से भी कम है। यानी प्रोटीन अंदर आते-आते अपना टैक्स खुद ही चुका देता है।
और एक बहुत जरूरी बात: जिस दाल के भरोसे आप बैठे हैं, वह प्रोटीन की उतनी बड़ी शहंशाह नहीं है जितना आप सोचते हैं। पकी हुई दाल में 100 ग्राम पर सिर्फ 8 से 9 ग्राम प्रोटीन होता है, वह 25 ग्राम नहीं जो आपने किसी इंटरनेट के इन्फोग्राफिक में पढ़ा है। वह बड़ा नंबर ‘कच्ची दाल’ का होता है, इससे पहले कि वह पतीले का सारा पानी सोखकर भारी हो जाए। चावल और रोटी से तो नाममात्र का प्रोटीन मिलता है।
तो इसका इलाज कोई विदेशी चीज़ नहीं है: दाल की मात्रा दोगुनी कर दीजिए और चावल को आधा। सब्जी में पनीर या टोफू मिला लीजिए। इस देश में आज भी सबसे सस्ता और मुकम्मल प्रोटीन ‘अंडा’ है—छह-सात रुपये का एक, और सीधे 6 ग्राम प्रोटीन। दिन में दो अंडे आपकी इस कमी को काफी हद तक पूरा कर देंगे। इसके अलावा दही, स्प्राउट्स (अंकुरित अनाज), सोयाबीन, और अगर आप खाते हैं तो मछली, चिकन या मटन—बस यही करना है।
दूसरा बटन: फैट (Fat/तेल-घी)
यह आंकड़ा सबसे जरूरी है। एक ग्राम फैट में 9 कैलोरी होती हैं, जबकि एक ग्राम प्रोटीन या कार्बोहाइड्रेट में सिर्फ 4। फैट आपके प्लेट की किसी भी दूसरी चीज़ के मुकाबले दोगुने से भी ज़्यादा गाढ़ा (energy-dense) होता है। इसलिए तेल-घी में की गई एक छोटी सी कटौती भी आपकी कैलोरी को बहुत कम कर देती है, और आपके सामने रखे खाने की मात्रा भी कम नहीं होती।
इसे समझाने के लिए मैं एक छोटा सा प्रयोग करता हूँ। हर भारतीय खाना कड़ाही में तेल डालने से शुरू होता है। कड़ाही में तेल डालने के पांच तरीके हैं: एक स्प्रे बोतल, एक ऐसा ढक्कन जिसमें छेद किए गए हों, एक छोटी चम्मच (Teaspoon), एक बड़ी चम्मच (Tablespoon), और हमारा पारंपरिक भारतीय तरीका—सीधे बोतल से कड़ाही में उड़ेल देना (free-pour)।
* स्प्रे बोतल से सिर्फ डेढ़ ग्राम तेल निकलता है—यानी करीब 15 कैलोरी।
* छेद वाले ढक्कन से, अगर आप संभलकर डालें, तो आधी चम्मच यानी 2-3 ग्राम तेल निकलेगा—करीब 25 कैलोरी।
* एक पूरी नापी हुई छोटी चम्मच—45 कैलोरी।
* एक बड़ी चम्मच इसका सीधा तीन गुना कर देती है—135 कैलोरी।
* लेकिन वह जो सीधे बोतल से तेल पलटने वाला तरीका है—जैसे आपकी माँ अंदाज़ से डालती थीं—वह दो-तीन सेकंड की धार कड़ाही में सीधे 30 से 35 ग्राम तेल गिरा देती है। यानी किसी भी दूसरी सब्जी या मसाले के डलने से पहले ही कड़ाही में 270 से 315 कैलोरी का फैट बैठ चुका है।
इसीलिए मैं इस बात के पीछे पड़ा रहता हूँ कि तेल बोतल से बाहर कैसे आ रहा है। आपका हाथ वही है, आपकी नीयत वही है; बस तेल डालने का जरिया बदल गया। और यही जरिया एक 200 कैलोरी की सादी सब्जी और एक 500 कैलोरी की तेल से तर सब्जी के बीच का अंतर है। अगर आप दिन में तीन बार खाना बनाते हैं और हर बार सीधे बोतल से तेल डालते हैं, तो आप अनजाने में शरीर के अंदर 600 ऐसी कैलोरी डाल रहे हैं जो स्वाद में कोई फर्क नहीं लातीं, पेट भी नहीं भरतीं, लेकिन आपकी धमनियों (arteries) को ब्लॉक जरूर कर सकती हैं।
साफ कर दूँ, फैट हमारा दुश्मन नहीं है—हमारा दिमाग इसी से बना है। लेकिन जो रेस्टोरेंट जैसा खाना हम घर पर ‘फैंसी’ दिखने के लिए बनाते हैं, उसमें स्वाद से कहीं ज़्यादा तेल-बटर झोंक दिया जाता है। एक 850 कैलोरी वाली दाल मखनी या बिरयानी में वह कैलोरी दाल की नहीं, बल्कि बटर और क्रीम की होती है। सीधा सा नियम याद रखिए: आप स्विगी, जोमैटो या किसी भी रेस्टोरेंट से जो खाना ऑर्डर करते हैं, उसमें घर के मुकाबले ढाई से तीन गुना ज़्यादा कैलोरी होती है।
तीसरा बटन: फाइबर (Fiber)
यह वह बटन है जिसे हमने खुद जानबूझकर नीचे गिराया है। हमने अपनी एक फाइबर से भरपूर परंपरा को मिलों में पीसकर बिल्कुल चिकना बना दिया। हमने भूरे चावल (brown rice) को पॉलिश करके सफेद चमचमाता चावल बना दिया; हमने साबुत गेहूं को रिफाइंड करके मैदा बना दिया—यानी वह गेहूं जिससे उसका चोकर (bran) और फाइबर पूरी तरह छीन लिया गया है। आईसीएमआर (ICMR—भारत की सबसे बड़ी मेडिकल रिसर्च संस्था) का कहना है कि आज भारतीय जो भी कैलोरी खा रहे हैं, उसका 62% हिस्सा सिर्फ इसी रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट से आ रहा है।
फिबर दो तरीकों से अपनी जगह पक्की करता है। पहला—यह आपके पेट के खाली होने की रफ़्तार को धीमा कर देता है, जिससे आपको सुबह 11 बजे ही दोबारा भूख नहीं लगती और आप घंटों तक पेट भरा हुआ महसूस करते हैं। दूसरा—जो फाइबर आप पचा नहीं पाते, वह नीचे आपकी आंतों में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया के पास जाता है। वे बैक्टीरिया इसे खाकर ‘शॉर्ट-चेन फैटी एसिड्स’ में बदल देते हैं—ये वो बेहतरीन तत्व हैं जो शरीर की सूजन (inflammation) को शांत करते हैं और आपकी भूख को नियंत्रित रखते हैं। यानी बैक्टीरिया आपका बचा-कुचा खाना खाते हैं और बदले में आपको सेहत का इनाम देते हैं।
यही वह जगह है जहां मिलेट्स (मोटे अनाज) की असली तारीफ होनी चाहिए। और सच कहूँ तो, मिलेट्स को आजकल कुछ ज़्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाने लगा है। रागी, ज्वार और बाजरा में भी लगभग उतनी ही कैलोरी होती है जितनी चावल में; यह कोई जादुई चीज़ या वजन घटाने की दवा नहीं हैं। इनका असली फायदा यह है कि ये ‘साबुत अनाज’ हैं जिनका फाइबर अभी तक सलामत है।
तो कुछ वक्त का खाना ब्राउन राइस या हाथ से कुटे चावल में बदलिए, चोकर वाले चक्की के आटे का इस्तेमाल कीजिए, खाने में मिलेट्स को शामिल कीजिए, सब्जियों के छिलके मत उतारिए, और चिया सीड्स जैसे बीज खाइए। जब भी आप रिफाइंड की जगह साबुत अनाज चुनते हैं, तो आप अपनी थाली में तृप्ति (पेट भरने) का वह टूल वापस ला रहे होते हैं जिसे एक सदी पहले राइस मिलों ने बाहर निकाल दिया था।
### चौथा बटन: कार्बोहाइड्रेट (Carbohydrates)
आखिरी बटन खुद कार्बोहाइड्रेट है, और यहाँ एक बारीक अंतर को समझना जरूरी है: हर कार्बोहाइड्रेट शरीर में एक जैसा बर्हेव नहीं करता। ‘सिंपल कार्ब्स’—जैसे सफेद चावल, मैदा, आपकी चाय की चीनी या कोल्ड ड्रिंक—यह शरीर में जाते ही तुरंत ग्लूकोज में टूट जाते हैं और आपके खून में शुगर का एक बहुत तेज स्पाइक (उबाल) लाते हैं। अब आपके पेनक्रियाज (अग्न्याशय) को उस शुगर को ठिकाने लगाने के लिए इंसुलिन की एक बहुत बड़ी बाढ़ छोड़नी पड़ती है।
एक ऐसे शरीर में-जो जेनेटिक रूप से पहले से ही इंसुलिन रेजिस्टेंट (कमजोर) है—अगर आप दिन में तीन, चार या पांच बार यही काम दशकों तक करते रहेंगे, तो आप उस पूरे सिस्टम को थकाकर बेकार कर देंगे। यही रास्ता सीधे डायबिटीज की तरफ जाता है।
मैं यहाँ कीटो (Keto) जैसी किसी बेवकूफाना डाइट की बात नहीं कर रहा। आपको कार्बोहाइड्रेट से डरने की जरूरत नहीं है; आपको बस उस सबसे रिफाइंड और शुगर को तेजी से बढ़ाने वाले कार्बोहाइड्रेट को अपनी हर मील (meal) पर हावी होने से रोकना है। मैं यह नहीं कह रहा कि आप मिलेट की बिरयानी खाना शुरू कर दें; बस चावल का हिस्सा छोटा कर दीजिए और थाली को दाल और सब्जी से भर दीजिए ताकि आपकी प्लेट में 70% हिस्सा सिर्फ अनाज का न हो। जहां तक हो सके रिफाइंड की जगह साबुत अनाज चुनिए, धुली दालों की जगह साबुत दालें खाइए, और अपनी चीनी को ‘पीना’ बंद कीजिए। यह जो चाय-बिस्किट और कोल्ड ड्रिंक की आदत है, यह शुद्ध रूप से सिंपल कार्बोहाइड्रेट है जिसे धीमा करने के लिए इसमें कोई फाइबर या प्रोटीन नहीं होता। अपनी थाली को इस तरह सजाइए कि कार्बोहाइड्रेट खाने का एक ‘हिस्सा’ हो, खुद में ‘पूरा खाना’ न हो।
तो चलिए, सारे संदिग्धों को एक बार फिर से कटघरे में खड़ा करते हैं। आपके जीन्स बेकसूर हैं—वे पिछले 10,000 सालों से ऐसे ही हैं और पिछले 40 सालों के इस अचानक आए संकट की वजह नहीं हो सकते। प्रोसेस्ड फूड भी बेकसूर निकला—आप पश्चिमी देशों के मुकाबले उसका छठा हिस्सा खाते हैं और फिर भी उनसे ज़्यादा बीमार हैं।
असली कसूरवार वही खाना निकला जिस पर आपने सबसे ज़्यादा भरोसा किया: आपके घर की थाली।
लेकिन वह अकेली नहीं थी। उसे इस जाल में फंसाया था एक अकाल झेल चुके शरीर ने जो चर्बी जमा करने के लिए मजबूर था, एक शोषक ब्रिटिश साम्राज्य ने जिसने आपकी दालों और मिलेट्स को अफीम से बदल दिया, 1965 की एक सरकारी नीति ने जिसने चावल को सस्ता और दाल को महंगा बना दिया, और आपके उस शरीर ने जिसने पिछले 50 सालों में हिलना-डुलना ही बंद कर दिया।
इसमें आपकी दादी या नानी की कोई गलती नहीं थी। उन्होंने वही पकाया जो अकाल के उस दौर में और सरकारी नीतियों के चलते उनकी पहुंच में था, और उन्होंने उस परिवार के लिए पकाया जो दिन में 15 किलोमीटर पैदल चलता था। वह थाली गलत नहीं थी, वह डाइट गलत नहीं थी, वह खाना गलत नहीं था—बस उसके नीचे की दुनिया पूरी तरह बदल गई, लेकिन हमारे पकाने की रेसिपी नहीं बदली।
इसका मतलब यह है कि इसका जवाब किसी विदेशी सुपरमार्केट में कभी था ही नहीं। आपको कीनुआ या केल की कोई जरूरत नहीं है। आपको उसी दाल-चावल को, जिससे आप बेइंतहा प्यार करते हैं, बस सही अनुपात में लाना है: थोड़ा ज़्यादा प्रोटीन, बहुत कम तेल-घी, ज़्यादा फाइबर और कम सिंपल कार्ब्स। और मसाले वही रखिए क्योंकि वे एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर हैं। एक सही बैलेंस में लाई गई भारतीय थाली, दुनिया के किसी भी कीनुआ-बाउल को हर मामले में धूल चटा सकती है, और इसकी कीमत भी बहुत कम है।
आपका पारंपरिक खाना इतिहास में जमी हुई कोई पवित्र और अछूती चीज़ नहीं था। आपसे पहले की हर पीढ़ी ने उसे अपने समय की दुनिया के हिसाब से बदला और दोबारा लिखा। आज वही काम करना-यानी जो विरासत हमें मिली है उसे आज की जिंदगी के हिसाब से थोड़ा सा ढाल लेना—परंपरा के साथ कोई गद्दारी नहीं है। असल में, यही सबसे सनातनी और पारंपरिक चीज़ है जो आप अपने खाने के साथ कर सकते हैं।
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