ज़फर सरेशवाला-अजीत डोवाल मुलाकात: मुस्लिम अपेक्षाएँ, राष्ट्रीय सुरक्षा और हिंदू चुप्पी

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दिल्ली। 18 अप्रैल 2026 को प्रधानमंत्री कार्यालय में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल के साथ ज़फर सरेशवाला के नेतृत्व वाले 14-16 सदस्यीय मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल की मुलाकात हुई। यह बैठक करीब 100 मिनट चली। दो महीने बाद आज जब हम इस घटना को देखते हैं तो यह स्पष्ट हो चुका है कि यह केवल एक औपचारिक बातचीत नहीं थी, बल्कि मुस्लिम समुदाय की व्यवस्थित अपेक्षाओं को शासन के उच्चतम स्तर तक पहुँचाने का प्रयास था।
ज़फर सरेशवाला, जो एक प्रमुख व्यवसायी और शिक्षाविद् हैं, ने डेढ़ महीने पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने की इच्छा जताई थी। निर्देश मिला कि वे और उनका प्रतिनिधिमंडल अजीत डोवाल से मुलाकात करे। डोवाल कैबिनेट मंत्री के दर्जे वाले और देश की सुरक्षा नीतियों में बेहद प्रभावशाली व्यक्ति हैं। बैठक में फारुक पटेल, इनामुल हक इराकी, ज़हीर काजी, कौसर जहां, समीना शेख समेत कई प्रमुख मुस्लिम उद्योगपति, शिक्षाविद्, डॉक्टर और पत्रकार शामिल थे।
प्रतिनिधिमंडल ने खुलकर गिले-शिकवे रखे। बंगाल, उत्तर प्रदेश और असम के मुख्यमंत्रियों पर मुस्लिमों के साथ “कठोर व्यवहार” की शिकायत की गई। बुलडोजर कार्रवाई, अवैध मजारों-मस्जिदों पर नोटिस, मॉब लिंचिंग के मामले उठे। शिक्षा और रोजगार में “घटती सुविधाओं” का जिक्र हुआ। रंगनाथ मिश्रा और सच्चर कमेटी रिपोर्टों के पूर्ण क्रियान्वयन, 500 अलग मुस्लिम शैक्षिक संस्थानों की स्थापना और आर्थिक मदद की माँग रखी गई। वक्फ बोर्डों के मामलों, सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिकाओं, राज्य मंत्रिमंडलों और सैन्य बलों में अधिक प्रतिनिधित्व की अपेक्षा भी जताई गई।
अजीत डोवाल ने धैर्यपूर्वक सुना। उन्होंने राष्ट्रीय एकता पर जोर दिया। कहा, “हम सब एक नाव में हैं-या तो साथ तैरेंगे या साथ डूबेंगे।” शिक्षा पर उन्होंने सुझाव दिया कि संस्थान आप खोलिए, धन की व्यवस्था हम बड़े व्यापारिक घरानों से करवा देंगे। बैठक के बाद ज़फर सरेशवाला ने इसे “सकारात्मक कदम” बताया। उन्होंने कहा कि न तो भेदभाव होना चाहिए और न विशेष छूट।
दो महीनों में इसके कुछ परिणाम भी दिखे। उत्तर प्रदेश में तीन तलाक पीड़ित महिलाओं के लिए मासिक भत्ता और आयुष कार्ड देने की घोषणा हुई। असम और बंगाल में भी कुछ नई सुविधाओं की चर्चा शुरू हो गई। ज़फर सरेशवाला असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और शुभेंदु अधिकारी से मिल चुके हैं। योगी आदित्यनाथ से उनकी पुरानी मुलाकातें भी रही हैं। लखनऊ में लूलू मॉल जैसी बड़ी परियोजनाओं में उनकी भूमिका की चर्चा है।
यह बैठक निस्संदेह संवाद का एक माध्यम थी, लेकिन यह हिंदू समाज के लिए गहरी चिंता का विषय भी है। पिछले 12 वर्षों में मुस्लिम प्रतिनिधिमंडलों से प्रधानमंत्री या शीर्ष नेतृत्व की दर्जनों मुलाकातें हो चुकी हैं। वे बिना वोट दिए भी अपनी माँगें मनवा लेते हैं। वहीं हिंदू समाज, जो भाजपा को वोट, नोट और हर समर्थन देता है, अपनी समस्याएँ लेकर कभी संगठित रूप से नहीं पहुँचता।
यूपी, बंगाल और असम में मंदिरों के पुजारियों की हत्याएँ लगातार हो रही हैं। वृंदावन, वाराणसी जैसे स्थानों में धर्माचार्यों की सुरक्षा पर कोई बड़ा प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री से क्यों नहीं मिलता? अवैध मस्जिदों-मजारों पर बुलडोजर की क्लिप देखकर सोशल मीडिया पर जश्न मनाने वाले हिंदू वास्तविक समस्याओं—मंदिर संपत्तियों पर कब्जा, पुजारियों की दुर्दशा, धार्मिक स्थलों की सुरक्षा-को लेकर चुप क्यों हैं?
मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल “लेवल प्लेइंग फील्ड” की बात करता है, लेकिन माँगें अलग संस्थान, अलग सुविधाएँ, वक्फ बोर्डों में सहानुभूति और आरक्षण जैसे मुद्दों पर केंद्रित रहती हैं। सच्चर कमेटी की सिफारिशें भाजपा सरकारों ने कांग्रेस से कहीं अधिक लागू की हैं, फिर भी असंतोष बना रहता है। क्या यह एकतरफा संवाद नहीं है?
हिंदू समाज में “राधे-राधे” नाच, लड्डू गोपाल की सेवा, चौराहे पर खिचड़ी बाँटने और इक्का-दुक्का बुलडोजर कार्रवाई पर संतोष करने की संस्कृति हावी है। जिले के डीएम तक अपनी समस्याएँ ले जाने की हिम्मत कम ही लोग जुटा पाते हैं। परिणामस्वरूप सत्ता की नजर में हिंदू “बंधुआ वोटर” से अधिक कुछ नहीं रह गए हैं।
अजीत डोवाल जैसे अनुभवी सुरक्षा विशेषज्ञ का मुस्लिम नेताओं से संवाद राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। लेकिन जब तक हिंदू समाज अपनी चिंताएँ—जनसांख्यिकीय परिवर्तन, मंदिर स्वामित्व, धार्मिक स्वतंत्रता, सीमा पार घुसपैठ और आंतरिक सुरक्षा—को संगठित रूप से नहीं रखेगा, संतुलन नहीं बनेगा।
ज़फर सरेशवाला की सक्रियता सराहनीय है। उन्होंने समुदाय को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। लेकिन हिंदू समाज को भी सीख लेनी चाहिए। प्रतिनिधित्व, संवाद और माँग रखने की कला सीखनी होगी। “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” तभी सार्थक होगा जब हर समुदाय अपनी जिम्मेदारियाँ भी समझे और राष्ट्र प्रथम की भावना से चले।
दो महीने बाद भी यह बैठक याद इसलिए की जा रही है क्योंकि यह एक पैटर्न दिखाती है। मुस्लिम समुदाय अपनी समस्याओं को शासन तक पहुँचा रहा है। हिंदू अभी भी “मोदी-योगी” के नारों में खोया हुआ है। समय आ गया है कि हिंदू भी जागें, संगठित हों और अपनी चिंताओं को बिना किसी संकोच के रखें। राष्ट्रहित में यही संतुलन आवश्यक है।

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