कुढ़िए नहीं, पहले पढ़िए

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अनुराग पुनेठा 
आदमी जब अपने समय से हार जाता है, तो अक्सर अपने देश से लड़ने लगता है। फिर हर पुल में दरार, हर उपलब्धि में प्रचार, हर सम्मान में साज़िश और हर मुस्कान में अभिनय दिखाई देता है।
इसी राष्ट्रीय कुढ़न, इस आत्मपीड़क मनोवृत्ति और हर अच्छी ख़बर में बुरी ख़बर खोजने की आदत पर है कविता ‘कुढ़ो’

कुढ़ो,
पर अकेले मत कुढ़ो।
टोली बनाकर कुढ़ो।
विचार-गोष्ठी रखकर कुढ़ो।
कॉलम लिखकर कुढ़ो।
स्टूडियो में गर्दन तिरछी कर
राष्ट्र की हर उपलब्धि पर कुढ़ो।

भारत बढ़े—कुढ़ो।
भारत बोले—कुढ़ो।
भारत सुना जाए—और ज़ोर से कुढ़ो।
क्योंकि तुम्हारे हिसाब से
देश तभी लोकतांत्रिक था
जब देश बोलता कम था
और तुम्हें बुलाया ज़्यादा जाता था।

चंद्रमा पर भारत पहुँचे—कुढ़ो।
दक्षिणी ध्रुव पर झंडा लगे—कुढ़ो।
वैज्ञानिक मुस्कुराएँ—कुढ़ो।
दुनिया ताली बजाए—कुढ़ो।
और फिर गंभीर चेहरा बनाकर कहो—
“यह सब ठीक है,
मगर असली सवाल तो कुछ और है।”

अर्थव्यवस्था बढ़े—आँकड़ों पर कुढ़ो।
सड़क बने—धूल पर कुढ़ो।
एयरपोर्ट बने—कॉफी के दाम पर कुढ़ो।
वंदे भारत चले—सीट के रंग पर कुढ़ो।
डिजिटल भुगतान बढ़े—नेटवर्क पर कुढ़ो।
नेटवर्क ठीक चले—निगरानी पर कुढ़ो।
कुढ़ना ही जब धर्म हो जाए,
तो समाधान भी समस्या लगता है।

यूक्रेन में युद्ध हो,
भारत अपने बच्चों को निकाल लाए—कुढ़ो।
ईरान में संकट हो,
भारत अपने नागरिकों की चिंता करे—कुढ़ो।
समुद्र में जहाज़ फँसे,
दूतावास जागे—कुढ़ो।
क्योंकि तुम्हें दुख इस बात का नहीं
कि लोग बच गए,
तुम्हें दुख इस बात का है
कि कहानी में तुम्हारा उद्धरण नहीं आया।

गलवान हो—कुढ़ो।
सीमा पर सैनिक खड़े हों—कुढ़ो।
देश धैर्य रखे—कुढ़ो।
देश जवाब दे—कुढ़ो।
सेना बोले तो राष्ट्रवाद,
तुम बोलो तो विवेक;
वाह महापुरुष,
कितना संतुलित है तुम्हारा असंतुलन।

दुनिया का कोई नेता भारत की प्रशंसा करे—कुढ़ो।
पूर्व से प्रशंसा आए—कुढ़ो।
पश्चिम से आए—कुढ़ो।
उत्तर से आए—कुढ़ो।
दक्षिण से आए—कुढ़ो।
और फिर घोषणा करो—
“यह सब कूटनीतिक भाषा है।”
मानो तुम्हारी कुंठा ही
संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा हो।

भारत पाकिस्तान से बात न करे—कुढ़ो।
बात करे—कुढ़ो।
चुप रहे—कुढ़ो।
कठोर रहे—कुढ़ो।
नरम रहे—कुढ़ो।
तुम्हारी विदेश नीति का सिद्धांत साफ़ है—
दुश्मन नाराज़ न हो,
बस अपना देश कभी आश्वस्त न हो।

ग्लोबल साउथ भारत को सुने—कुढ़ो।
G20 में भारत एजेंडा बनाए—कुढ़ो।
योग दिवस दुनिया मनाए—कुढ़ो।
मिलेट्स को सम्मान मिले—कुढ़ो।
क्योंकि सभ्यता जब फिर खड़ी होती है,
तो सबसे पहले
दरबारी इतिहासकारों की कुर्सी हिलती है।

कुढ़ो कि अब निमंत्रण कम आते हैं।
कुढ़ो कि अब पहली पंक्ति में नाम नहीं लिखा जाता।
कुढ़ो कि अब “हमारे ज़माने में” सुनकर
लोग मोबाइल देखने लगते हैं।
कुढ़ो कि राष्ट्र आगे बढ़ गया
और तुम footnote में भी fit नहीं हो पाए।

पुरस्कार मिले तो “संस्थान स्वतंत्र”।
न मिलें तो “संस्थान ख़तरे में”।
सम्मान मिले तो “मेरी साधना”।
दूसरे को मिले तो “राजनीतिक नियुक्ति”।
वाह!
इतनी पारदर्शी ईर्ष्या
इतिहास में कम ही देखी गई है।

कुढ़ो।
हर पुल पर कुढ़ो।
हर सुरंग पर कुढ़ो।
हर ट्रेन पर कुढ़ो।
हर बंदरगाह पर कुढ़ो।
हर उपग्रह पर कुढ़ो।
हर startup पर कुढ़ो।
हर unicorn पर कुढ़ो।
हर उस बच्चे पर कुढ़ो
जो अंग्रेज़ी में अटकते हुए भी
दुनिया से आँख मिलाकर बोल रहा है।

कुढ़ो कि गाँव में इंटरनेट आ गया।
कुढ़ो कि किसान सीधे पैसा पा रहा है।
कुढ़ो कि गरीब का बैंक खाता खुल गया।
कुढ़ो कि गैस, शौचालय, बिजली, पानी
राजनीति की कविता से निकलकर
रसोई और आँगन तक पहुँच गए।
क्योंकि तुम्हारी क्रांति
कागज़ पर सुंदर थी,
ज़मीन पर असुविधाजनक।

कुढ़ो
कि भारत अब माफ़ी माँगकर नहीं,
आत्मविश्वास से बात करता है।
कुढ़ो
कि पासपोर्ट की लाइन में खड़ा नागरिक
अब राष्ट्र की हैसियत महसूस करता है।
कुढ़ो
कि संकट के समय विमान आता है,
सिर्फ़ बयान नहीं।

महापुरुष!
इतना कुढ़ो
कि तुम्हारी भौंहें राष्ट्रीय धरोहर घोषित हो जाएँ।
इतना कुढ़ो
कि शिकन मंत्रालय बनाना पड़े।
इतना कुढ़ो
कि इतिहास लिखे—
एक वर्ग था,
जो भारत की विफलता पर चिंतित नहीं,
भारत की सफलता से आहत था।

और कुढ़ते रहो।
जब तक कुढ़ना
तुम्हारी विचारधारा न बन जाए।
जब तक शिकायत
तुम्हारा राष्ट्रगान न बन जाए।
जब तक हर उपलब्धि के बाद
तुम्हारे भीतर से वही पुराना स्वर न निकले—

“ठीक है, मगर…”

हाँ,
ठीक है, मगर कुढ़ो।
थोड़ा और कुढ़ो।
शोर से कुढ़ो।
चौराहे पर कुढ़ो।
सेमिनार में कुढ़ो।
विदेशी अख़बार में कुढ़ो।
podcast में कुढ़ो।
और इतना कुढ़ो
कि आने वाली पीढ़ियाँ समझ सकें—

भारत के उठने का अर्थ क्या था,
और कुछ लोगों के भीतर
इतनी देर तक बैठे रहने की पीड़ा क्या थी।

कुढो, कुढो , और कुढो…महापुरूष कुढो…

 

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