दिल्ली । यह जंतर-मंतर की सड़क है। यहां हर सुबह एक नई ‘क्रांति’ की बोली लगती है, और हर शाम उसकी लाश पर वैचारिक भाषणों के कसीदे पढ़े जाते हैं। जो लोग इतिहास और समाज के सतही पन्नों को पढ़कर संतुष्ट हो जाते हैं, वे इस जमावड़े को ‘जन-आक्रोश’ कह सकते हैं। किंतु यदि आप थोड़ा ठहरकर, भीड़ के कोलाहल को चीरते हुए उसके भीतर झांकें, तो आपको यथार्थ का वह घिनौना रूप दिखेगा, जहां नीट (NEET) के मासूम परीक्षार्थियों का भविष्य केवल एक मोहरा है, और असली खिलाड़ी परदे के पीछे बैठे विदेशी व राजनीतिक आका हैं।
‘आंदोलन’ तो व्यवस्था की सड़ी-गली नसों में न्याय की खौलती धारा प्रवाहित करने वाला वो महा-मन्थन है, जो सत्ता के अहंकार को पिघलाकर जन-आकांक्षाओं की नींव रखता है। किंतु जब असंतोष की यह पवित्र आग भाड़े के उपद्रवियों के हाथ की मशाल बन जाए, तो इतिहास बदलता नहीं, केवल लोकतंत्र का चीरहरण होता है। हमें यह कड़वा सच कबूल करना होगा कि व्यवस्था का विरोध और अराजकता का नग्न तांडव कभी एक नहीं हो सकते।
विरोध तो मर्यादा की ढाल पहनकर सत्य की ढली हुई शमशीर से लड़ा जाता है, जबकि यह अराजकता तो व्यवस्था की छाती को नोच-नोचकर अपनी राजनीतिक हवस मिटाने वाला वो खूंखार भेड़िया है, जिसकी लार में मासूमों के भविष्य का लहू मिला हुआ है।
जरा इन उपद्रवियों के चेहरों को गौर से देखिए। हाथों में उछलते पत्थर, पुलिस की गाड़ियों पर बर्बरता से टूटती भीड़ और देश की सुरक्षा में तैनात वर्दी पर झपटते नापाक हाथ! क्या ये इस मुल्क का मुस्तकबिल गढ़ने वाले मेधावी छात्र हैं? क्या रातों की नींदें जलाकर जीवन-दान देने का ख़्वाब देखने वाले नौजवान अपने ही रक्षकों की हड्डियों को चटखाने पर आमादा होंगे? हरगिज नहीं! यह किसी परीक्षा का दर्द नहीं, यह तो ‘डीप स्टेट’ का बुना वो जहरीला सिंडिकेट है, जो हर जायज असंतोष को लाशों के ढेर में तब्दील करने का फन जानता है। पर्चा लीक होने से टूटे बच्चों के अवसाद की महज़ आड़ ली गई है। मक़सद साफ़ है, मासूमों के सीने पर अपनी सियासत की तोप रखना और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भारत की आबरू का सौदा करना।
किंतु, इस पूरे ख़ूनी ड्रामे का सबसे नंगा, सबसे ज़लील दृश्य तब दिखा, जब सच का आइना लिए डटी एक निष्पक्ष महिला पत्रकार को उग्र भीड़ ने चारों तरफ से घेर लिया। ज़रा उस ख़ौफ़नाक लम्हे की आग को महसूस कीजिए, जब सच की तलाश में निकली एक बेटी पर भेड़ियों का झुंड टूट पड़ता है, जहां उसकी आबरू को तार-तार करने की हिंसक कोशिश होती है, जहां धक्के, अपशब्द और मॉब-लिंचिंग की सड़ांध उसकी सांसों तक पहुंचने लगती है! उस वक़्त सड़क पर केवल एक पत्रकार का उत्पीड़न नहीं हो रहा था, बल्कि लोकतंत्र की रीढ़ पर लात मारकर उसकी बची-कुची मर्यादा को लहूलुहान किया जा रहा था। जब सच बोलने वाली बेटी का गिरेबान खिंच रहा हो और कलम के मठाधीश ख़ामोश खड़े मुस्करा रहे हों, तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र ज़िंदा नहीं, उसकी लाश का बाज़ार में सौदा हो चुका है!
उस वक़्त कहां दफ़्न हो गई थी निष्पक्षता के मसीहा बनने वाले इन मठाधीशों की आत्मा? अतीत में तमाचा खाकर जीवन भर ‘मज़लूमियत’ की भीख मांगने वाले आशुतोष हों, या रवीश, प्रसून और अजीत अंजुम जैसी पूरी जमात, सबकी बोलती पर ताले जड़े थे।
आंखों में अमानवीय शांति थी और मन में इस बात का घिनौना उल्लास कि शिकार उनके वैचारिक आकाओं के खेमे का नहीं था। जब थूककर चाटना ही पत्रकारिता का धर्म बन जाए, तो सहकर्मी की चीत्कार भी एजेंडे का संगीत लगती है। राजनीतिक आकाओं के जूठन पर पलने वाले इन नपुंसक चेहरों की रगों में अब निष्पक्षता का लहू नहीं, बल्कि चाटुकारिता का जहर दौड़ रहा है। जब कलम की स्याही सत्ता-विरोधी तुष्टीकरण और विदेशी फंडिंग के चेक से भरी जाने लगे, तो पत्रकार निर्भीक नहीं रहता, वह केवल एक वैचारिक भाड़े का टट्टू बनकर रह जाता है।
और इस पूरे अधर्म को खाद-पानी दे रही है आज की ‘रील-पीढ़ी’। इन राजनीतिक गिद्धों के लिए किसी छात्र की तबाह होती जिंदगी या किसी महिला पत्रकार की चीत्कार महज एक ‘डिजिटल अवसर’ है। मोबाइल का कैमरा ऑन हुआ तो बनावटी क्रांति का बाज़ार सज गया, और लाइव-स्ट्रीम बंद होते ही सारी वैचारिक निष्ठा कूड़ेदान में जा गिरी! इनके पास तर्कों का अकाल है, जबान पर गालियों का अमर्यादित शोर है, और न्याय की तड़प से बड़ा सोशल मीडिया का ‘एल्गोरिद्म’ हो चुका है। जो क्रांति, कैमरा ऑन होने पर शुरू और लाइव-स्ट्रीम बंद होने पर दम तोड़ दे, वह इतिहास की धारा नहीं मोड़ती… केवल डिजिटल कचरे का ढेर बनाती है!
स्याह झंडों और प्रायोजित सियासत के इस घिनौने खेल में आख़िर किसकी बलि चढ़ी? वही सच्चा छात्र! पचास हज़ार उपद्रवियों की एक घंटे की प्रायोजित हिंसा ने मुल्क की करोड़ों आंखों की स्वतःस्फूर्त सहानुभूति को एक ही झटके में जलाकर राख कर दिया। भीड़ में फेंका गया हर एक पत्थर व्यवस्था का कुछ नहीं बिगाड़ता, वह केवल किसी गरीब छात्र के घर में जलती हुई उम्मीद की मोमबत्ती को बुझा देता है। कल यह हिंसक भीड़ चली जाएगी, कुछ उग्र चेहरे नेता कहलायेंगे, कुछ डिजिटल दुनिया के सितारे बन जाएंगे और सियासी पार्टियां अपनी रोटियां सेंक कर निकल जाएंगी। लेकिन उस बदक़िस्मत छात्र का क्या? वह कल भी अपने कमरे में अधूरी किताबों और धुंधले भविष्य के साथ तन्हा बैठा था, और आज भी अनिश्चितता के अंबर तले अकेला ही अपनी किस्मत पर आंसू बहा रहा है!
रामायण के पन्ने पलटिए। रावण की दंभी सभा में जब सीता के सम्मान की धज्जियां उड़ाई जा रही थीं, तब भी ज्ञानी कहलाने वाले मठाधीश चुपचाप उस अधर्म का आनंद ले रहे थे। आज का जंतर-मंतर उसी दंभी सभा का नया रूप है। लेकिन याद रखिए, गिद्धराज संपाती की तरह निष्पक्ष और दूरदर्शी सोच ही सत्य को बचाती है। रावण का अहंकार और उसकी सभा का सन्नाटा उसे महाविनाश से नहीं बचा पाया था।
फंडिंग के चेक एक दिन रीते होंगे, सियासी आकाओं का हाथ सिर से हटेगा और पत्थरों के दम पर खड़ा यह प्रायोजित तमाशा ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा। सत्य का सूरज भले ही प्रायोजित बादलों में छुप जाए, लेकिन जब वह प्रकट होता है, तो झूठी क्रांतियों के सारे टिमटिमाते चिराग़ों को बेनूर कर देता है। जो आंदोलन न्याय की जगह ‘वायरल’ होने की होड़ में अपनी मर्यादा बेच देते हैं, वे कभी इतिहास का अमर पृष्ठ नहीं लिखते… वे महज इतिहास का सड़ता हुआ कचरा बनकर रह जाते हैं!



