सामयिक घटनाक्रम पर कैलाश जी डागा की महत्वपूर्ण टिप्पणी

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दिल्ली । कोई यह नहीं पूछ रहा है कि कौन है ये अभिजीत दीपके ? कहां से आया, पहले क्या कर रहा था..? कैसे अचानक रातोंरात इतना लोकप्रिय हो गया कि सप्ताह भर में 2 करोड़ से ऊपर फॉलोअर्स हो गए। क्या है इसकी पृष्ठभूमि..?

केजरीवाल की पार्टी में मीम बनाने की नौकरी करने वाला अत्यंत साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि वाला अभिजीत अचानक नौकरी छोड़कर अमेरिका में जर्नलिज्म की पढ़ाई करने चला गया। बन्दा पढ़ाई करके नौकरी की तलाश में वहां बेरोजगार घूम रहा था।

अचानक भारत के चीफ जस्टिस ने उसे रोजगार दे दिया। 15 मई 2026 को भारत के सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने फर्जी डिग्री से वकालत का पेशा अपनाने वाले वकीलों की परजीवी और कॉकरोच से तुलना क्या कर दी, मानो न्यूटन के सर पर सेब गिरा, ज्ञान चक्षु खुले और अगले ही दिन 16 मई 2026 को दीपके ने कॉकरोच जनता पार्टी बनाने की सोशल मीडिया में घोषणा कर दी और देखते ही देखते भारत ही नहीं एशिया, यूरोप, अमेरिका में उसके लाखों करोड़ों फॉलोअर्स हो गए।

रातों-रात इतने फॉलोअर्स हो जाना क्या अचम्भे का विषय नहीं है..? कल तक बिल्कुल गुमनाम रहे आदमी को 7 दिनों में दो करोड़ फालोवर्स मिल गए..!

उससे पूर्व 3 मई को हुई नीट परीक्षा में पेपर लीक हो गया था लेकिन सात समंदर पार बैठे दीपके को 1 जून को स्वप्न आया कि देश की जनता को, खासतौर पर जेन-जी को उसके नेतृत्व की सख्त जरूरत है… और इंडिया जाकर नीट पेपर लीक के ख़िलाफ़ आंदोलन किया जाए… और परधान जी का इस्तीफ़ा मांगा जाए..!
और वह 6 जून को दिल्ली इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर उतरा…
पूरी दिल्ली में कहीं कोई सुरसुराहट सुगबुगाहट नहीं हुई… यहां तक कि गलियों में घूमते श्वानों ने भी आसमान की तरफ मुंह करके उसका स्वागत नहीं किया…

6 जून से 20 जून तक और फिर 25 जून के मध्य नितांत अनजान लोगों के बीच प्रेम की कोंपलें प्रस्फुटित हुईं और प्रेम परवान भी चढ़ा, जब 25 जून को सोनम वांगचुक ने सीजेपी के बैनर तले नीट पेपर लीक के विरोध में धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र तक के लिए 28 जून से भूख हड़ताल पर बैठने की घोषणा की।

आश्चर्यजनक यह है कि कोई यह नहीं पूछ रहा कि;-

अभिजीत दीपके का सोनम वांगचुक के साथ संपर्क कैसे हुआ..?

किसने सोनम वांगचुक को नीट परीक्षा लीक मामले को लेकर भूख हड़ताल पर बैठने को तैयार किया..?

किसने सौरव दास, आशुतोष रांका, विजेता दहिया को दीपके के साथ जोड़ा..?

किसने सीजेपी के मंच पर अरविंद केजरीवाल, प्रकाश राज, योगेंद्र यादव, अरुंधति राय जैसे वामपंथी अराजकतावादियों को भेजा।

कौन था जिसने शबाना आज़मी, स्वरा भास्कर, सोनाक्षी सिन्हा, अदिति हैदरी, दिया मिर्जा, अनुराग कश्यप, विशाल ददलानी, नसीरुद्दीन शाह जैसे फिल्मी सिकुलर्स को इस भूखहड़ताल को प्रत्यक्ष/ अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन देने को कहा.?

कौन था जिसने सपा के अखिलेश यादव, डिंपल यादव, गुमनाम आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर रावण, टीएमसी की महुआ मित्रा, सागरिका घोष, सीपीआई एम से जॉन बिट्रास, आदमी पार्टी के संजय सिंह, एनसीपी से शरद पवार और सुप्रिया सुले को इस नाटक का हिस्सा बनने के लिए मजबूर किया..?

किसने जेएनयू के टुकड़े-टुकड़े गैंग, वामपंथी संगठन आईसा, डफली वालों को जंतर मंतर भेजा..?

किसने नाटक का आकर्षण बनाए रखने के लिए लेस्बियन्स, गे’ज, फेमिनाईन्स, स्वयं को विपरीत लिंगी मानने वाले “मीठाें” को प्रतिदिन वहां भेजने का प्रबंध किया..?

कौन है जो कल तक अजनबी रहे इन लोगों को एक मंच पर जुटा रहा है..?

कौन है जो पर्दे के पीछे से आग को भड़का रहा है..?

इस कथित आंदोलन के पीछे किसका दिमाग है..?

फैक्ट्स
राजस्थान में कांग्रेस की विगत अशोक गहलोत सरकार में एक के बाद एक 19 पेपर लीक हुए जो अब तक का एक रिकॉर्ड है लेकिन इनमें से कोई आंदोलनजीवी नहीं पहुंचा। उक्त में से किसी को भी युवाओं के करियर की चिंता-परवाह नहीं हुई.!

20 जुलाई को संसद के मानसून सत्र का पहला दिन था। विगत लगभग महीने भर से चल रहे सीजेपी के आंदोलन में 400-500 से ज्यादा की भीड़ किसी दिन नहीं जुटी लेकिन 20 जुलाई को 8 से 10000 लोग यकायक कहां से पहुंच गए..?

उनमें अधिकांश जेन-जी के बजाय अंकल लोग थे…

बैरिकेट्स हटाए गए… पुलिस की गाड़ियों पर, पुलिस पर पथराव हुआ…
अनेक पुलिस अधिकारी आईपीएस सहित घायल हुए अंततः लाठी चार्ज हुआ, आंसू गैस के गोले छोड़े गए… पत्थर बाजी हुई, हंगामा हुआ…
बच्चों के, बड़ों के वीडियो क्लिप बनाए गए…
इंटरव्यू लिए गए…

और वह सब कुछ हुआ जो आंदोलन के पीछे के दिमाग को चाहिए था…
महीने भर से असफल हो रहे आंदोलन को 20 के घटनाक्रम ने नई ऊर्जा दे दी…

लेकिन, लेकिन गौरतलब यह है कि जब लाठी चार्ज हो रहा था, आंसू गैस के गोले छोड़े जा रहे थे तब आंदोलन के प्रणेता अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका, सौरव दास, विजेता दहिया इत्यादि काकरोच कहां थे..?
इनमें से एक भी आंदोलनजीवी पुलिस की लाठी खाने के लिए वहां उपस्थित नहीं था…
कुछ लोग मंत्री महोदय से मिलने गये थे तो शेष कहीं वातानुकूलित कमरों में बैठ कर टीवी पर जेन-जी को पिटते देख रहे थे…

15 से 20 वर्ष की आयु के बच्चे भावुकता से भरे होते हैं, जिनकी सोचने समझने की क्षमता इतनी परिपक्व नहीं होती उन्हें बरगलाना सबसे आसान है।
वे ही पत्थरबाजी में और लाठियां खाने में आगे रहे…
उन्हीं के वीडियो बने…
आने वाले दिनों में कदाचित् कार्यवाही होगी…
हो सकता है बहुतों का करियर चौपट हो जाए…

लेकिन इससे आंदोलनजीवियों को क्या..?
वे तो अपने उद्देश्य में सफल हो ही रहे हैं। कंधे भले ही बदलते रहे हों, कभी भोली भाली जनता के, कभी किसानों के, तो कभी बच्चों के… केजरीवाल इसका जीता जागता उदाहरण है जिसकी एक के बाद एक दगाबाजियों के पश्चात जनता ने आंदोलनजीवियों पर विश्वास करना छोड़ दिया था।

एक विशेष बात…
वर्तमान प्रहसन का टाइटल था “नीट लीक”
लेकिन पन्ना पलटा तो अंदर लिखा था…
ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद, हिंदुत्व मुर्दाबाद, लेकर रहेंगे आज़ादी, सीता का पति, उमर खालिद को रिहा करो आदि आदि।
दीपके, सोनम या दहिया ने किसी को नहीं मना किया कि यह आंदोलन नीट लीक के विरोध में है…
न कि हिंदुत्व, ब्राह्मणवाद, सीता या राम के…
और न ही उमर खालिद और टुकड़े टुकड़े गैंग के समर्थन में…

जो दिखा वह यह है कि आंदोलनजीवियों को मुद्दों के बारे में स्पष्टता नहीं थी। वे तो शतरंज की बिसात पर खड़े किए गए प्यादे हैं, कठपुतलियां हैं, जिन्हें चला कोई और रहा है और इन कठपुतलियों की डोर, पर्दे के पीछे जिसके हाथ में है, उसका लक्ष्य मोदी सरकार के विरोध में माहौल खड़ा करना है, उसे अपदस्थ करना है, न कि विद्यार्थियों के किसी मुद्दे के समर्थन में आंदोलन करना…

कौन पैसा दे रहा है आंदोलन जीवियों को…
किसी स्थान पर एक साधारण सा कार्यक्रम करना हो तो आयोजकों के पसीने छूट जाते हैं, लाख-दो लाख जुटाने में…
20 जून से धरना और 28 जून से भूख हड़ताल चल रही है। महीने भर से टेंट, मंच, साउंड, खाना-पीना, नाच-गाना इत्यादि सब चल रहा है…

कोई तो है इन सब के पीछे…
लेकिन वह कौन है..? यक्ष प्रश्न यही है।

अब आगे क्या..?
आंदोलन के पीछे की शक्तियों ने जो रणनीति बनाई थी, वह 19 जुलाई तक तो फेल होती दिख रही थी लेकिन 20 जुलाई के घटनाक्रम ने उनकी रणनीति को कुछ हद तक सफल बना दिया। कदाचित् अब देश के विभिन्न हिस्सों से युवाओं को, आंदोलन जीवियों को एकत्रित कर दिल्ली में प्रदर्शन हेतु भेजा जाएगा। बांग्लादेश, नेपाल की भांति सत्ता पलटने का कुचक्र रचने वाले इस लाइन पर फिर सक्रिय हैं। भारत भी अब उनकी प्रयोगशाला में बदल चुका है।

आगामी वर्ष में यूपी, पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर, गोवा, हिमाचल प्रदेश और गुजरात में चुनाव होने वाले हैं। विपक्ष इन छिटपुट आंदोलनों की नैया में बैठकर चुनाव वैतरणी पार करना चाह रहा है। इस संसद सत्र में एफसीआरए बिल के आने से ऐसे अनेक एन जी ओ के विदेशी फंडिंग में प्रतिबंध लगाने की संभावना है जिनके तार विदेशों तक जुड़े हुए हैं। अतः इस आंदोलन के पीछे उनका हाथ होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। इसलिए ‘कहीं पर निगाहें, कहीं पर निशाना’ की कहावत चरितार्थ की जा रही है

किसी भी लोकतांत्रिक देश में विपक्ष का शांतिपूर्ण आंदोलन करना, जनता को एकजुट करना, उसके स्वस्थ होने का प्रतीक है। हां, देश को आंदोलन चाहिए लेकिन उद्देश्यपूर्ण… विरोध भी चाहिए लेकिन उत्तरदायित्व पूर्ण… विपक्ष चाहिए लेकिन वैकल्पिक दृष्टि वाला। लेकिन क्या भारत का विपक्ष इन मापदंडों पर खरा उतरता है..?

20 जुलाई के घटनाक्रम ने भारत के राजनीतिक परिदृश्य को गति प्रदान की है। मोदी-शाह की राजनीतिक चतुराई अभी तक सब ने देखी है। आने वाले दिनों में इन दोनों गुज्जुओं की इस आंदोलन से निपटने के तौर तरीकों और राजनीतिक चतुराई पर भारतीय मीडिया व राजनीति के विशेषज्ञों की ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के कूटनीतिज्ञों और सात समंदर पार बैठे जॉर्ज सोरोस जैसे षड्यंत्रकारियों की भी नज़र रहेगी।

देखते हैं राजनीति का ऊंट किस करवट बैठता है..?

किंतु मुख्य प्रश्न फिर भी अनुत्तरित है और कदाचित अनुत्तरित ही रहेगा कि इस सारे नाटक का कौन सूत्रधार है..? ये कौन सूत्रधार है..?

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