रितिका चंदोला ने Undercover Cockroach बनकर Engagement Farming की भूखी ‘बोटी मीडिया’ की पोल खोली। कैसे CJP जैसे प्रदर्शनों को राजनीतिक हित साधने के लिए कैसे किया जाता है उपयोग? समझाया रितिका ने।
ना कोई मोटिव, ना कोई लीडर… हिंसक भीड़ में कैसे बदल दिए जाते हैं सीजेपी जैसे प्रोटेस्ट? अपने चार घंटे के इवेंट की प्लानिंग तक नहीं कर पाए कॉकरोच, लेकिन नारे देश बदलने के लगाते हैं। कहीं भगवान राम के लिए असभ्य भाषा, कहीं ब्राह्मणों के लिए नफरत—जंतर मंतर की यही थी असलियत।
दिल्ली। जब दिल्ली के जंतर मंतर पर तथाकथित ‘Cockroach Janta Party’ (CJP) का प्रदर्शन हो रहा था, तब वहां एक अनजानी’दीक्षा’ नाम की लड़की CJP मास्क लगाए घूम रही थी। कोई नहीं जानता था कि इस मास्क के पीछे OpIndia की युवा पत्रकार रितिका चंदोला छिपी हुई हैं। चार घंटे तक वे इन ‘कॉकरोचों’ के बीच रहीं, उनकी बातें सुनीं, उनके एजेंडे को करीब से देखा और फिर जो एक्सपोज किया, वह बोटी मीडिया के लिए करारा तमाचा साबित हुआ।
रितिका चंदोला, जो ऑप इंडिया में एंकर, रिसर्चर और राइटर के रूप में काम करती हैं, राजनीतिक व्यंग्य और साहसी ग्राउंड रिपोर्टिंग के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने जंतर मंतर पर न सिर्फ एक प्रदर्शन की असलियत उजागर की, बल्कि पूरे ‘बोटी मीडिया’ इकोसिस्टम को बेनकाब कर दिया। बोटी मीडिया-यानी वे यूट्यूबर और पत्रकार जो एजेंडे की ‘बोटी’ खाकर अपनी रिपोर्टिंग का स्वर तय करते हैं-का यह चेहरा पहले भी संदिग्ध था, लेकिन रितिका ने जमीनी सच्चाई से उसे बिल्कुल नंगा कर दिया।
आरफा खानम मिलीं, एजेंडा चला
जंतर मंतर पर आरफा खानम शेरवानी जैसी पत्रकार रितिका (दीक्षा के रूप में) से मिलीं। लेकिन सवाल पूछने की बजाय एजेंडा चलाने में व्यस्त रहीं। न कोई मोटिव, न कोई स्पष्ट लीडरशिप, फिर भी भीड़ को हिंसक-राजनीतिक रंग देने की कोशिश। रितिका ने दिखाया कि सोशल मीडिया पर आउट्रेज कितना भारी है और जमीनी हकीकत कितनी खोखली। सीजेपी जैसे प्रदर्शनों को राजनीतिक हित साधने के लिए कैसे इस्तेमाल किया जाता है, यह रितिका की रिपोर्टिंग ने साफ कर दिया।
न प्लानिंग, न स्टूडेंट्स–फिर भी देश बदलने के नारे
चार घंटे के इवेंट की प्लानिंग तक नहीं कर पाए ये ‘कॉकरोच’, लेकिन नारे देश बदलने के लगाते रहे। कहीं भगवान राम के लिए असभ्य भाषा, कहीं ब्राह्मणों के प्रति नफरत, तो कहीं पत्रकारों का घेराव। असली स्टूडेंट्स कहां थे? पेपर लीक जैसी असली समस्या पर बात करने की बजाय भारी राजनीति। रितिका ने पूछा-यह छात्र आंदोलन था या एंगेजमेंट फार्मिंग का अड्डा? ‘बोटी मीडिया’ ने बिना वेरिफाई किए दीक्षा के बयान चला दिए, लेकिन मास्क के पीछे कौन है, यह पूछने की जरूरत भी नहीं समझी। TRP और एजेंडे की भूख ने सच्चाई को कुचल दिया।

रितिका चंदोला की यह रिपोर्टिंग सराहनीय है क्योंकि उन्होंने जोखिम उठाया। अकेले, मास्क लगाकर, विरोधियों के बीच घुसकर सच्चाई निकाली। OpIndia के साथ उनकी रिपोर्टिंग ने दिखाया कि असली पत्रकारिता एजेंडे की चापलूसी नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत का सामना है।
एक इकोसिस्टम का पोस्टमॉर्टम
आरफा खानम, अजीत अंजुम, रवीश कुमार, साक्षी जोशी, आशुतोष गुप्ता, अभिसार शर्मा जैसे नामों वाले इस गिरोह को दिल्लीवाले अच्छी तरह जानते हैं। जवाहरलाल नेहरू से राहुल गांधी तक के बचाव में ये निष्पक्षता का चोला उतार फेंकते हैं।
अपनी बेशर्मी अब छिपती भी नहीं। रितिका ने पूरे इकोसिस्टम को जंतर मंतर पर एक्सपोज कर दिया-कैसे ये लोग हाइप बनाते हैं, आउट्रेज बेचते हैं, और जमीनी असफलता को भी ‘मोरल विक्ट्री’ में बदलने की कोशिश करते हैं।
रितिका की रिपोर्टिंग ने साबित किया कि सोशल मीडिया आउट्रेज और वास्तविकता में कितना अंतर है। CJP प्रदर्शन में असली छात्रों की कमी, राजनीतिक एजेंडे की भरमार और ‘बोटी मीडिया’ की मिलीभगत-सब सामने आ गया।

रितिका चंदोला जैसी युवा पत्रकारों की जरूरत आज भारत को है, जो भीड़ में घुलकर भी सच्चाई निकाल लाएं। उन्होंने दिखाया कि एंगेजमेंट फार्मिंग की भूखी बोटी मीडिया कितनी खोखली है। जंतर मंतर की उनकी यह अंडरकवर रिपोर्टिंग न सिर्फ एक घटना की, बल्कि पूरे विकृत इकोसिस्टम को एक्सपोज करती है।



