क्या हमारी युवा पीढ़ी स्क्रीन की कैदी बनती जा रही है?

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दिल्ली। आज यदि किसी सार्वजनिक स्थान, मेट्रो, बस, पार्क, रेस्तराँ या कॉलेज परिसर पर कुछ मिनट खड़े होकर लोगों को देखा जाए, तो एक दृश्य लगभग हर जगह समान दिखाई देता है। अधिकांश लोगों की निगाहें अपने मोबाइल फोनकी स्क्रीन पर टिकी होती हैं। कोई रील देख रहा है, कोई स्टोरी अपलोड कर रहा है, कोई लाइक्स गिन रहा है, तो कोई बार-बार नोटिफिकेशन चेक कर रहा है। यह दृश्य केवल तकनीक के विस्तार का प्रमाण नहीं, बल्कि हमारी बदलतीमानसिकता का भी संकेत है।

डिजिटल युग ने हमें अभूतपूर्व सुविधाएँ दी हैं। दुनिया हमारी मुट्ठी में आ गई है। सूचना, शिक्षा, मनोरंजन और संवाद के नए रास्ते खुले हैं। लेकिन हर तकनीकी उपलब्धि अपने साथ कुछ अनदेखी चुनौतियाँ भी लेकर आती है। आज उन्हींचुनौतियों में सबसे गंभीर है FOMO (Fear of Missing Out)— यानी यह

डर कि कहीं हम किसी महत्वपूर्ण घटना, अवसर, ट्रेंड या सामाजिक गतिविधि से पीछे न रह जाएँ। पहली  नज़र में यह एक सामान्य मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति लग सकती है, लेकिन धीरे-धीरे यह हमारी जीवन-शैली, सोच और मानसिक स्वास्थ्यको प्रभावित करने लगी है। आज करोड़ों लोग अपने दिन की शुरुआत सूर्योदय  देखने से पहले मोबाइल स्क्रीन देखने से करते हैं और रात का अंत भी उसी स्क्रीन के साथ होता है। प्रश्न यह है कि क्या हम तकनीक का उपयोग कररहे हैं, या तकनीक हमारा उपयोग कर रही है?

सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि इस प्रवृत्ति का सबसे बड़ा प्रभाव Gen Z अर्थात् आज की युवा पीढ़ी  पर दिखाई दे रहा है। यह वह पीढ़ी है जिसने इंटरनेट को केवल एक साधन नहीं, बल्कि जीवन के स्वाभाविक वातावरण केरूप में देखा है। उनके लिए इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया  मंच केवल संवाद के माध्यम नहीं, बल्कि पहचान, लोकप्रियता और सामाजिक स्वीकार्यता का पैमाना बनते जा रहे हैं।

आज का युवा केवल जीना नहीं चाहता, बल्कि हर पल दिखना भी चाहता है। छुट्टियों का आनंद लेने से अधिक महत्वपूर्ण उनकी तस्वीरें पोस्ट करना हो गया है। किसी संगीत कार्यक्रम का आनंद लेने से अधिक जरूरी उसका वीडियोबनाना माना जाने लगा है। रेस्तराँ में भोजन का स्वाद लेने से पहले उसकी तस्वीर साझा करना एक सामान्य आदत बन चुकी है। धीरे-धीरे ऐसा लगता है कि अनुभवों का उद्देश्य उन्हें जीना नहीं, बल्कि उन्हें प्रदर्शित करना रह गया है।यह प्रवृत्ति केवल समय की बर्बादी तक सीमित नहीं रहती।

इसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। जब कोई व्यक्ति लगातार दूसरों की सफलता,  यात्राएँ, उपलब्धियाँ और खुशियाँ देखता है, तो वह अनजाने में अपनी वास्तविक जिंदगी की तुलना उन  चुनिंदा डिजिटल झलकियोंसे करने लगता है। उसे लगता है कि बाकी सभी लोग उससे अधिक सफल अधिक खुश और अधिक लोकप्रिय हैं। परिणामस्वरूप आत्मविश्वास घटता हैए चिंता बढ़ती है और संतोष  धीरे.धीरे समाप्त होने लगता है। विडंबना यह है किसोशल मीडिया पर दिखाई देने वाला जीवन पूर्ण सत्य नहीं होता। वहाँ लोग अपनी असफलताएँ, अकेलापन, संघर्ष या मानसिक तनाव नहीं दिखाते। वहाँ केवल जीवन के सबसे आकर्षक क्षण  साझा किए जाते हैं। लेकिन देखने वालाव्यक्ति इस आंशिक चित्र को ही सम्पूर्ण वास्तविकता मान बैठता है।

यही भ्रम FOMO को जन्म देता है। ऐसे समय में एक नया विचार दुनिया भर में लोकप्रिय हो रहा है-

JOMO (Joy of Missing Out) । यदि FOMO हमें लगातार भागने पर मजबूर करता है, तो JOMO

हमें रुकना सिखाता है। यदि FOMO कहता है कि हर जगह उपस्थित रहो, तो FOMO कहता है कि हर

जगह उपस्थित होना आवश्यक नहीं है। यदि FOMO दूसरों की स्वीकृति खोजता है, तो JOMO स्वयं के

भीतर संतोष खोजने की प्रेरणा देता है।

JOMO का अर्थ दुनिया से कट जाना नहीं है। इसका अर्थ यह भी नहीं कि तकनीक का विरोध किया जाए।  इसका वास्तविक अर्थ है, तकनीक का विवेकपूर्ण उपयोग और अपनी मानसिक शांति को प्राथमिकता देना।

यह स्वीकार करना कि हर ट्रेंड में शामिल होना आवश्यक नहीं, हर नोटिफिकेशन का तुरंत उत्तर देना जरूरी नहीं और हर गतिविधि को दुनिया के सामने प्रदर्शित करना जीवन की सफलता का प्रमाण नहीं है। दरअसल  JOMO हमें वर्तमानक्षण में लौटने का निमंत्रण देता है। परिवार के साथ बैठकर बिना मोबाइल के  बातचीत करना, किसी पुस्तक के साथ समय बिताना, प्रकृति के बीच टहलना, कोई नई कला सीखना या केवल कुछ देर स्वयं के साथ शांत बैठना; ये सबऐसे अनुभव हैं जो किसी भी डिजिटल उपलब्धि से कहीं अधिक स्थायी संतोष देते हैं।

शोध भी लगातार यह संकेत दे रहे हैं कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम विशेषकर रात के समयए नींद की गुणवत्ता एकाग्रता और मानसिक संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। वहीं सीमित और संतुलित डिजिटल उपयोग से तनाव कम होताहै उत्पादकता बढ़ती है और सामाजिक संबंध अधिक मजबूत बनते हैं। स्पष्ट है कि तकनीक समस्या नहीं है समस्या उसके अनियंत्रित और असंतुलित उपयोग में है। आज आवश्यकता डिजिटल त्याग की नहीं बल्कि डिजिटल अनुशासन कीहै। युवाओं को यह सीखना होगा कि मोबाइल जीवन का साधन है, जीवन स्वयं नहीं। दिन का एक निश्चित समय सोशल मीडिया से दूर बितानाए अनावश्यक नोटिफिकेशन बंद करना, सप्ताह में कुछ घंटे डिजिटल विश्राम लेना औरवास्तविक मित्रों व परिवार के साथ समय बिताना केवल अच्छी आदतें नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य में निवेश हैं।

इस परिवर्तन की जिम्मेदारी केवल युवाओं की नहीं है। परिवार, विद्यालय, महाविद्यालय और समाज सभी

को इस दिशा में संवेदनशील होना होगा। बच्चों को केवल स्मार्टफोन चलाना सिखाना पर्याप्त नहीं है, उन्हें यह भी सिखाना होगा कि स्मार्टफोन को कब और कैसे अलग रखा जाए। शिक्षा का उद्देश्य केवल तकनीकी दक्षता नहीं, बल्किभावनात्मक संतुलन और विवेकपूर्ण निर्णय क्षमता भी होना चाहिए।

आखिरकार मनुष्य की पहचान उसके फॉलोअर्स की संख्या से नहीं बल्कि उसके विचारों रिश्तों और जीवन की गुणवत्ता से होती है। डिजिटल मंच पर दिखाई देना सफलता का पर्याय नहीं है। वास्तविक सफलता तब है जब व्यक्ति भीड़के शोर के बीच भी अपने भीतर की शांति को बचाए रख सके।

आज की सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं कि हम इंटरनेट से जुड़े रहें, चुनौती यह है कि हम स्वयं से जुड़े रहें।

शायद इसलिए समय की माँग है कि हम FOMO की बेचैनी से बाहर निकलकर JOMO की सहजता को अपनाएँ। क्योंकि जीवन का सबसे सुंदर हिस्सा स्क्रीन पर नहीं, बल्कि उन अनुभवों में छिपा है जिन्हें कैमरा नहीं, केवल मन महसूसकर सकता है। शायद अब समय आ गया है कि हम अपने युवाओं को यह सिखाएँ- हर जगह मौजूद होना जरूरी नहीं, लेकिन जहाँ हैं, वहाँ पूरे मन से उपस्थित होना सबसे अधिक जरूरी है। यही JOMO का सार है और यही स्वस्थसंतुलित तथा सार्थक जीवन की दिशा भी।

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डॉ. पंकज शर्मा

डॉ. पंकज शर्मा

जनसंचार एवं विकास अध्ययन के शोधकर्ता, लेखक, शिक्षाविद् एवं कॉर्पोरेट संचार विशेषज्ञ हैं। जनसंचार में स्नातक एवं स्नातकोत्तर, कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन में स्नातकोत्तर डिप्लोमा तथा विकास अध्ययन में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की है। जनसंचार विषय में यूजीसी-नेट उत्तीर्ण हैं तथा उच्च शिक्षा के क्षेत्र में लगभग 15 वर्षों का अध्यापन अनुभव रखते हैं।)

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