डॉ पंकज शर्मा
दिल्ली का जंतर मंतर वर्षों से लोकतांत्रिक आवाज़ों का प्रतीक रहा है। जब भी देश के किसी वर्ग को लगता है कि उसकी बात सत्ता तक नहीं पहुँच रही तो वह जंतर मंतर पहुँचकर अपनी मांगों को लोकतांत्रिक तरीके से सामने रखता है। हाल ही में NEET पेपर लीक के विरोध में हजारों छात्र विशेषकर युवा पीढ़ी यानी GEN Z जंतर मंतर पहुँची। उनकी मांगें बिल्कुल स्पष्ट थीं। NEET परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई और लाखों छात्रों के भविष्य की सुरक्षा। किसी भी लोकतंत्र में ऐसे प्रश्न पूछना न केवल नागरिक का अधिकार है बल्कि उसकी जिम्मेदारी भी है।
लेकिन इस आंदोलन ने एक और गंभीर प्रश्न हमारे सामने खड़ा कर दिया। आंदोलन के दौरान कुछ मंचों और सोशल मीडिया पर देश के प्रधानमंत्री के लिए जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग किया गया, उसने अनेक लोगों को सोचने पर मजबूर किया। यहाँ मुद्दा किसी एक प्रधानमंत्री किसी एक राजनीतिक दल या किसी एक विचारधारा का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या असहमति व्यक्त करने के लिए भाषा की सारी सीमाएँ समाप्त हो जानी चाहिए, लोकतंत्र हमें सरकार से प्रश्न पूछने नीतियों का विरोध करने और अपनी बात खुलकर रखने का अधिकार देता है। लेकिन क्या लोकतंत्र हमें किसी भी व्यक्ति के लिए अपमानजनक भाषा प्रयोग करने का अधिकार भी देता है। लोकतंत्र की आत्मा केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं, बल्कि सभ्य और जिम्मेदार अभिव्यक्ति भी है।
यह प्रश्न केवल इस आंदोलन का नहीं, बल्कि पूरे समाज का है। आज सोशल मीडिया ने संवाद की शैली बदल दी है। लाइक्स शेयर और वायरल होने की दौड़ में संयमित भाषा की जगह कई बार उत्तेजक और आक्रामक भाषा अधिक ध्यान आकर्षित करती है। राजनीतिक बहसें भी कई बार तर्क से अधिक कटाक्ष और व्यक्तिगत आरोपों पर केंद्रित दिखाई देती हैं। जब सार्वजनिक जीवन में यही शैली दिखाई देती है तो युवा भी अनजाने में उसे सामान्य मानने लगते हैं। एक और कारण यह है कि आज असहमति को कई बार शत्रुता समझ लिया जाता है। यदि सामने वाला हमारे विचारों से सहमत नहीं हैए तो उसके विचारों का उत्तर तर्क से देने के बजाय व्यक्ति पर टिप्पणी करना आसान लगने लगता है। धीरे धीरे यह प्रवृत्ति सामान्य व्यवहार का हिस्सा बन जाती है।
आज जो युवा सार्वजनिक मंच पर किसी नेता के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग कर रहा है वह कल किसी कार्यालय का अधिकारीए शिक्षक, डॉक्टर, पत्रकार, न्यायाधीश या जनप्रतिनिधि होगा। यदि सार्वजनिक संवाद में मर्यादा का महत्व कम होता गया तो क्या यह सोच केवल राजनीति तक सीमित रहेगी? क्या आने वाले समय में माता पिता शिक्षक गुरु और अपने से बड़े लोगों के प्रति भी इसी प्रकार की भाषा सामान्य मानी जाएगी? यह प्रश्न केवल कल्पना नहीं है। समाजशास्त्र बताता है कि सार्वजनिक जीवन की भाषा और पारिवारिक संस्कृति एक दूसरे को प्रभावित करती हैं। बच्चे वही सीखते हैं जो वे घर, समाज, मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर बार बार देखते और सुनते हैं। यदि अपमानजनक भाषा सामान्य बना दी जाएगी, तो उसके प्रभाव से परिवार और सामाजिक संबंध भी अछूते नहीं रहेंगे।
समस्या का समाधान केवल युवाओं को दोष देने में नहीं है। इसकी जिम्मेदारी पूरे समाज की है। परिवारों को बच्चों को केवल अच्छी शिक्षा ही नहीं बल्कि संवाद का संस्कार भी देना होगा। मतभेद होना स्वाभाविक हैए लेकिन सम्मानपूर्वक बात करना भी उतना ही आवश्यक है। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में संवाद, वाद-विवाद और लोकतांत्रिक मूल्यों की शिक्षा को केवल पुस्तकों तक सीमित न रखकर व्यवहार का हिस्सा बनाना होगा। छात्रों को यह सिखाना होगा कि तीखी आलोचना भी गरिमापूर्ण भाषा में की जा सकती है। राजनीतिक दलों, नेताओं और सार्वजनिक जीवन से जुड़े सभी लोगों को भी आत्मचिंतन करना होगा। यदि सार्वजनिक मंचों पर नेता एक.दूसरे के लिए मर्यादित भाषा का प्रयोग करेंगे तो उसका सकारात्मक प्रभाव समाज पर भी पड़ेगा। युवाओं से वही अपेक्षा की जा सकती है, जिसका उदाहरण बड़े स्वयं प्रस्तुत करें।
सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म और डिजिटल माध्यमों पर भी स्वस्थ संवाद को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन जिम्मेदार अभिव्यक्ति उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।
GEN Z भारत की सबसे ऊर्जावान, जागरूक और तकनीक समझ रखने वाली पीढ़ी है। यह पीढ़ी प्रश्न पूछना जानती है, अन्याय के विरुद्ध खड़े होना जानती है और परिवर्तन की इच्छा रखती है। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन यदि यह ताकत संयम, शालीनता और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के साथ जुड़ जाए तो यही पीढ़ी भारत को एक अधिक परिपक्व लोकतंत्र की ओर ले जा सकती है। जंतर-मंतर पर उठी आवाज़ें हमें केवल NEET पेपर लीक की याद नहीं दिलातीं, बल्कि एक बड़े सामाजिक प्रश्न की ओर भी संकेत करती हैं. क्या हम ऐसी लोकतांत्रिक संस्कृति बना रहे हैं जहाँ असहमति तो होगी लेकिन सम्मान नहीं, हमें यह तय करना होगा कि आने वाले भारत की पहचान केवल मुखर आवाज़ों से होगी या मर्यादित संवाद से भी। यदि आज हम भाषा की गरिमा को महत्व नहीं देंगे तो आने वाली पीढ़ियाँ इसेसामान्य व्यवहार मान लेंगी।
लेकिन यदि हम अपने बच्चों और युवाओं को यह सिखाएँ कि कड़े से कड़ा विरोध भी शिष्ट भाषा में किया जा सकता है, तो हम केवल बेहतर नागरिक ही नहीं बल्कि बेहतर समाज और मजबूत लोकतंत्र भी तैयार करेंगे। लोकतंत्र की असली ताकत केवल सवाल पूछने में नहीं, बल्कि इस बात में है कि सवाल किस भाषाए किस मर्यादा और किस जिम्मेदारी के साथ पूछे जाते हैं।



