डॉ. मयंक चतुर्वेदी
मुंबई । किसी राष्ट्र की जनसांख्यिकी उसके सामाजिक स्वरूप, सांस्कृतिक परंपराओं, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामुदायिक संबंधों को प्रभावित करती है। किसी क्षेत्र में लंबे समय से निवास कर रहे समुदाय की जनसंख्या का अनुपात घटने पर उसकी सांस्कृतिक उपस्थिति, स्थानीय संस्थाओं और राजनीतिक प्रभाव में बदलाव कैसे आता है, इसका ताजा उदाहरण फिर एक बार हमारे सामने आया है।
हिंदू समाज की धार्मिक परंपराएं, मंदिर, तीर्थस्थल, पर्व और सांस्कृतिक मान्यताएं भारत की सभ्यतागत विरासत का महत्वपूर्ण आधार हैं। इनकी स्वतंत्रता और सुरक्षा सुनिश्चित करना सामाजिक स्थिरता के लिए आवश्यक है। कश्मीर में कश्मीरी पंडितों का विस्थापन, पूर्वोत्तर भारत में धार्मिक एवं जातीय संरचना से जुड़े बदलाव जैसे अनेक विवाद इस विषय पर गंभीर विमर्श की आवश्यकता पर आज जोर देते हुए नजर आ रहे हैं।
इस संदर्भ में ताजा प्रकरण महाराष्ट्र के मीरा रोड स्थित पूनम एस्टेट क्लस्टर-1 आवासीय परिसर का सामने आया है, जहां 625 फ्लैटों वाले परिसर में रहने वाले लगभग 120 हिंदू परिवारों ने नवरात्रि के दौरान गरबा, डांडिया और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र मांगा था। निवासियों ने शांति, सुरक्षा और स्वच्छता से जुड़े नियमों का पालन करने का आश्वासन दिया, किंतु इसके बावजूद उनका आवेदन अस्वीकार कर दिया गया। स्थानीय निवासी उमाशंकर नाग ने इस निर्णय के विरुद्ध सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार के समक्ष शिकायत दर्ज कराई है।
यहां सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न निर्णय की निष्पक्षता का है। क्या नवरात्रि आयोजन की अनुमति अस्वीकार करने का आधार सुरक्षा, स्वच्छता और साझा स्थान के उपयोग से जुड़े नियम थे? क्या ऐसे नियम सभी धार्मिक आयोजनों पर समान रूप से लागू किए गए? क्या निर्णय में धार्मिक पहचान के आधार पर भेदभाव हुआ? इन प्रश्नों का उत्तर सोसायटी के प्रस्ताव, नियमावली और प्रशासनिक दस्तावेजों की जांच से मिल ही जाएगा, परन्तु आज जो स्पष्ट दिखता है वह यही है कि धार्मिक आधार पर भेदभाव यहां किया जा रहा है, जोकि संवैधानिक समानता और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा गंभीर विषय है।
भारत की 2011 की जनगणना के अनुसार, देश की कुल जनसंख्या में हिंदुओं की हिस्सेदारी 79.8 प्रतिशत और मुसलमानों की 14.2 प्रतिशत थी। वर्ष 1951 में हिंदुओं की हिस्सेदारी 84.1 प्रतिशत और मुसलमानों की 9.8 प्रतिशत दर्ज की गई थी। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि छह दशकों में दोनों समुदायों की राष्ट्रीय जनसंख्या हिस्सेदारी में महत्वपूर्ण बदलाव आया। इन आंकड़ों का क्षेत्रवार विश्लेषण भी आवश्यक है।
कश्मीर: विस्थापन की ऐतिहासिक त्रासदी
कश्मीर घाटी का आधुनिक इतिहास धार्मिक सुरक्षा और जनसांख्यिकीय परिवर्तन के संबंध को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। 1980 के दशक के अंतिम वर्षों और 1990 के आसपास आतंकवाद, लक्षित हत्याओं, धमकियों और भय के वातावरण ने कश्मीरी हिंदुओं, विशेषकर कश्मीरी पंडितों, के जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित किया। बड़ी संख्या में परिवार घाटी छोड़ने के लिए विवश हुए। इससे उनकी पारंपरिक सामाजिक-सांस्कृतिक उपस्थिति, संपत्ति और अपने मूल निवास से जुड़े जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मार्च 2021 में संसद में प्रस्तुत जानकारी में बताया था कि जम्मू-कश्मीर के राहत कार्यालय में 1990 से सुरक्षा कारणों से घाटी से बाहर गए 44,167 प्रवासी परिवार पंजीकृत थे। इनमें 39,782 हिंदू परिवार थे। यह विस्थापन इस बात का गंभीर उदाहरण है कि आतंकवादी हिंसा, धमकियां और भय किसी समुदाय की अपने मूल निवास में बने रहने की क्षमता को किस प्रकार प्रभावित करते हैं। कश्मीरी पंडितों की त्रासदी में आतंकवादी संगठनों की हिंसा, लक्षित हमले, तत्कालीन सुरक्षा परिस्थितियां और शासन की विफलताएं महत्वपूर्ण अध्ययन विषय हैं।
पूर्वोत्तर भारत: धर्मांतरण, संस्कृति और राजनीतिक परिस्थितियां
नागालैंड, मिजोरम और मेघालय में ईसाई आबादी बहुसंख्यक है। जनगणना के धार्मिक आंकड़े इन राज्यों की विशिष्ट जनसंख्या संरचना को स्पष्ट करते हैं। इस परिवर्तन के पीछे औपनिवेशिक काल की मिशनरी गतिविधियों, स्थानीय धार्मिक आंदोलनों, जनजातीय समाजों और लंबे ऐतिहासिक विकास की भूमिका रही है। पूर्वोत्तर में अलगाववादी आंदोलनों और जातीय संघर्षों का इतिहास भी रहा है। इन घटनाओं को समझने के लिए धार्मिक परिवर्तन के साथ भूमि, स्वायत्तता, जातीय पहचान, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और ऐतिहासिक शिकायतों का अध्ययन आवश्यक है।
ऐसे में स्वभाविक है कि किसी क्षेत्र में धार्मिक संरचना बदलने से सांस्कृतिक संस्थाओं और सामाजिक संबंधों का स्वरूप प्रभावित होता है। पूर्वोत्तर का अनुभव यह स्पष्ट करता है कि जनसांख्यिकीय परिवर्तन एक समय के बाद पूरे वातावरण को ही बदलकर रख देती है। असम तथा पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्रों में अवैध प्रवासन, नागरिकता और स्थानीय पहचान को लेकर लंबे समय से विवाद रहे हैं। धुबरी, मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों की जनसंख्या संरचना को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस होती रही हैं।
केरल: धार्मिक संरचना और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां
केरल में हिंदू, मुस्लिम और ईसाई समुदाय लंबे समय से सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा रहे हैं। राज्य की धार्मिक संरचना में समय के साथ परिवर्तन हुआ है। यहां कट्टरपंथ और आतंकवादी संगठनों से जुड़े कई मामले भी सामने आए हैं। इस्लामिक स्टेट में शामिल होने वाले व्यक्तियों से जुड़े मामलों की जांच इसका उदाहरण है। पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया जैसे संगठनों की गतिविधियों और आतंकवाद संबंधी मामलों का अध्ययन सुरक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, इसलिए ही भारत सरकार ने इस संगठन पर रोक लगाई है।
बात अब संविधानिक दायरे की
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और समान संरक्षण की गारंटी देता है। अनुच्छेद 25 अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार प्रदान करता है। यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और संविधान के अन्य प्रावधानों के अधीन है। अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों के कुछ संस्थागत अधिकारों की रक्षा करता है। इन संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, हिंदुओं को नवरात्रि, दीपावली, दुर्गापूजा और अन्य धार्मिक पर्व मनाने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, लेकिन यहां क्या हो रहा है? जनसांख्यिकीय परिवर्तन क्षेत्र की संस्कृति, सामाजिक संस्थाओं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित कर रहा है। हिन्दू समुदाय की जनसंख्या का अनुपात घटने से धार्मिक स्वतंत्रता का हनन अनिवार्य रूप से होता हुआ दिख रहा है।
जैसे अब तक कश्मीर का विस्थापन धार्मिक सुरक्षा की गंभीर विफलता का उदाहरण बना हुआ है। वैसे ही मीरा रोड का विवाद आवासीय परिसरों में समान व्यवहार और धार्मिक आयोजनों के अधिकार की जांच की आवश्यकता सामने रखता है। ध्यान रहे- भारत की सभ्यतागत विरासत की रक्षा के लिए हिंदू समाज की धार्मिक स्वतंत्रता, मंदिरों, त्योहारों और सांस्कृतिक परंपराओं का संरक्षण आवश्यक है। इसके साथ कानून का शासन प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की रक्षा करे।
यहां हम सभी के लिए समझने का सत्य यही है कि राष्ट्र की वास्तविक शक्ति इस बात में निहित है कि प्रत्येक समुदाय अपनी धार्मिक पहचान, सांस्कृतिक परंपराओं और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ सुरक्षित और सह अस्तित्व के साथ एकता के साथ जीवन जी सके। जनसांख्यिकीय परिवर्तन फिलहाल यह बता रहा है कि यह एकता एवं आपसी प्रेम तभी तक रहता है, जब तक उस स्थान पर हिन्दू बहुसंख्यक है, जैसे ही उनकी जनसांख्यिकी में कमी आती है, वह असुरक्षित हो जाता है, इसी के साथ उसका धर्म, कर्म, कला, संस्कृति भी असुरक्षित हो जाती हैं, इसलिए भारत तभी तक भारत है, जब तक कि यहां हिन्दू बहुसंख्यक हैं, मुंबई से सामने आई घटना यही समझा रही है!



