पंकज कुमार झा
रायपुर । एक कथित गांधीवादी हैं। आजकल गाली-वादी हो गए हैं। नाम राहुल देव है। जिस तरह मार्कण्डेय काटजू को देख कर यह समझा जा सकता है कि जज रहते हुए उन्होंने कैसे निर्णय दिए होंगे, वैसे ही आप राहुलजी को देख कर अनुमान लगा सकते हैं कि संपादक रहते हुए क्या किया होगा उन्होंने। हालांकि राहुल केवल एक प्रतीक हैं। आप इस पोस्ट को राहुल जैसे हर साठोत्तर ZEN Z के लिए लिखा समझ सकते हैं, जो गालियों के नए ठेकेदार बने हैं।
राहुलजी के फतवे का नोटिस लेकर हमने कुछ कुभाषित इन्हें समर्पित किया ताकि संग्रह करने में इन्हें आसानी रहे, कथित भाषाविद् भी तो हैं ये, इसलिए। ये कुभाषित पूरी तरह लिंगमुक्त, छंदमुक्त, अतुकांत और शाकाहारी किस्म के थे। कहीं भी स्त्रियों को इसमें बीच में नहीं लाया गया था।
फिर भी बौखला गए राहुल साहब, बिल्कुल नए वाले गांधी की तरह। ऐसा आहत हुए जैसे इनका नाम राहुल नहीं, ‘भावना’ हो। संस्कारों की याद दिलाने से लेकर न जाने कैसे-कैसे हिंसक शब्दों में फुफकारने लगे, मजाक उड़ाने लगे। उपहास करने लगे। मसखरी का परिचय तो ऐसा दिया जैसे खानदानी पेशा यही रहा हो। अपने जैसे तमाम सत्तरोत्तर-अष्टावक्रोत्तर ZEN Z को भी उठा-उठा कर ले आए। मेरे कामकाज, मेरे दायित्व को भी जज करने लगे, मानो बस इन्हीं का प्रमाण पत्र आना बचा हुआ था मेरे उद्धार के लिए। बहरहाल!
आते हैं मूल विषय पर।
इनकी भावना कुमारी बहुत आहत हुई कि मैंने गांधी से आगे मोदी को कैसे बता दिया। बिल्कुल दिलनवाज होकर इन्होंने घोषणा की कि पहली बार ये मेरे पटल पर आए हैं। ऐसी घोषणा करते हुए आप कल्पना कर सकते थे कि अजीमो शाह शहंशाह ने कितनी बड़ी कृपा कर दी मुझ नाचीज पर, गोया ‘लुटियन’ का सूचना सलाहकार हो जाने में बस इनका आगमन ही रोड़ा था, अब तो मेरे दुख भरे दिन बीते रे भैया।
सोच-सोच कर सर पटक लेने का मन करता है कि आज भी ये लोग स्वयं को कितनी गंभीरता से लेते हैं। दुनिया कहीं आगे निकल गयी है, और इन्हें लगता है कि यही आज भी हांक रहे हैं समाज को। कभी अपने हांके पर संदेह होने पर झट से कथित जेनजी भी बन जाने की भौंडी सी कोशिश करते रहते हैं, ऐसा करते हुए विशुद्ध निरीह ही नजर आते हैं ये। फिर ‘सिंह कटा कर पर्रू बन जाने’ की कोशिश में मितरों, फ़्रैंड्स, परिधान मंत्री आदि पता नहीं क्या-क्या लिखते चले जाते हैं ये, जिसे अब तिलचट्टे भी नहीं लिखते। इन्हें पता ही नहीं होता कि ऐसा कर, अपनी ओढ़ी हुई गरिमा खो कर ऐसे में वे न घर के रहते न घाट के, धोबी के पालतू की तरह।
बात गांधी पर वापस आ ही नहीं पा रही। इतना ‘गुणानुवाद’ करने का मन करता है इन सज्जन कुमार का कि वहीं-वहीं पहुंच जाता हूं। क्या करें। क्षोभ ही इतना है ऐसे-ऐसों को वैसा-तैसा बनता हुआ देख कर कि क्या ही कहें। खैर।
राहुल साहब की घोषणा हुई कि वे पहली बार मेरे पटल पर आए हैं। और लगे हाथ गांधी पर लिखे मेरे पोस्ट को उठा ले गए अपने वाल पर और ऐसा वितंडा खड़ा करने की कोशिश की, मानो हमने इनके गांधीवाद की ठेकेदारी छीन कर इनके पेट पर लात मार दिया हो। ऐसा करते हुए ये अपनी ही तमाम स्थापनाओं को भूल गए, सो अलग। मसलन जबरन अंग्रेजी शब्द घुसेड़ना, चरम आक्रोश में आ कर वर्तनी आदि की उपेक्षा करना। कनिष्ठों को मजाक बनाने की कोशिश आदि।
आते हैं मूल विषय पर।
अपन में लिखा था कि मोदी अब गांधी से मीलों आगे निकल गए हैं। आखिर इसमें ऐसी क्या समस्या है मियां कि पिल पड़े तुम? गांधी को ‘इस्लाम’ क्यों बनाने पर तुले हो कि जरा सी बात हुई नहीं, झट खतरे में आ जाता है। अगर हमें लगा कि यशस्वी प्रधानमंत्री मोदीजी ने अत्यधिक शक्ति होने के बावजूद अत्यधिक अहिंसा और धैर्य का परिचय देकर गांधी से आगे लाकर स्वयं को खड़ा कर लिया है, तो क्या यह लिखने के लिए किसी राहुल से मुझे अनुमति चाहिए थी?
हम ये कौन सा समाज बनाना चाह रहे, जहां गांधी के आराध्य श्रीराम पर तो भद्दी से भद्दी बातें हो सकती है, उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रूप में लोगे आप, लेकिन गांधी पर बात नहीं होगी। आपने जरा सा भी गांधी के बारे में बोला तो अगर शक्ति हो इनके पास तो आपकी गर्दन का फुटबॉल बना दें। क्यों मिया यार? ऐसा क्यों! आपने टेंडर भरा हुआ है क्या करमचंद जी के असली-नकली खानदान के नाम पर? इधर तुलना की नहीं, उधर गांधीवाद खतरे में। इसके पक्ष में तर्क भी ऐसे-ऐसे भौंडे कि क्या ही कहे जायें।
कहते हैं कि दुनिया के सौ से अधिक देशों में गांधी की प्रतिमा है। यह अपने आपमें गांधीवाद के विरुद्ध है। गांधी ने कब चाहा था या प्रतिपादित किया था कि बच्चों के मुंह का निवाला जिन पैसों से आ सकता है, उसे छीन कर देश के हर चौराहों पर उन्हें आप टांग दो! या विदेशों में लगाते रहो इनकी प्रतिमा? क्या गांधीवाद पर्याय है व्यक्तिपूजा का? बिल्कुल नहीं। बल्कि इसका उल्टा है।
इसी तरह बहुत सारे देशों में इनका नाम होने के कारण क्या हर सवालों से इतर मान लिए जायें इन्हें? ऐसे तो विश्व के 56 देश पूरी तरह एक ‘मत’ में रंगे हैं। तो क्या हम यह मान लें कि सच में वह मत इस कारण शांति का हो गया? बिल्कुल नहीं। प्रसार हमेशा ‘गुण’ का पर्याय हो, यह आवश्यक नहीं। फिर अगर तुलना कर ही दिए जायें, किसी विश्व नेता को गांधी से आगे दिखा ही दिए जायें, तो इसमें इतना ‘ही ही खी खी’ क्यों यार? होने दो न चर्चा। क्या बिगड़ जाता इससे?
जिस गांधी ने स्वयं यह कहा है कि उनके विचार बदलते रहते हैं, द्वंद्व उत्पन्न होने पर आखिरी विचार को उनका प्रतिनिधि विचार माने जायें, वहां तुम यह मान लो कि विचार की समाप्ति हो गयी गांधी के जाते ही? अब कोई नया विचार आ नहीं सकता? या गांधी के ग्रंथों को ‘आसमानी किताब’ बना दिए जायें कि नया कुछ अब संभव ही नहीं?
बात होने दो यार। कल और आयेंगे नगमों की खिलती कलियां चुनने वाले, तुमसे बेहतर कहने वाले, हमसे बेहतर सुनने वाले। क्यों हम यह मान कर बैठ जायें कि रत्नगर्भा हमारी पृथ्वी, हमारा सनातन और कुछ अब पैदा कर ही नहीं सकती। कि एक मोहनदास को जन्म दे देने के बाद उसका काम समाप्त हो गया? ऐसा नहीं होता राहुलजी।
निस्संदेह गांधी की प्रशंसा होनी चाहिए। होती ही है। हमारी पार्टी भाजपा ने अगर ‘गांधीवादी समाजवाद’ को अपने संविधान में, निष्ठाओं में शुमार किया है, तो कुछ तो बात होगी ही। जब तक हमारे संविधान का वे हिस्सा हैं, तब तक हमारे पथ प्रदर्शक वे रहेंगे ही। पर इससे तुलना या आलोचना बंद थोड़े होनी चाहिए?
सनातन में तो ऐसी तुलना की परिपाटी रही है। संस्कृति रही है। गुरु से गोविंद की तुलना, गुरु को भगवान से भी बड़ा बताना। भक्त को भगवान से बड़ा बताना। राम से अधिक राम कर दासा जैसे संदर्भ देखें। अगर राम का दासा, राम से बड़ा कहा जा सकता है, तो मोहनदासा से बड़ा दामोदरदासा को बता देने पर ऐसा क्यों लगा आपको कि आपकी दुनिया लुट गयी या भैंस खोल ली है आपकी?
यह पोस्ट गांधीवाद की आलोचना या समीक्षा में नहीं है। उस पर आगे कभी बात हो सकती है। यह पोस्ट तो बस इस फतवा के विरुद्ध है कि गांधी पर बात करना ही कुफ़्र बना दिए जायें? या ये मान लिए जायें कि अब किसी फैक्ट्री में गांधी से बड़ा उत्पाद आ ही नहीं सकता?
बातें होते रहने दो भाई! अगर सारे गढ़ और मठ तोड़े जाने को जहां अभिव्यक्ति के खतरे उठाने के रूप में मंडित किया जा सकता हो, तो ‘गांधी संप्रदाय’ के मठ को ही क्यों इतना कट्टर बनाने पर तुले हुए हो कि बात ही नहीं होने दोगे?
स्वयं को गांधी का उपासक बताते हुए, उनकी तस्वीर का डीपी बना कर लोगों को गाली के लिए उकसाना, यह क्या मोहन के विचारों की हत्या नहीं माना जाये? ऐसी हिप्पोक्रेसी कि पहलगाम हमले के समय (जिसमें धर्म पूछ-पूछ कर नृशंस हत्याएं हुई हो) उसके विरुद्ध आक्रोश की अभिव्यक्ति की तुम निंदा करोगे, लोगों को दुत्कारोगे कि पाकिस्तान के विरुद्ध क्यों बोल रहे, पर कॉकरोचों के पक्ष में तुम नयी-नयी गालियों का आविष्कार करने का आह्वान करोगे? और तुम्हारे आह्वान पर जब ऐसी गालियां भेंट की जाएगी, तो विक्टिम कार्ड खेलोगे? कहां से सीखा है ऐसा गांधीवाद भाई!
लिखते जा रहा पर मन में ऐसी आंधी मची है कि कोई इसका छोर नजर नहीं आ रहा। बाकी बातें फिर कभी। फिलहाल इतना ही कि समाज को हांकने की कुवृत्ति या अहंकार छोड़ कर मनुष्य बन जायें कृपया। आप विद्वान होंगे, पर आपके कथित विद्वान होने से कोई और मूर्ख नहीं हो जाता।
हर नयी पीढ़ी हर मामले में पिछली पीढ़ी से बेहतर होती हैं। ऐसा मान लेंगे तो आनंद से रहेंगे। वैसे भी कोई ऐसा तीर नहीं मार लिया है आपने, कोई ऐसी दैवीय उपलब्धि नहीं हासिल किया हुआ है आपने कि नयी पीढ़ी इससे आगे जा ही नहीं सकती।
आपका अहंकार आपका लोक और परलोक दोनों बिगाड़ देता है। जो भी कंकड़-पत्थर पाया होगा जीवन में, उसे भी बहा ले जाता है। बदलाव को स्वीकार कीजिए और कृपया बड़े बन जाइए।
हां, अगर युवा शक्ति का अर्थ आपके लिए तिलचट्टे होते हों, तो आपको अशेष अ-श्रद्धांजलि के अलावा और दिया ही क्या जा सकता है भला?
ऐश कीजिए।



