दिल्ली। आरफा खानम तेहरान के हवाई अड्डे पर उतरीं तो पूरा ईरान शोक में डूबा हुआ था। आयातुल्ला अली खामेनी की अंतिम यात्रा में शामिल होने जा रही थीं। उनके चेहरे पर जो मुस्कान थी, वह सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। “किसी की मौत पर इतनी खुशी?” लोग पूछ रहे थे। लेकिन अगले ही दिन जब उन्होंने सिर पर स्कार्फ ओढ़ लिया, तो ट्रोलिंग का दूसरा दौर शुरू हो गया। वही आरफा, जो भारत में हर मौके पर हिंदू संस्कृति, परंपराओं और मंदिरों पर व्यंग्य करने में आगे रहती हैं, इस्लामिक जमीन पर उतरते ही अचानक “सांस्कृतिक सम्मान” की भाषा बोलने लगीं।

कुछ ही दिनों पहले महाराष्ट्र की सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर रिद्धी जाधव की तस्वीरें वायरल हो रही थीं। एक तरफ वह छोटी स्कर्ट पहनकर मंदिर परिसर में घुसने की “आजादी” की लड़ाई लड़ रही थीं, दूसरी तरफ मुस्लिम युवक से शादी के बाद अपने बच्चे के जन्मदिन की पार्टी में काले पर्दे में लिपटी नजर आ रही थीं। सिर्फ आंखें दिख रही थीं। वही लड़की, जो कभी “मेरी मर्जी” के नारे लगाती थी, अब अपने चेहरे को भी अपनी मर्जी से नहीं दिखा पा रही थी।
ये दो कहानियां महज संयोग नहीं हैं। ये उस दोहरे चरित्र की तस्वीर हैं जो आजकल “लिबरल फेमिनिज्म” के नाम पर चल रहा है। भारत में ये आवाजें बहुत तेज होती हैं। छोटी स्कर्ट, मंदिर में घुसना, “पुरुषों द्वारा थोपी गई परंपराएं” – सब पर बहस छिड़ जाती है। लेकिन जब बात इस्लामिक देशों या इस्लामिक घरानों की आती है, तो अचानक चुप्पी छा जाती है। पर्दा, निकाब, बुर्का – इन्हें “धार्मिक स्वतंत्रता” का नाम दे दिया जाता है। कोई सवाल नहीं, कोई आलोचना नहीं।

मेरी मर्जी’ का नारा भारत में इतना पवित्र हो चुका है कि उसे बुनियादी अधिकार बता दिया जाता है। सड़कों पर प्रदर्शन होते हैं, टीवी डिबेट्स गरम होते हैं। लेकिन वही महिलाएं जब इस्लामिक मुल्कों में कदम रखती हैं, तो उनकी मर्जी के पर कतर जाते हैं। वहां कानून सख्त है, समाज और भी सख्त। फिर अचानक “सांस्कृतिक संवेदनशीलता” की दुहाई शुरू हो जाती है। आरफा खानम जैसी पत्रकार, जो दिल्ली में हिंदू रीति-रिवाजों पर तंज कसती नहीं थकतीं, तेहरान में खामेनी की तस्वीर के आगे सिर झुकाती नजर आती हैं। रिद्धी जाधव जैसी लड़कियां, जो कभी मंदिर की “पितृसत्ता” से लड़ रही थीं, अब घरेलू पर्दे की दीवार में खुशी-खुशी समा जाती हैं।
ये विडंबना इसलिए और गहरी है क्योंकि ये महिलाएं खुद को प्रगतिशील बताती हैं। लेकिन प्रगति का उनका मापदंड चुनिंदा है। हिंदू समाज में सुधार की मांग करना आसान है क्योंकि यहां बहस की जगह है, आलोचना की गुंजाइश है। लेकिन इस्लाम में सुधार की बात करना “इस्लामोफोबिया” का खतरा बन जाता है। इसलिए चुप्पी। इसलिए दोहरा मापदंड।
दुनिया भर में ऐसी सैकड़ों कहानियां हैं। यूरोप से लेकर भारत तक, जहां मुस्लिम युवक से शादी करने वाली लड़कियां पहले “आजादी” की मिसाल बनती हैं, बाद में पर्दे और नियंत्रण की शिकार। लेकिन इन आवाजों को कोई नहीं पूछता। क्योंकि इनकी पूरी “दुकान” ही इस्लाम और मुस्लिम पीड़ित-नरेटिव पर टिकी है। सच्चाई सामने आने पर पूरा मॉडल ढह जाएगा।

आरफा तेहरान में स्कार्फ ओढ़कर खड़ी हैं। रिद्धी काले निकाब में अपना चेहरा छिपाए है। दोनों ही “मेरी मर्जी” की कहानी को एक बार फिर दोहरा रही हैं – कि यह आजादी सिर्फ भारत में, हिंदू समाज के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए है। इस्लामिक जमीन पर पहुंचते ही वह आजादी खुद-ब-खुद गायब हो जाती है। और ये महिलाएं भी चुपचाप उसे स्वीकार कर लेती हैं। क्योंकि सवाल पूछने की हिम्मत अब बाकी नहीं रही।



