— धीप्रज्ञ द्विवेदी
दिल्ली । दुनिया में व्यापार केवल बाजारों से नहीं चलता, उसके पीछे रास्तों का भी उतना ही महत्व होता है। किसी देश के पास कितना उत्पादन है, वह कितना खरीद सकता है या कितना बेच सकता है—यह महत्वपूर्ण है, लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि वह माल एक देश से दूसरे देश तक कितनी जल्दी, कितनी कम लागत में और कितनी विश्वसनीयता के साथ पहुंच सकता है। यही कारण है कि आज वैश्विक राजनीति में समुद्री मार्ग केवल व्यापार के रास्ते नहीं रह गए हैं; वे आर्थिक सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता का हिस्सा बन चुके हैं।
पश्चिम एशिया और लाल सागर में लगातार बदलती परिस्थितियों ने यह भी दिखाया है कि किसी एक समुद्री मार्ग पर अत्यधिक निर्भरता कितनी बड़ी चुनौती बन सकती है। ऐसे समय में भारत और रूस के बीच विकसित हो रहाचेन्नई–व्लादिवोस्तोक समुद्री गलियारा (सीवीएमसी) केवल एक नया समुद्री रास्ता नहीं, बल्कि भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा और व्यापार रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
भारत और रूस इस दिशा में अचानक आगे नहीं बढ़े हैं। 2019 में चेन्नई बंदरगाह और व्लादिवोस्तोक बंदरगाह के बीच समुद्री संपर्क विकसित करने की सहमति बनी थी। इसके बाद भारतीय प्रतिनिधिमंडलों ने रूस के सुदूर पूर्व के बंदरगाहों और ऊर्जा-संबंधी ढाँचे का अध्ययन किया। सितंबर 2023 में भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने व्लादिवोस्तोक, वोस्तोच्नी, नाखोदका और कोज़मिनो जैसे बंदरगाहों का दौरा किया तथा कोकिंग कोयला, कच्चा तेल और एलएनजी जैसे संभावित माल पर चर्चा हुई। जनवरी 2024 में चेन्नई में भारत और रूस ने इस गलियारे को व्यवहार में उतारने को लेकर एक विशेष कार्यशाला भी की, जिसमें कोयला, कच्चा तेल, एलएनजी, उर्वरक और कंटेनर माल से जुड़े क्षेत्र शामिल थे। यानी यह परियोजना केवल नक्शे पर खींची गई समुद्री रेखा नहीं है; इसके पीछे पिछले कई वर्षों से आर्थिक और बंदरगाह-आधारित तैयारी चल रही है।
इस समुद्री गलियारे की सबसे बड़ी विशेषता इसकी दूरी और समय में दिखाई देती है। वर्तमान आकलनों के अनुसार चेन्नई से व्लादिवोस्तोक की दूरी लगभग 5,647 समुद्री मील, यानी करीब 10,458 किलोमीटर है। स्वेज मार्ग से मुंबई से सेंट पीटर्सबर्ग तक की लगभग 8,675 समुद्री मील की दूरी की तुलना में यह मार्ग लगभग 5,600 किलोमीटर की बचत कर सकता है और समुद्री यात्रा का समय लगभग 40 दिन से घटकर करीब 24 दिन तक आ सकता है। लगभग 16 दिनों की यह बचत केवल समय की बचत नहीं है। जहाज जितने कम दिन समुद्र में रहेगा, ईंधन, चालक-दल, बीमा, जहाज के उपयोग और माल के वित्तीय रूप से फँसे रहने की लागत पर भी उसका असर पड़ सकता है।
किसी भी ऊर्जा आयात की वास्तविक लागत केवल उस कीमत से तय नहीं होती जिस पर बंदरगाह पर तेल खरीदा गया है। उत्पादन क्षेत्र से बंदरगाह तक की ढुलाई, भंडारण, बंदरगाह शुल्क, जहाज का किराया, बीमा, समुद्री दूरी और अंतिम गंतव्य तक पहुँचने की लागत मिलकर वास्तविक लागत बनाते हैं। इसलिए रूस के सुदूर पूर्व और आर्कटिक क्षेत्र में उपलब्ध ऊर्जा-संसाधनों को अपेक्षाकृत छोटे और अधिक सीधे समुद्री मार्गों से एशियाई बाजारों तक लाने की संभावना भारत के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि स्रोत से बंदरगाह और फिर बंदरगाह से भारतीय बाजार तक पूरी आपूर्ति-श्रृंखला को कुशल बनाया जाता है, तो भविष्य में प्रतिस्पर्धी कीमत पर ऊर्जा प्राप्त करने की संभावना बढ़ सकती है। हालांकि वास्तविक कीमत हमेशा अंतरराष्ट्रीय बाजार, जहाजों की उपलब्धता, बीमा, बंदरगाह शुल्क, भुगतान व्यवस्था और अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।
इसी संदर्भ में सितंबर 2026 में सामने आया वोस्तोक ऑयल परियोजना का विकास इस पूरी कहानी को एक नया आयाम देता है। रूस की सरकारी तेल कंपनी रोसनेफ्ट ने 6 सितंबर 2026 को रूस के आर्कटिक क्षेत्र में स्थित इस विशाल परियोजना से पहली तेल खेप रवाना करने की शुरुआत की। तैमिर क्षेत्र से पाइपलाइन के माध्यम से तेल को नए बुख्ता सेवर (BukhtaSever) टर्मिनल तक पहुँचाया गया और वहाँ पहली खेप को आर्कटिक श्रेणी के टैंकर वैलेंटिन पिकुल पर लादा गया। उसी समय लगभग 1.20 लाख टन क्षमता वाला अकादमिक गुबकिन टैंकर भी टर्मिनल के पास प्रतीक्षा कर रहा था।
वोस्तोक ऑयल की खासियत केवल इसके आकार में नहीं, बल्कि इसके स्थान और परिवहन संरचना में भी है। परियोजना के लिए लगभग 790 किलोमीटर लंबी मुख्य पाइपलाइन व्यवस्था विकसित की गई है, जो तेल को आर्कटिक तट पर स्थित नए टर्मिनल तक पहुँचाती है। वहाँ 18 मीटर गहरे जल क्षेत्र में लगभग 1.20 लाख टन क्षमता वाले आर्कटिक टैंकरों में तेल लोड करने की व्यवस्था बनाई गई है। रोसनेफ्ट के अनुसार परियोजना से 2027 की दूसरी छमाही में ही लगभग 3 करोड़ टन तेल की आपूर्ति संभव हो सकती है और 2030 तक यह मात्रा 5 करोड़ टन तक पहुँचाने का लक्ष्य है। दीर्घकालीन विकास के साथ इसे 10 करोड़ टन प्रतिवर्ष तक बढ़ाने की संभावना भी बताई गई है, हालांकि यह बाजार की मांग और आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।
यहाँ भारत के लिए एक महत्वपूर्ण संभावना दिखाई देती है। रूस के आर्कटिक क्षेत्र में उत्पादन बढ़ रहा है, नए तेल टर्मिनल तैयार हो रहे हैं और आर्कटिक परिस्थितियों में काम करने वाले विशेष टैंकरों का बेड़ा विकसित किया जा रहा है। अगस्त 2026 में रॉयटर्स ने भी बताया था कि एशिया की ओर आर्कटिक समुद्री मार्ग से रूसी तेल की आवाजाही तेज हुई थी और कई टैंकर इस मार्ग से एशियाई बाजारों की ओर जा रहे थे। वोस्तोक ऑयल की शुरुआत के बाद इस दिशा में और अधिक मात्रा जुड़ने की संभावना बताई गई थी।
यहीं चेन्नई–व्लादिवोस्तोक समुद्री गलियारे की दीर्घकालिक उपयोगिता को केवल आज की व्यापारिक जरूरत के बजाय भविष्य की ऊर्जा-श्रृंखला के रूप में देखना चाहिए। वोस्तोक ऑयल का तेल आर्कटिक क्षेत्र से निकलकर एशियाई बाजारों तक पहुँचने वाला एक नया प्रवाह बना सकता है। दूसरी ओर, भारत का पूर्वी तट, विशेषकर चेन्नई, रूस के सुदूर पूर्व के साथ सीधे समुद्री संपर्क का आधार बन सकता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि वोस्तोक ऑयल का प्रत्येक बैरल चेन्नई के रास्ते भारत आएगा या वर्तमान में ऐसे टैंकर भारत के लिए रवाना हो चुके हैं। लेकिन जैसे-जैसे उत्पादन बढ़ेगा और एशियाई बाजारों के लिए परिवहन व्यवस्था मजबूत होगी, भारत के लिए इस ऊर्जा-स्रोत तक पहुँच के नए विकल्प बन सकते हैं। यही इस पूरे गलियारे की रणनीतिक उपयोगिता है।
भारत के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की ऊर्जा आवश्यकता लगातार बड़ी है। रूस पहले से भारत के प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है और दोनों देशों ने तेल, तेल-उत्पाद, शोधन, पेट्रो-रसायन और एलएनजी से जुड़े सहयोग को आगे बढ़ाने की बात की है। 2025 के भारत–रूस संयुक्त वक्तव्य में भी ऊर्जा सहयोग तथा चेन्नई–व्लादिवोस्तोक पूर्वी समुद्री गलियारे को दोनों देशों के परिवहन और संपर्क सहयोग के महत्वपूर्ण हिस्सों के रूप में रखा गया था।
इस पूरे परिदृश्य में एक और बात ध्यान देने योग्य है। आर्कटिक से निकलने वाला तेल और चेन्नई–व्लादिवोस्तोक गलियारा एक ही समुद्री मार्ग नहीं हैं। वोस्तोक ऑयल से निकलने वाला तेल आर्कटिक समुद्री मार्ग के माध्यम से एशिया की ओर आ सकता है, जबकि चेन्नई–व्लादिवोस्तोक गलियारा भारत के पूर्वी तट और रूस के सुदूर पूर्व के बीच सीधा संपर्क विकसित करता है। दोनों व्यवस्थाएँ अलग-अलग हैं, लेकिन भविष्य में भारत की व्यापक ऊर्जा और समुद्री संपर्क रणनीति में एक-दूसरे के पूरक बन सकती हैं। इसीलिए वोस्तोक ऑयल का आरंभ भारत के लिए केवल रूस की नई तेल परियोजना की खबर नहीं है; यह इस बात का संकेत भी है कि रूस के पूर्वी और आर्कटिक क्षेत्रों से एशिया की ओर ऊर्जा प्रवाह का महत्व आने वाले वर्षों में बढ़ सकता है।
भारत के लिए इसका एक बड़ा लाभ यह होगा कि ऊर्जा आयात के स्रोत और मार्ग दोनों में विविधता बढ़ेगी। यदि किसी एक समुद्री क्षेत्र में संकट पैदा होता है, तो वैकल्पिक मार्गों और आपूर्तिकर्ताओं का होना भारत की आपूर्ति-श्रृंखला को अधिक लचीला बना सकता है। लाल सागर और पश्चिम एशिया में पैदा होने वाले व्यवधानों के बीच यही विविधता महत्वपूर्ण हो जाती है। चेन्नई–व्लादिवोस्तोक मार्ग स्वेज मार्ग का पूर्ण विकल्प नहीं है और न ही ऐसा होना आवश्यक है। इसका महत्व इस बात में है कि भारत के पास रूस के साथ व्यापार के लिए एक अतिरिक्त पूर्वी समुद्री विकल्प मौजूद हो।
इसका पर्यावरणीय पक्ष भी महत्वपूर्ण है। छोटी समुद्री दूरी और कम यात्रा समय का अर्थ सामान्य परिस्थितियों में कम ईंधन खपत और इसलिए कम उत्सर्जन की संभावना हो सकता है। लेकिन किसी मार्ग को केवल दूरी के आधार पर स्वतः पर्यावरण-अनुकूल नहीं कहा जा सकता। जहाज का प्रकार, इंजन की दक्षता, ईंधन, मौसम, समुद्री परिस्थितियाँ और बंदरगाह पर लगने वाला समय भी उत्सर्जन को प्रभावित करते हैं। इसलिए भविष्य में यदि इस गलियारे के साथ अधिक दक्ष जहाज, स्वच्छ ईंधन और आधुनिक बंदरगाह तकनीक जुड़ती है, तो इसका पर्यावरणीय लाभ और बढ़ सकता है।
चेन्नई से रूस की ओर जाने वाला यह मार्ग केवल भारत और रूस तक सीमित आर्थिक संभावना भी नहीं रखता। यह पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशिया की बड़ी समुद्री अर्थव्यवस्थाओं को एक व्यापक व्यापारिक परिप्रेक्ष्य में जोड़ सकता है। वियतनाम, दक्षिण कोरिया और जापान जैसे देशों के लिए इससे सीधे-सीधे किसी औपचारिक भागीदारी की घोषणा नहीं होती, लेकिन बंदरगाह, जहाज निर्माण, समुद्री उपकरण, भंडारण, बीमा, औद्योगिक आपूर्ति और ऊर्जा-संबंधी सहयोग के नए अवसर बन सकते हैं। रूस के सुदूर पूर्व में चीन और दक्षिण कोरिया पहले से महत्वपूर्ण आर्थिक भागीदार रहे हैं और विश्लेषकों ने भारत, जापान तथा दक्षिण कोरिया के बीच इस क्षेत्र में संभावित सहयोग की संभावना पर भी चर्चा की है।
वियतनाम के लिए यह मार्ग भारत और रूस के बीच बढ़ते समुद्री संपर्क के साथ दक्षिण-पूर्वी एशिया की आपूर्ति-श्रृंखला को जोड़ने की संभावना पैदा कर सकता है। वियतनाम की विनिर्माण और निर्यात-आधारित अर्थव्यवस्था को मशीनरी, औद्योगिक सामग्री, इलेक्ट्रॉनिक घटकों और कृषि-प्रसंस्कृत उत्पादों के लिए बड़े बाजारों की आवश्यकता होती है। भविष्य में यदि चेन्नई, व्लादिवोस्तोक और दक्षिण-पूर्वी एशिया के बंदरगाहों के बीच माल-परिवहन बेहतर होता है, तो वियतनाम जैसे देशों को नए व्यापारिक मार्ग और मध्यवर्ती आपूर्ति-श्रृंखला के अवसर मिल सकते हैं।
दक्षिण कोरिया के लिए यह संभावना और भी व्यापक हो सकती है। जहाज निर्माण, समुद्री इंजीनियरिंग, भारी उद्योग, ऊर्जा तकनीक और बंदरगाह उपकरणों में उसकी विशेषज्ञता रूस के सुदूर पूर्व और भारत दोनों के साथ संभावित परियोजनाओं में उपयोगी हो सकती है। जापान के लिए भी समुद्री परिवहन, बंदरगाह प्रौद्योगिकी, औद्योगिक निवेश और आपूर्ति-श्रृंखला के क्षेत्र में अवसर बन सकते हैं। यह सब अभी संभावनाओं के स्तर पर है; इसलिए इसे किसी निश्चित भविष्य की साझेदारी के रूप में नहीं, बल्कि इस समुद्री संपर्क से पैदा होने वाली संभावित आर्थिक दिशाओं के रूप में देखना उचित होगा।
अंततः किसी भी समुद्री गलियारे की सफलता केवल समुद्र में जहाज चलाने से तय नहीं होती। इसके लिए नियमित जहाज सेवा, पर्याप्त माल, आधुनिक बंदरगाह, भंडारण, रेल और सड़क संपर्क, सीमा शुल्क की सरल व्यवस्था, बीमा, भुगतान तंत्र और स्थिर व्यापारिक नियम आवश्यक होंगे। यदि ये सभी कड़ियाँ एक साथ मजबूत होती हैं, तो चेन्नई–व्लादिवोस्तोक गलियारा केवल भारत–रूस व्यापार की दूरी घटाने वाला मार्ग नहीं रहेगा, बल्कि पूर्वी भारत, रूस के सुदूर पूर्व और व्यापक एशियाई बाजारों के बीच एक नई आर्थिक धुरी बन सकता है।
भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऊर्जा-सुरक्षा का अर्थ केवल अधिक तेल खरीदना नहीं, बल्कि तेल और गैस तक पहुँचने के लिए अधिक विकल्प तैयार करना है। रूस के सुदूर पूर्व की ऊर्जा-संपदा, आर्कटिक में शुरू हुआ वोस्तोक ऑयल, नए आर्कटिक टैंकर, चेन्नई–व्लादिवोस्तोक समुद्री संपर्क और भारत के पूर्वी समुद्री तट की बढ़ती भूमिका—ये सभी अलग-अलग घटनाएँ दिखाई देती हैं, लेकिन इन्हें एक साथ देखने पर एक बड़े परिवर्तन की तस्वीर उभरती है। भारत पश्चिमी समुद्री मार्गों पर निर्भर रहते हुए भी अपने पूर्वी समुद्री द्वार को अधिक सक्रिय बना सकता है।
वोस्तोक ऑयल से पहली तेल-खेप का निकलना इस बदलाव की एक महत्वपूर्ण शुरुआत है। अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि वह तेल सीधे भारत के लिए आने लगा है या नए टैंकर भारत के बंदरगाहों के लिए तैयार खड़े हैं। लेकिन यह स्पष्ट है कि रूस ने आर्कटिक में उत्पादन से लेकर पाइपलाइन, टर्मिनल और विशेष टैंकर तक एक नई निर्यात व्यवस्था खड़ी करनी शुरू कर दी है। आने वाले वर्षों में यदि इस उत्पादन का एक हिस्सा भारतीय बाजार की ओर आता है और चेन्नई–व्लादिवोस्तोक जैसे पूर्वी समुद्री संपर्क समानांतर रूप से मजबूत होते हैं, तो भारत की ऊर्जा-आपूर्ति के नक्शे में एक महत्वपूर्ण नया रास्ता जुड़ सकता है।
यही कारण है कि चेन्नई–व्लादिवोस्तोक समुद्री गलियारे को केवल एक छोटी समुद्री यात्रा के रूप में देखना इसके वास्तविक महत्व को सीमित करना होगा। यह भारत की ऊर्जा-सुरक्षा, समुद्री रणनीति, व्यापारिक विविधता और एशिया के बदलते आर्थिक भूगोल से जुड़ा हुआ प्रश्न है। स्वेज मार्ग अपना महत्व बनाए रखेगा, लेकिन उसके समानांतर पूर्व की ओर खुलता यह समुद्री रास्ता भारत को विकल्प देता है। और जब विकल्प बढ़ते हैं, तो किसी भी देश की आर्थिक और ऊर्जा-संबंधी लचीलापन भी बढ़ता है।



