इससे बेहतर अभिव्यक्ति नहीं हो सकती वर्तमान के परिदृश्य पर…
पूछता है प्रश्न साला, यार गोली मार दो !
बन रहा है बड़का लम्बरदार गोली मार दो ।।
कह रहा है गांव में बिजली नहीं क्यों आ रही
कर रहा है बन्द भ्रष्टाचार गोली मार दो ।।
कर रहा है बन्द भ्रष्टाचार गोली मार दो ।।
हक़ दिलाता घूमता है वंचितों को रातदिन
अफसरों से कर रहा तकरार गोली मार दो ।।
अफसरों से कर रहा तकरार गोली मार दो ।।
गाँव के बच्चों को बेहतर कल दिखाने के लिए,
माँगता है बस तनिक अधिकार, गोली मार दो।।
माँगता है बस तनिक अधिकार, गोली मार दो।।
रेत, जंगल, खान सबके खेल में अड़चन बना
कर रहा है धंधे को बेकार गोली मार दो।।
कर रहा है धंधे को बेकार गोली मार दो।।
सच को सच कहने की जिसकी है बुरी आदत यहाँ
इस भयंकर रोग का उपचार – गोली मार दो।।
इस भयंकर रोग का उपचार – गोली मार दो।।
मांगता है भूख बेकारी अँधेरों का हिसाब
देखिए कितना हुआ मक्कार गोली मार दो।।
देखिए कितना हुआ मक्कार गोली मार दो।।
जब व्यवस्था से बड़ा हो जाए जनता का विवेक,
इससे पहले हो सवेरा पार, गोली मार दो।।
इससे पहले हो सवेरा पार, गोली मार दो।।
सर्वेश त्रिपाठी
(सर्वेश तिवारी श्रीमुख नहीं, ये दूसरे सर्वेश हैं। जम्मू वाले प्रोफेसर साहब)



